उम्मीदों का सफर

उम्मीदों का सफर

मत पूछो क्यूँ रातों में हम यूँ जगते रहते हैं
सच ये है तारों के संग-संग हम तो चलते रहते हैं

रस्ता वो ही नये मुसाफिर नई-नई आशाएं हैं
काँधों पर इन आशाओं को ले हम तो जगते रहते हैं

इन दो पटरी पे उम्मीदों की हर रोज कहानी गढ़ती है
उम्मीदों की वही कहानी हम भी तो लिखते रहते हैं

जाड़ा-गरमी धूप-ताप अरु बरसातों के कितने मौसम
मौसम के हर हालातों को हम तो सहते रहते हैं

औरों की स्नेहिल मुस्कानों में हम भी अपने दर्द छुपाकर
आते-जाते इन राहों में अकसर हम तो हँसते रहते हैं

अपना जीवन रेल की पटरी आज कहीं कल कहीं ठिकाना
खुशियों की सौगात लिये हर पल हम तो चलते रहते हैं

कहे देव ये ये सफर सुहाना उम्मीदों और सपनों का
इन उम्मीदों से मिलकर खुद से हम तो मिलते रहते हैं

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        31 अगस्त, 2025

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