दर्द ने जब भी छूआ है पीर के हर पोर को

दर्द ने जब भी छूआ है पीर के हर पोर को 

दर्द ने जब भी छुआ है पीर के हर पोर को, 
जिंदगी के रास्तों से तब मेरा परिचय हुआ।

धूप में नंगे बदन थे छाँव की राहत न थी,
देख कर आतप्त मन को नैन में आहट न थी।
मौन मन में तप रही थी इक उदासी रात की,
आह से परिचय हुआ तब दर्द ने जब बात की।

आह ने जब भी छुआ है दर्द के अनुरोध को,
दर्द के अहसास को तब नेह का अनुभव हुआ।

पाँव में छाले पड़े जब ताप ने उनको सुखाया, 
गीत में कैसे लिखूँ शीत ने कितना जलाया।
साँस जब फूली कहीं पर एक झूठी आस थी,
दूर से देखा क्षितिज पर इक मचलती प्यास थी।

प्यास ने जब भी छुआ है नैन के इक कोर को,
गीत के अहसास में तब बूँद का आश्रय हुआ।

कब कहाँ किसने कहा है कौन कैसे क्रंद से,
क्लांत मन उलझा रहेगा कब तलक इस द्वन्द से।
कोई तो सुबह कभी इस मुंडेरे आयेगी,
अनछुए गीत मेरे उनको फिर वो गायेगी।

नेह ने जब भी छुआ है क्लांत मन के कोर को,
हार में भी जीत का मन को तभी निश्चय हुआ।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय 

 


जाने क्यूँ हर इक व्यथा में स्वयं का प्रतिबिंब था,







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