विश्वास

विश्वास

पलकों के कोरों से ढलके जाने कितने सपन सलोने,
लेकिन इक भी बार नयन ने उम्मीदों का साथ न छोड़ा।

मेरी क्या हस्ती औरों में जो उनका अनुरंजन करता,
मेरा क्या कौशल था जिसका उनके सम्मुख वंदन करता। 
मेरे मन की सपन हंसिनी कब आकाशों को छू पाई,
मौन निगोड़े चित्र रहे सब कब औरों का मन छू पाई।

भर-भर कर फिर-फिर सूखे हैं आयी कितनी बार भिंगोने,
लेकिन इक भी बार नयन ने इन मेघों का साथ न छोड़ा।

मैं कब प्रियतम रहा किसी का जो उनका आलोड़न पाता,
उनकी खातिर यायावर था उनसे क्या अनुमोदन पाता।
जब-जब मन में हुक उठी है तब-तब हमने कलम उठाई,
मनोभाव जब लिखना चाहा काँपी उँगली और कलाई।

लिख-लिख कर भी रहे अधूरे और शब्द थे सूने-सूने,
लेकिन इक भी बार कलम ने इस उँगली का साथ न छोड़ा।

मेरे सपने छोटे-छोटे नहीं अधिक को चाह रही है,
फिर भी झूठे संवादों में हमने केवल आह सही है।
हुए तिरस्कृत कई दफा हैं किंतु शेष उनकी परछाईं,
अंतस की स्मृतियों में भी कहीं दबी उनकी अँगड़ाई।

झूठे संवादों से छलनी अंतस के हर कोने-कोने,
फिर भी इक भी बार हृदय ने रिश्तों का विश्वास न तोड़ा।

✍️©अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        06 अगस्त, 2025


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