उम्मीदों के हार पिरोकर मैं स्वयं गले पहनाऊँ

उम्मीदों के हार पिरोकर मैं स्वयं गले पहनाऊँ 

मन के सूने नील गगन में मधु प्यालों के मधुर मिलन में 
भावों के हर चपल लहर में नवल नेह के नवल नगर में 
नवल नेह के मोती चुनकर मैं नेह सेज पर बिखराऊँ।

नवल निशा में छवि मतवाली मृदुल कपोलों से चुन लाली 
ललित लता के मधुर कुंज में मंद पवन के सुखद पुंज में 
कलित क्रोण के अंतर्मन से मैं खुद से ही नेह लगाऊँ।

पल-पल साँझ पिघलती जाती जीवन नौका चलती जाती 
कुछ कहती कुछ सुनती जाती अविरल धारा बहती जाती 
ढली साँझ के सुरमित पल में मैं मधुर गीत कोई गाऊँ।

क्षणभंगुर काया की माया, जैसे ढली धूप की छाया
आना जाना खेल जगत का बन कर के निज रूप भगत का 
अपने ही मन के मधुवन में मैं बंसी की धुन सुन पाऊँ।

जैसे भी हो वैसे आओ अपने गीतों से बहलाओ 
बिन सपनों की कैसी माला तुम से ही मन का उजियाला 
अपने में तुम मुझको पाओ अपने में मैं तुमको पाऊँ।

उम्मीदों के हार पिरोकर मैं स्वयं गले पहनाऊँ।


✍️अजय कुमार पाण्डेय 

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उम्मीदों के हार पिरोकर मैं स्वयं गले पहनाऊँ

उम्मीदों के हार पिरोकर मैं स्वयं गले पहनाऊँ  मन के सूने नील गगन में मधु प्यालों के मधुर मिलन में  भावों के हर चपल लहर में नवल नेह के नवल नगर...