मौन का महाकाव्य
मौन की स्याही निरंतर बह रही,
पीर अंतस की अधूरी कह रही।
चाह कर भी जो कभी कह न पाया,
साध वो आँखों से अश्रु बन बही।
शीत में भी हर घड़ी गलता रहा,
सूर्य था पर आग में जलता रहा।
राग-अनुराग की हर गीतिका की,
पंक्ति को हर पृष्ठ में रचता रहा।
पंक्तियाँ लेकिन अधूरी रह गयीं,
शून्य के संवाद को भी सह गयीं।
रुक गये जो भाव अधरों पर कहीं
साध वो आँखों से अश्रु बन बही।
वेदना का इक महासागर छिपा,
था स्वयं में ही कहीं सावन छिपा।
जो समेटे था ज़माने का तिमिर,
उस दिये में था मगर जीवन छिपा।
रोक पाया पर कहाँ उस बात को,
वक़्त की निष्ठुर घड़ी को रात को।
रात चौखट पर सिसकती ही रही,
साध वो आँखों से अश्रु बन बही।
कागज़ों पर तैरते अक्षर सभी,
मर्म तक लेकिन पहुँच पाए कभी?
मौन जो सबसे मुखर संगीत था,
सुन सकी न उसको ये दुनिया कभी।
लिख न पाया वक़्त उस इतिहास को,
तृप्त कर पाती हृदय की प्यास को।
प्यास गीतों की मचलती जो रही,
साध वो आँखों से अश्रु बन बही।
धूप की चादर बिछाए रात-दिन,
कट रही है ज़िंदगी सुकरात बिन।
है समेटे जो हृदय में एक युग,
रह गया वह मौन ही जज़्बात बिन।
ढूँढता ही रह गया मन भोर को,
काट पाती जो विरह की डोर को।
क्या करे मन जब सुबह खोई रही,
साध वो आँखों से अश्रु बन बही।
छोड़ पीछे हर पुराना कारवाँ,
हो गया धुंधला ख़यालों का जहाँ।
जो समंदर आँसुओं का पी गया,
क्या करूंँगा ढूँढ़कर उसको यहाँ।
अब नहीं दिल को किसी से आसना,
बंद है उस मोड़ की हर कामना।
उम्र भर हर कामना घुटती रही,
साध वो आँखों से अश्रु बन बही।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें