ऐसे भाव सजाना साथी

ऐसे भाव सजाना साथी

गीतों की प्रिय मधुशाला से जब प्रेम पियाली छलकाना,
दो बूँद अधर को छू जाये ऐसे भाव सजाना साथी।

हमने भी कुछ गीत लिखे पर शायद भाव नहीं छू पाये,
या फिर मेरी किसी पंक्ति ने उम्मीदों के हृदय दुखाये।
कुछ वादे कुछ कसमें मेरे शायद मन को झूठ लगे हों,
या फिर मेरे किसी शब्द से नाजुक मन को चोट लगे हों।

शब्दों की प्रिय मधुशाला से शब्द भाव जब भी छलकाना,
दो शब्द हृदय को छू जाये ऐसे शब्द सजाना साथी।

सबकी अपनी-अपनी पीड़ा कौन किसी की पीर सुनेगा,
जिसके पग न फटी बेवाई वो कैसे गंभीर रहेगा।
हमने थोड़े दर्द लिखे हैं लेकिन पूरा नहीं जताया,
हुए तिरस्कृत कई दफा पर लेकिन मन ने नहीं जताया।

भीतर के उस कोलाहल को यदि भावों से पड़े जताना,
मन को अपने वश में करके स्नेहिल भाव जताना साथी।

क्या लाये थे इस जीवन में जिसकी खातिर रोना इतना,
अंतिम पथ तक कौन चला है जिसकी खातिर डरना इतना।
थोड़ी खुशियाँ ग़म थोड़े हैं ये जीवन की है सच्चाई,
जिसने सबको गले लगाया नापी उसने यहाँ उचाई।

खोया-पाया के भावों को गीतों में जब पड़े जताना,
तब रिश्तों में मर्यादा के मंजुल भाव पिरोना साथी।

गीतों की प्रिय मधुशाला से जब प्रेम पियाली छलकाना,
दो बूँद अधर को छू जाये ऐसे भाव सजाना साथी।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        09 अगस्त, 2025
 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ग़ज़ल - आँखें भींग जाती हैं

ग़ज़ल - आँखें भींग जाती हैं  तुझे यादों में मिलता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तुझे मैं ख़त में लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं ​ तेरा चेहरा ही ब...