कलयुग का कुरुक्षेत्र

कलयुग का कुरुक्षेत्र 

सत्ता के इस महासमर में कोटि-कोटि सेनायें हैं 
शास्त्र कहीं पर शस्त्र कहीं पर खुशी कहीं पर आहें हैं 
ताल ठोक कर खड़े हैं रण में सबके अपने वादे हैं 
लेकिन द्यूतसभा में कितने नैतिकता से भागे हैं 
कितने वादे झूठे निकले कितनी कसमें तोड़ी हैं 
शकुनी की कुत्सित चालों ने कितनी राहें मोड़ी हैं 
कितने शीश कटेंगे रण में कितनी खुशियाँ लूटेगी 
धूल धूसरित श्वेत वसन से रक्त कोपलें फूटेँगी 
नैन नहीं था राष्ट्र प्रमुख को मोह चीख पर भारी थी 
सत्ता के उस कुरुक्षेत्र में सत्य वेदना हारी थी 
ज्ञानी से दरबार सजा था लोभ तर्क पर भारी था 
झूठ लबादा ओढ़ सदन में हाथ लिये दोधारी था 
चीख अनसुनी हुई सदन नैतिकता निर्वस्त्र हो रही 
कुंठित मन के घुटे भाव सत्ता ही मदमत्त हो रही 
राम नाम का ओढ़ दुशाला कुंठा युग पर भारी थी 
लक्ष्मण रेखा खिंची थी पर सीता फिर भी हारी थी 
सत्ता मद में डूबी कुंठा जहाँ धर्म को मारेगी 
कुरुक्षेत्र के महासमर में अर्जुन से फिर हारेगी 
व्यूह रचे हों लाख मगर सत्यकाम अब नहीं डरेगा 
कलयुग के इस कुरुक्षेत्र में अभिमन्यु अब नहीं मरेगा।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 
     12 फरवरी, 2026

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