कब तक यूँ ही भटकेगी
इक पुण्य भाव लेकर आई थी कुछ संताप मिटाने को,
भागीरथ के पुण्य भाव से धरती पर श्राप मिटाने को।
लेकिन युग के संतापों में ये जीवन ऐसा डूब गया,
जिस आँचल से निकली थी कल वो आँचल पीछे छूट गया।
पाप-पुण्य के बीच जगत के यूँ गंगा कब तक लटकेगी,
जीवन के इन झंझाओं में कब तक यूँ ही भटकेगी।
कब छूट गया सारा बचपन कब छूट गया घर का आँगन,
कब छूट गया उपवन सारा कब छूट गया माँ का दामन।
शैशव वस्था से कब जाने यौवन की चौखट पर आयी,
अल्हड़पन अभी बीते न थे पग-पग बेड़ी बँधती आयी।
मुक्त प्रवाहित भाव गंग की नयनों को कब तक खटकेगी,
जीवन के इन झंझाओं में कब तक यूँ ही भटकेगी।
शैशव, बाल्या, यौवन, वृद्धा सुख सारा अपना त्याग दिया,
जीवन को सिंचित करने को अपना सारा अनुराग दिया।
कितने नाले कितने ताने युग-युग से सहती आयी है,
आह नहीं मुख से निकली है बस गंगा बहती आयी है।
अपनी सिंचित संतानों के घावों से कब तक तड़पेगी,
जीवन के इन झंझाओं में कब तक यूँ ही भटकेगी।
जग से अपनी पीर छुपाकर पल-पल गंगा मुस्काती है,
प्रेम समेटे निज आँचल में सबका जीवन बहलाती है।
त्याग समर्पण दया भाव के भावों से जीवन पाला है,
बदले में निजता वशीभूत हो इसको संकट में डाला है।
देने को सबके आँचल खुशियाँ अब गंगा कब तक बिखरेगी,
जीवन के इन झंझाओं में कब तक यूँ ही भटकेगी।
यूँ होगा यदि बाधित प्रवाह यदि गंगा ही रुक जायेगी,
रुक जायेगा समय चक्र भी ये सृष्टि यहाँ चुक जायेगी।
विस्तार और प्रसार को प्रवाह के स्वभाव को निखार दें,
निर्लज्ज भाव के विरुद्ध हो अपने प्रण को आज धार दें।
गंगा जब तक शुद्ध न होगी ये सदी न तब तक निखरेगी,
जीवन के इन झंझाओं में कब तक यूँ ही भटकेगी।
©✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
23 अगस्त, 2025