जिंदगी कब आसान नजर आती है
सुलझाने निकलो तो और भी बिखर जाती है,
ये जिंदगी है कब इतनी आसान नजर आती है।
रोज सबक सिखाने को नया सवेरा आता है ,
पर शाम होते ही यादें फिर से ठहर जाती है।
किनारों की चाहत में उम्र तमाम गुज़ारी है ,
पर ये कश्ती हर बार ही बीच भँवर जाती है।
खो गई है मासूमियत भी तजुर्बों के बाज़ारों में,
ये मुस्कुराहट भी अब तो मशवरा कर आती है।
कभी धूप की शिद्दत मिली, कभी छाँव का धोखा,
हर बार नक्शा मिटा कर वक़्त की लहर जाती है।
साँसों का ये जाने कैसा गोरखधंधा है 'देव',
के जीने की कोशिश में ही ये उम्र गुज़र जाती है।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
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