उम्मीदों का सफर

उम्मीदों का सफर

मत पूछो क्यूँ रातों में हम यूँ जगते रहते हैं
सच ये है तारों के संग-संग हम तो चलते रहते हैं

रस्ता वो ही नये मुसाफिर नई-नई आशाएं हैं
काँधों पर इन आशाओं को ले हम तो जगते रहते हैं

इन दो पटरी पे उम्मीदों की हर रोज कहानी गढ़ती है
उम्मीदों की वही कहानी हम भी तो लिखते रहते हैं

जाड़ा-गरमी धूप-ताप अरु बरसातों के कितने मौसम
मौसम के हर हालातों को हम तो सहते रहते हैं

औरों की स्नेहिल मुस्कानों में हम भी अपने दर्द छुपाकर
आते-जाते इन राहों में अकसर हम तो हँसते रहते हैं

अपना जीवन रेल की पटरी आज कहीं कल कहीं ठिकाना
खुशियों की सौगात लिये हर पल हम तो चलते रहते हैं

कहे देव ये ये सफर सुहाना उम्मीदों और सपनों का
इन उम्मीदों से मिलकर खुद से हम तो मिलते रहते हैं

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        31 अगस्त, 2025

कब तक यूँ ही भटकेगी

कब तक यूँ ही भटकेगी

इक पुण्य भाव लेकर आई थी कुछ संताप मिटाने को,
भागीरथ के पुण्य भाव से धरती पर श्राप मिटाने को।
लेकिन युग के संतापों में ये जीवन ऐसा डूब गया,
जिस आँचल से निकली थी कल वो आँचल पीछे छूट गया।

पाप-पुण्य के बीच जगत के यूँ गंगा कब तक लटकेगी,
जीवन के इन झंझाओं में कब तक यूँ ही भटकेगी।

कब छूट गया सारा बचपन कब छूट गया घर का आँगन,
कब छूट गया उपवन सारा कब छूट गया माँ का दामन।
शैशव वस्था से कब जाने यौवन की चौखट पर आयी,
अल्हड़पन अभी बीते न थे पग-पग बेड़ी बँधती आयी।

मुक्त प्रवाहित भाव गंग की नयनों को कब तक खटकेगी,
जीवन के इन झंझाओं में कब तक यूँ ही भटकेगी।

शैशव, बाल्या, यौवन, वृद्धा सुख सारा अपना त्याग दिया,
जीवन को सिंचित करने को अपना सारा अनुराग दिया।
कितने नाले कितने ताने युग-युग से सहती आयी है,
आह नहीं मुख से निकली है बस गंगा बहती आयी है।

अपनी सिंचित संतानों के घावों से कब तक तड़पेगी,
जीवन के इन झंझाओं में कब तक यूँ ही भटकेगी।

जग से अपनी पीर छुपाकर पल-पल गंगा मुस्काती है,
प्रेम समेटे निज आँचल में सबका जीवन बहलाती है।
त्याग समर्पण दया भाव के भावों से जीवन पाला है,
बदले में निजता वशीभूत हो इसको संकट में डाला है।

देने को सबके आँचल खुशियाँ अब गंगा कब तक बिखरेगी,
जीवन के इन झंझाओं में कब तक यूँ ही भटकेगी।

यूँ होगा यदि बाधित प्रवाह यदि गंगा ही रुक जायेगी,
रुक जायेगा समय चक्र भी ये सृष्टि यहाँ चुक जायेगी।
विस्तार और प्रसार को प्रवाह के स्वभाव को निखार दें,
निर्लज्ज भाव के विरुद्ध हो अपने प्रण को आज धार दें।

गंगा जब तक शुद्ध न होगी ये सदी न तब तक निखरेगी,
जीवन के इन झंझाओं में कब तक यूँ ही भटकेगी।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        23 अगस्त, 2025

मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो

मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो


मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो,
इक दूजे के मन को पढ़ लो विश्वास हृदय का मत तोड़ो,
मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो।

