मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो

मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो


मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो,
इक दूजे के मन को पढ़ लो विश्वास हृदय का मत तोड़ो,
मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो।

रिश्तों में नहीं स्वार्थ रहे और रहे नहीं सौदेबाजी,
एक दूजे का साथ रहे और रहे हमेशा मन राजी।
भाव किसी के मन में उपजे दूजे का मन उसको पढ़ ले,
नयनों के झुकने से पहले उनकी भाषा को मन पढ़ ले।

नयनों की भाषा को पढ़ लो आस नयन के मत तोड़ो,
मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो।

क्या लाये थे इस जीवन में और साथ क्या ले जाओगे,
जो कुछ दोगे यहाँ जगत को वही जगत से तुम पाओगे।
धन दौलत ये महल दुमहले ये सारे इक आडंबर है,
अपने भीतर झाँको देखो सच्चा सुख मन के अंदर है।

मन की दौलत बहुत बड़ी है मत इनसे तुम नाता तोड़ो,
मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो।

पुण्य पंथ है जीवन पथ ये और पथिक मन इस जीवन का,
दूर क्षितिज तक वो महकेगा जिसका तन मन धन चंदन का।
झूठे आडंबर से बच जो मर्म हृदय का पढ़ पायेगा,
काल खंड के ताम्र पत्र पर वही गीत नव गढ़ पायेगा।

पुण्य पथिक हो पुण्य पंथ के पुण्य प्रेम का पथ मत छोड़ो,
मन से मन का मेल जहाँ हो निजी स्वार्थ की बातें छोड़ो।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        20 अगस्त, 2025

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