जीवन की मधुमय प्याली से दो बूँद अधर पर जब छलके,
तब जाकर जीवन ने जाना प्यास अधर की क्या होती है।
जीवन पाया पर जिया नहीं मन ने जो चाहा किया नहीं,
सम्मुख सारा सागर था पर इक अंजुलि भी जल पिया नहीं।
सागर की लहरों से मिलकर कुछ भाव हृदय के जब बहके,
तब जाकर जीवन ने जाना आस हृदय की क्या होती है।
मिलने को तो मिले बहुत पर क्षण सुख के सारे मौन रहे,
छलने वाले मिले बहुत पर मन बसने वाले गौण रहे।
कुछ दूर क्षितिज तक साथ वहाँ देखा संग-संग जब चल के,
तब जाकर जीवन ने जाना आस मिलन की क्या होती है।
जब आँसू पलकों से ढलके इन हाथों ने पोंछा उनको,
जब कभी अकेला मन भटका तब यादों ने रोका उनको।
आँसू की पीड़ा क्या होती ये समझा यादों में बसके,
तब जाकर जीवन ने जाना प्यास नयन की क्या होती है।
यही सोचते जीवन बीता धरती कब तक रहे पियासी,
मन के नील गगन की जाने कैसे होगी दूर उदासी।
मौन उदासी को समझा जब मन आया धरती से मिलके,
तब जाकर जीवन ने जाना चुभन प्यास की क्या होती है।
©✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
20 अगस्त, 2025
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