नैतिकता की चीर
सिंहासन के इर्द-गिर्द बस मूक बधिर की टोली है,
जा गौरैया यहाँ सभा से खाली इनकी झोली है।
वो क्या देंगे तुझको जिनकी अपनी आत्मा छोटी है,
उनपर कोई असर न होगा जिनकी चमड़ी मोटी है।
द्यूतसभा जब बनी व्यवस्था नैतिकता की चीर हरेगी,
स्वार्थ ओढ़ कर श्वेत लबादा चोट बहुत गंभीर करेगी।
बीच सभा नीति खड़ी है चीर दुशासन लिये हाथ में,
जोर लगाकर खींच रहा देख रहे सब मौन साध के ।
ज्ञान ध्यान की आँखों पर पुनः लोभ का पर्दा है,
मैला आँचल नेत्र झुका है बेशर्मी का गर्दा है।
कुरु प्रमुख हो चले व्यवस्था अंधों का जब शासन हो,
मौन रहें जब भीष्म सदन में कैसे फिर अनुशासन हो।
अधिकारों की पृष्ठ भूमि में जब कर्तव्यों का मर्दन हो,
नैतिकता के कुरुक्षेत्र में कैसे इनका वंदन हो।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
15 फरवरी, 2026
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