रिश्तों में नहीं स्वार्थ रहे और रहे नहीं सौदेबाजी,
एक दूजे का साथ रहे और रहे हमेशा मन राजी।
भाव किसी के मन में उपजे दूजे का मन उसको पढ़ ले,
नयनों के झुकने से पहले उनकी भाषा को मन पढ़ ले।

नयनों की भाषा को पढ़ लो आस नयन के मत तोड़ो,
मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो।

क्या लाये थे इस जीवन में और साथ क्या ले जाओगे,
जो कुछ दोगे यहाँ जगत को वही जगत से तुम पाओगे।
धन दौलत ये महल दुमहले ये सारे इक आडंबर है,
अपने भीतर झाँको देखो सच्चा सुख मन के अंदर है।

मन की दौलत बहुत बड़ी है मत इनसे तुम नाता तोड़ो,
मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो।

पुण्य पंथ है जीवन पथ ये और पथिक मन इस जीवन का,
दूर क्षितिज तक वो महकेगा जिसका तन मन धन चंदन का।
झूठे आडंबर से बच जो मर्म हृदय का पढ़ पायेगा,
काल खंड के ताम्र पत्र पर वही गीत नव गढ़ पायेगा।

पुण्य पथिक हो पुण्य पंथ के पुण्य प्रेम का पथ मत छोड़ो,
मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        20 अगस्त, 2025

प्यास अधर की क्या होती है

प्यास अधर की क्या होती है

जीवन की मधुमय प्याली से दो बूँद अधर पर जब छलके,
तब जाकर जीवन ने जाना प्यास अधर की क्या होती है।

जीवन पाया पर जिया नहीं मन ने जो चाहा किया नहीं,
सम्मुख सारा सागर था पर इक अंजुलि भी जल पिया नहीं।
सागर की लहरों से मिलकर कुछ भाव हृदय के जब बहके,
तब जाकर जीवन ने जाना आस हृदय की क्या होती है।

मिलने को तो मिले बहुत पर क्षण सुख के सारे मौन रहे,
छलने वाले मिले बहुत पर मन बसने वाले गौण रहे।
कुछ दूर क्षितिज तक साथ वहाँ देखा संग-संग जब चल के,
तब जाकर जीवन ने जाना आस मिलन की क्या होती है।

जब आँसू पलकों से ढलके इन हाथों ने पोंछा उनको,
जब कभी अकेला मन भटका तब यादों ने रोका उनको।
आँसू की पीड़ा क्या होती ये समझा यादों में बसके,
तब जाकर जीवन ने जाना प्यास नयन की क्या होती है।

यही सोचते जीवन बीता धरती कब तक रहे पियासी,
मन के नील गगन की जाने कैसे होगी दूर उदासी।
मौन उदासी को समझा जब मन आया धरती से मिलके,
तब जाकर जीवन ने जाना चुभन प्यास की क्या होती है।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        20 अगस्त, 2025
       


आज की रात मेरे गीतों को जीवन दे दो

आज की रात मेरे गीतों को जीवन दे दो

आज की रात मेरे गीतों को जीवन दे दो,
होंठों से छू के मेरे गीत अमर हो जायें।

जो भी लिखे भाव तेरी चाहतों के पुष्प बने,
मेरी आँखों में सजे चाहतों के दृश्य बने।
पंक्ति-पंक्ति में तेरे होने का आभास किया,
गीत के शब्द में बस तेरा ही अहसास जिया।
आज की रात मेरे गीतों का चुंबन ले लो,
होंठों से छू के मेरे गीत अमर हो जायें।

देख संध्या को सजाने लगी सावन की घटा,
हर उपवन को भी भाने लगी है तेरी अदा।
देखो मेघों ने मचल गीत कोई गाया है,
मन के आँगन में भी चहुँओर नशा छाया है।
आज की रात मेरे गीतों को सावन दे दो,
भींगे सावन में मेरे गीत अमर हो जायें।

जाती किरणों ने भी संदेश नया भेजा है,
नभ कपोलों पे भी इक छाई नई रेखा है।
लौटते नीड़ के सभी पंछी मुस्कुराते हैं,
देख संध्या की किरण वो गीत नया गाते हैं।
आज की साँझ मेरे गीतों का वंदन कर दो,
सज के अधरों से मेरे गीत अमर हो जायें।

