आन देख ली हमने

आन देख ली हमने 

महल की चकाचौंध में भी, बे-सुकूनी जान देख ली हमने
फटे लिबास में हँसती हुई, वो ऊँची आन देख ली हमने।

​किसी के दस्तरख़ान पर, छप्पन भोग सजे हैं मगर
सूखी रोटी चबाते हुए, बच्चों की मुस्कान देख ली हमने।

​सोने के निवाले भी यहाँ, भूख मिटा नहीं पाते
सड़क किनारे चैन की सोती, वो थकान देख ली हमने।

​अमीरी ने सिखाया है, रिश्तों का सौदा करना
ग़रीबी के आँचल में छिपी, सच्ची पहचान देख ली हमने।

​सजाए थे जो ख़्वाब, बड़ी हसरतों से शहर में
क़ीमत लगते ही बिकती हुई, वो दूकान देख ली हमने।

​दौलत की नुमाइश में अक्सर, लोग खुदा बन बैठते हैं
मिट्टी के ही पुतले हैं सब, ये दास्तान देख ली हमने।

बुलंदियों पे पहुँच कर 'देव', कभी पीछे मुड़ कर देखना
ज़मीं से जो दूर ले जाए, वो ऊँची उड़ान देख ली हमने।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आन देख ली हमने

आन देख ली हमने  महल की चकाचौंध में भी, बे-सुकूनी जान देख ली हमने फटे लिबास में हँसती हुई, वो ऊँची आन देख ली हमने। ​किसी के दस्तरख़ान पर, छप्...