॥ श्रीगीता (अवधी चौपाई) ॥
🌿 मंगलाचरण (दोहा)
वंदन करउँ सो सत्य ही, जेहि जग के आधार कृष्ण वचन गीता बनहिं, जीवन के विस्तार॥
धर्मभूमि मँह जब उठे, संशय के अति धूल। तब प्रकटे गीता सुधा, हरै हिये के शूल॥
🌸 प्रस्तावना (चौपाई)
जब-जब जीवन रण बनि जाई। मन उलझे जब मोह सहाई॥ होहिं परस्पर द्वंद्व अपारा। नयन भरहिं जब नीर की धारा॥ धर्म पुकारे सत के राहा। ममता बाँधे मन के चाहा॥ तब गीता कर दीप जलावे। मोह-तमस को दूर भगावे॥
कुरुक्षेत्र नहिं केवल भूमी। मानुष तन मँह द्वंद्व अहूमी॥ भीतर चलत निरंतर युद्धा। आत्मा दर्पण करहिं विशुद्धा॥ इक तो मोह-पाश दुखदाई। दूजी मन में कठिन लड़ाई॥ स्वार्थ जाल इक ओर पसारा। दूजे सत्य-दुआर पियारा॥
पार्थ रूप सब जीव खड़ा है। संशय के अँधियार पड़ा है॥ नाते-रिश्ते बंधन भारी। व्याकुल मन गलियारे भारी॥ तब माधव कर गूँजे बानी। अमृत धार बहे जिमि जानी॥ चेतन सुरुज उगे तब नीका। मिटे तमस जो हृदय सतीका॥
🌸 ज्ञान संदेश (चौपाई)
आतम अजर अमर अविनासी। मरत न जनमत यह सुखरासी॥ जैसे नर तज वस्त्र पुराना। देह बदलत त्यों जानु सयाना॥ दुख-सुख लाभ-हानि सब माया। आवत जावत जैसे छाया॥ समता भाव धरे मन माँही। सत्य लखत सोई जन-माँही॥
धरम हेतु तुम कर्म कराऊ। फल की चिंता दूर बहाऊ॥ करहु समर्पण हरि के चरणा। तजहु मान प्रभु की बस शरणा॥ ज्ञान-दीप अज्ञान नसावे। भक्ति-प्रेम अनुराग बढ़ावे॥ कर्मयोग के पथ पर धाये। सफल जनम सोई नर पावे॥
🌸 गीता महत्त्व (चौपाई)
गीता शास्त्र मात्र नहिं जानहु। जीवन तत्व सार पहिचानहु॥ मानुष के अंतस कर बाता। भाव-विस्तार सकल सुखदाता॥ पढ़ने वाले पावत पंथा। कर्मयोग कर आधार यह ग्रंथा॥ ज्ञानी भक्त और जे योगी। पावत दिव्य प्रकास निरोगी॥
अमर ज्ञान युग-युग हरसावा। संकट मँह जो राह दिखावा॥ जाके मन मँह गीता बसिहें। सोई सत्य पथ सहजहिं गहिहें॥ जो गीता जिय मँह उपजावे। भय से मुक्त परम सुख पावे॥ आतम से परमात्मा ताईं। पावहिं पंथ कवनु कठिनाई॥
🌼 समापन (दोहा)
गीता जाके मन बसे, मिटे सकल जंजाल। भक्ति ज्ञान अरु कर्म से, जीवन हो खुशहाल॥
शांति समर्पण त्याग मँह, बसे मान कल्यान। गीता कर संदेस यह, जग हित अमृत दान॥
॥ श्रीमद्भगवद्गीता: प्रथम अध्याय (सरल हिंदी सार) ॥
युद्ध की शुरुआत (धृतराष्ट्र का प्रश्न):
धर्म भूमि कुरुक्षेत्र मँझारी। जुटे युद्ध सब वीर विचारी॥ धृतराष्ट्र पूँछें संजय बाता। पांडु पुत्र क्या करते ताता॥ धृतराष्ट्र पुनि संजय पूछा। रण भूमी महँ का विधि सूझा॥ मम सुत पांडु पुत्र मिलि भाई। करत युद्ध का नीति बनाई॥ संजय बोले धीरज धारी। पांडव सैन्य खड़ी है भारी॥
दुर्योधन का अभिमान और सेना वर्णन:
देखि पांडवहिं सैन्य विशाला। दुर्योधन तब भयू बिहाला॥ देखि सैन्य व्याकुल चित भयऊ। दुर्योधन समीप गुरु गयऊ॥ गुरु द्रोण पहिं जाइ सुनाई। भीष्म रक्षित सैन्य दिखाई॥ द्रोण! देखिये पाण्डव सेना। सजी खड़ी जो बुद्धि प्रवीणा॥ भीम, अर्जुन अरु वीर विराट। द्रुपद खड़ा ज्यों महा सम्राट॥ चेकितान, काशिनरेश बली। कुन्तिभोज अरु वीर अति भली॥