रातरानी भी मेरे गीत को महका जाये,
मन के भावों में नया भाव वो दहका जाये।
भाव अकेले हैं मेरे आज दुकेली कर दो,
मेरे हाथों को सजा अपनी हथेली धर दो।
आज की रात मेरे गीतों को चंदन कर दो,
बन के खुशबू ये मेरे गीत महकते जायें।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        18 अगस्त, 2025

कैसे भूल जाऊँ

कैसे भूल जाऊँ

क्या कहूँ मैं बात दिल की दर्द मैं कैसे बताऊँ
जख्म जो दिल को मिला है सोचता कैसे जताऊं

यूँ तो हमने लिख दिए हैं हाल ये दिल इन कागजों पे
पर सोचता हूँ हाल दिल का उनको मैं कैसे सुनाऊँ

छोड़ ही देता अगर वो मुड़ के यूँ न देखते
एक उनसे राब्ता है अब छोड़ उनको कैसे जाऊँ

माना अब भी आसना है उनका दिल मेरे लिये
पर जमाने की फिकर दिल से उनके कैसे मिटाऊँ

चाहतों के गीत उनके होंठ पर अब तक सजे हैं
देव अब तुम ही कहो ये बात कैसे भूल जाऊँ

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        17 अगस्त, 2025

ऐसे भाव सजाना साथी

ऐसे भाव सजाना साथी

गीतों की प्रिय मधुशाला से जब प्रेम पियाली छलकाना,
दो बूँद अधर को छू जाये ऐसे भाव सजाना साथी।

हमने भी कुछ गीत लिखे पर शायद भाव नहीं छू पाये,
या फिर मेरी किसी पंक्ति ने उम्मीदों के हृदय दुखाये।
कुछ वादे कुछ कसमें मेरे शायद मन को झूठ लगे हों,
या फिर मेरे किसी शब्द से नाजुक मन को चोट लगे हों।

शब्दों की प्रिय मधुशाला से शब्द भाव जब भी छलकाना,
दो शब्द हृदय को छू जाये ऐसे शब्द सजाना साथी।

सबकी अपनी-अपनी पीड़ा कौन किसी की पीर सुनेगा,
जिसके पग न फटी बेवाई वो कैसे गंभीर रहेगा।
हमने थोड़े दर्द लिखे हैं लेकिन पूरा नहीं जताया,
हुए तिरस्कृत कई दफा पर लेकिन मन ने नहीं जताया।

भीतर के उस कोलाहल को यदि भावों से पड़े जताना,
मन को अपने वश में करके स्नेहिल भाव जताना साथी।

क्या लाये थे इस जीवन में जिसकी खातिर रोना इतना,
अंतिम पथ तक कौन चला है जिसकी खातिर डरना इतना।
थोड़ी खुशियाँ ग़म थोड़े हैं ये जीवन की है सच्चाई,
जिसने सबको गले लगाया नापी उसने यहाँ उचाई।

खोया-पाया के भावों को गीतों में जब पड़े जताना,
तब रिश्तों में मर्यादा के मंजुल भाव पिरोना साथी।

गीतों की प्रिय मधुशाला से जब प्रेम पियाली छलकाना,
दो बूँद अधर को छू जाये ऐसे भाव सजाना साथी।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        09 अगस्त, 2025
 

तब तुम आना पास प्रिये

तब तुम आना पास प्रिये

जब मन में सुंदर भाव बनें
जब पुष्प सुगंधित खिल जाएंँ
जब दिल के उस सूनेपन में
निष्कपट ज्योति सी जल जाये
जब प्रेम मधुर हो गीत बने
जब गीत चाँदनी सज जाये
जब गीत कभी गाना चाहो
जब खुद से तुम मिलना चाहो
जब भी चाहो मधुमास प्रिये
तब तुम आ जाना पास प्रिये।

