जाने किधर गये
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।
कल तक जो थे पास हमारे,
क्या जाने वो किधर गये।
टूट गई है माला, मोती बिखर गये।।
आँगन वही, दीवारें वो ही
बस उनकी आवाज़ नहीं है।
दरवाज़े पर आँखें ठहरीं,
आने की पर आस नहीं है।
जिन राहों पर साथ चले थे,
उनपर ही हम बिछड़ गये।
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।
सूने घर में गूँज बची है
और हृदय में बातें,
बिन तेरे कटते हैं कैसे
मेरे दिन और रातें।
तेरी यादें जब-जब आयें
नयना बरबस बरस गये
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।
अब तो बस तस्वीर से पूछें,
क्यों इतने मजबूर हुए ?
हम तो तेरे साथ थे लेकिन
ऐसे हम क्यूँ दूर हुए?
ऐसी क्या गलती थी मेरी
जो नैना मेरे तरस गये,
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।
रिश्तों की यह कैसी डोरी,
पल भर में जो टूट गयी।
जिससे हमने जीना सीखा
आँचल की डोरी छूट गयी।
वक्त ने कैसी चाल चली है,
सारे सपने बिखर गये।
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।
कहते हैं सब लौट के आते,
पर कौन लौट के आया।
कितनी बार पुकारा तुमको
उत्तर कुछ न पाया।
बस यादों की छाँव बची है,
जिनमें आकर ठहर गये।
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।
जब तक साँस रहेगी तन में,
तेरा नाम रहेगा।
दूर भले ही चले गए हो,
तुमपर ध्यान रहेगा।
मृत्यु भला क्या छीन सकेगी,
मन में मेरे अमर हुए
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गए।।
मन के रिश्ते कब मरते हैं,
बस आँखों से ओझल होते हैं।
जो दिल में बस कर रहते हैं,
कब आँखों में बोझल होते हैं।
माना मेरे पास नहीं हो
पर हम तुममें ही ठहर गये।
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।
टूट गई है माला, मोती बिखर गए,
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गए।।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
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