कौरव दल के योद्धा:
हमारे भी योद्धा सुन लीजै। नायक नाम ध्यान अब दीजै॥ गंगा सुत भीषण रणधीरा। जिमि सागर अति गहर गभीरा॥ इच्छा मृत्यु वरदान सुहावा। कालहु देखि देखि डरि जावा॥ द्रोण चतुर धनु विद्या धारी। शस्त्र अस्त्र के ज्ञाता भारी॥ पाण्डव कौरव गुरु कहलाए। अद्भुत कौशल रण में लाए॥ सूर्य पुत्र कर्ण महादानी। समर वीर सम कोउ न ज्ञानी॥ कवच कुंडल तन सोभा पावा। रिपु दल देखि देखि थर्रावा॥ दुर्योधन अभिमान बढ़ावहिं। अनीति मार्ग पर पैर बढ़ावहिं॥ दुःशासन बल बुद्धि विहीना। कुल कलंक दुख साहस कीना॥ अश्वत्थामा काल समाना। शिव अंसा अति महा बवाना॥ अमर वीर नहिं मृत्यु डराई। भीषण अस्त्र काल सम आई॥
पांडव योद्धा वर्णन
धर्म राज अति धीर सुजाना। सत्य वचन जिन्ह के प्रवाना॥ यम के अंश शांत मति धारी। नीति निपुण सब जग हितकारी॥ पवन पुत्र भीम बलवंता। गदा युद्ध महँ कोउ न अंता॥ दस सहस्र गज शक्ति शरीरा। रिपु दल दलन वीर रणधीरा॥ पार्थ धनुष गांडीव संभारे। कपिध्वज रथ पर प्रभु पगु धारे॥ सव्यसाची अस्त्रन के ज्ञाता। महाबाहु जय विजय विधाता॥ नकुल रूप अति सुंदर सोहे। अश्व विधा लखि मुनि मन मोहे॥ सहदेव सुज्ञ त्रिकाल विचारी। ज्योतिष विद्या निपुण अपारी॥ सुभद्रा सुत वीर किशोरा। चक्रव्यूह महुँ कीन्ह मरोरा॥ अल्प आयु यश कीर्ति कमाई। समर भूमि अद्भुत गति पाई॥
शंखों की गूँज:
भीष्म पितामह शंख बजाया। सिंह नाद सम गगन गुँजाया॥ तब माधव ने शंख बजाया। अर्जुन ने भी स्वर फैलाया॥ पाञ्चजन्य गूँजा देवदत्त। गूँज उठा रण क्षेत्र प्रमत्त॥ काँप उठे रिपु के तन मन। गूँज उठी धरती और गगन॥
अर्जुन का मोह और विषाद:
कपिध्वज रथ पर पार्थ विराजे। अच्युत! से तब विनती साजे॥ दोनों सेना के बीच खड़ाऊँ। अपने जन के देखन चाहूँ ॥ देखि स्वजन अर्जुन मन मोहा। हृदय शोक उपजा अति छोहा॥ काँपत अंग नैन भरि बारी। गांडीव हाथ गिरत धनु भारी॥
अर्जुन का विलाप:
केशव! अंग शिथिल भये सारे। मुख सूखा, सब धीरज हारे॥ अपनों को किस कारन मारूँ। ऐसा राज्य नहीं मैं चाहूँ।। गुरु, पितामह, पुत्र अरु सखा। इन पर कैसे उठाऊँ शखा॥ कुल का नाश अधर्म बढ़ावे। कुल का यश सब नरक में जावे॥
त्याग और शोक:
कुल के नास अधर्म पसारा। धर्म लोप होइहहिं संसारा॥ कुल के नाशे धर्म नशाहीं। नारि दूषित नरक महुँ जाहीं॥ पितर गिरहिं अरु वंश विनासा। नरक वास कर होत तमासा॥ पाप लगे हमका प्रभु भारी। बंधु मारि का होय सुखारी॥ मारहिं भल सब हमका आके। कैसे शस्त्र उठाऊँ जाके॥ कहिके अर्जुन रथ पर बैठा। शोक मग्न हो मन में ऐंठा॥ धनुष बाण सब नीचे डाले। आँखों में आँसू भर पाले॥ अश्रु भरत नयनन अस भारी। बैठ्यु पार्थ धनुष तजि डारी॥ कायरता वश बुद्धि भुलानी। का श्रेयस्कर कहहु बखानी॥ शिष्य भाव प्रभु शरण तुम्हारी। संशय हरहु कृष्ण बनवारी॥
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