जब याद पुरानी तड़पाये
सिहरन कोई मन छू जाये
जब चले वहाँ पिय पुरवाई
आँचल फिर से ढलका जाये
जब तारों की बारात सजे
मन चाहे गाये गीत नये
जब स्वप्न नया बुनना चाहो
जब रीत नई गढ़ना चाहो
जब चाहो नव आकाश प्रिये
तब तुम आ जाना पास प्रिये।

जब ठंड दुपहरी तक जाये
जब धूप सुनहरी खिल जाये
जब बारिश का भीगा मौसम
मन भावों को ललचा जाये
ऋतुओं के भँवर जाल में फँस
जब डूब डूब मन उलझाए
जब उलझन से बचना चाहो
जब खुलकर तुम हँसना चाहो 
जब चाहो तुम विश्वास प्रिये
तब तुम आ जाना पास प्रिये।

स्मृतियों का पावन गंगाजल
आँचल में अपने भर लेना
जब एकाकी में घिरो कभी
तो याद मुझे तुम कर लेना
स्मृतियों के उस पुण्य भाव को
इन पलकों बीच सजा लेना
स्मृतियों से जब मिलना चाहो
जब खुद से कुछ कहना चाहो
जब भी चाहो अहसास प्रिये
तब तुम आ जाना पास प्रिये।

 ✍️अजय कुमार पाण्डेय 
      हैदराबाद

विश्वास

विश्वास

पलकों के कोरों से ढलके जाने कितने सपन सलोने,
लेकिन इक भी बार नयन ने उम्मीदों का साथ न छोड़ा।

मेरी क्या हस्ती औरों में जो उनका अनुरंजन करता,
मेरा क्या कौशल था जिसका उनके सम्मुख वंदन करता। 
मेरे मन की सपन हंसिनी कब आकाशों को छू पाई,
मौन निगोड़े चित्र रहे सब कब औरों का मन छू पाई।

भर-भर कर फिर-फिर सूखे हैं आयी कितनी बार भिंगोने,
लेकिन इक भी बार नयन ने इन मेघों का साथ न छोड़ा।

मैं कब प्रियतम रहा किसी का जो उनका आलोड़न पाता,
उनकी खातिर यायावर था उनसे क्या अनुमोदन पाता।
जब-जब मन में हुक उठी है तब-तब हमने कलम उठाई,
मनोभाव जब लिखना चाहा काँपी उँगली और कलाई।

लिख-लिख कर भी रहे अधूरे और शब्द थे सूने-सूने,
लेकिन इक भी बार कलम ने इस उँगली का साथ न छोड़ा।

मेरे सपने छोटे-छोटे नहीं अधिक को चाह रही है,
फिर भी झूठे संवादों में हमने केवल आह सही है।
हुए तिरस्कृत कई दफा हैं किंतु शेष उनकी परछाईं,
अंतस की स्मृतियों में भी कहीं दबी उनकी अँगड़ाई।

झूठे संवादों से छलनी अंतस के हर कोने-कोने,
फिर भी इक भी बार हृदय ने रिश्तों का विश्वास न तोड़ा।

✍️©अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        06 अगस्त, 2025


राम-नाम सत्य जगत में

राम-नाम सत्य जगत में

राम-नाम बस सत्य जगत में और झूठे सब बेपार,
ज्ञान ध्यान तप त्याग तपस्या बस ये है भक्ति का सार।
तन मन धन सब अर्पित प्रभु को क्यूँ हृदय में हाहाकार,
जेहिं तन में आनंद बसत है वहिं प्रभु का है अवतार।
राग द्वेष मद लोभ जगत में सब पाप के हैं आधार,
ये सत्य सनातम धर्म मार्ग एक मात्र मोक्ष का द्वार।
रकम जोड़ कर धरम खरीदे और भरे यहाँ भंडार,
तोलहिं नेह तराजू जे रख सब झूठ के शोभाकार।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        03 अगस्त, 2025

ख़याल करता हूँ

ख़याल करता हूँ वतन को बाँटने वालों से सवाल करता हूँ, मैं आज भी उसी भारत का ख़याल करता हूँ। जो सच की बात करे उसकी आवाज़ दबती है, मैं ऐसे हर सि...