कसक बाकी बची है
आज भी उन भावनाओं की कसक बाकी बची है
वर्जनाओं से परे भी ठोकरें खाता रहा हूँ,
द्वार सारे बंद थे फिर भी वहाँ जाता रहा हूँ।
शून्य में ही खो गये भटके हुए उद्गार मेरे,
मौन में ही घुल गये सब गीत के आभार मेरे।
दब गये जो कंठ में ही वो गीत मन के भाव थे,
आज भी उन भावनाओं की कसक बाकी बची है।
जो रहा परित्यक्त जग में वो मेरा हिस्सा हुआ,
पीर का परितोष ही मेरे प्यार का किस्सा हुआ।
जो सज सका ना पृष्ठ पर भटका हुआ उद्गार हूँ,
जो आँसुओं में घुल गये खोया हुआ श्रृंगार हूँ।
घुल गये जो आँसूओं में वो पीर मन के भाव थे,
आज भी उन आशनाओं की कसक बाकी बची है।
इक गीत की अनुरागिनी की चाह में चलता रहा,
सब आग से बचते रहे मैं शीत में जलता रहा।
इक अधूरी चाह में भी पूर्ण का आभास पाया,
दूर था हर पल क्षितिज से पर लगा आकाश पाया।
जो विरह में गान भटके वही प्राण के प्रभाव थे,
आज भी उन वर्जनाओं की कसक बाकी बची है।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
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