नस-नस में अंगार जगे,
मौन पड़े जो होंठ अभी तक,
उनमें अब हुंकार जगे।
झुकने वाली रीढ़ नहीं है,
आँखों में अब ज्वाला है,
अन्यायों की नींव हिलेगी,
अब हर योद्धा मतवाला है।
शंख नाद है युद्ध भूमि का
नई चेतना धार चलेगी,
जो अधिकार दबे थे कल तक,
उनके हित तलवार चलेगी।
मेहनत ही पहचान बनेगी
अब जन गण मन बोलेगा,
कुरुक्षेत्र में पार्थ खड़ा हो
अब प्रत्यंचा खोलेगा।
कुर्सी सेवा का आसन है,
सत्ता कोई ताज नहीं,
जनता से जो दूर हुआ तो
उसका कोई राज नहीं।
झूठे वादों और नारों का
अब अंधकार भागेगा,
लोकतंत्र के मंदिर में फिर
जन-जन का स्वर गायेगा।
जाति-धर्म की दीवारों से
ऊँचा मानव धर्म रहे,
जिस भारत में श्रम का गौरव,
उस भारत का मर्म रहे।
अब न कोई भय आँखों में,
अब न कोई मौन रहेगा,
सत्य जहाँ भी दबता होगा,
वहाँ नया स्वर कौन कहेगा?
हम तूफानों से टकराएँ,
हम चट्टानों से भिड़ जाएँ,
जिस मंजिल पर न्याय खड़ा हो,
उस मंजिल तक बढ़ते जाएँ।
रक्त नहीं, संकल्प चाहिए,
भारत श्रेष्ठ बनाना है,
हर अलसाई आँखों में,
नूतन स्वप्न जगाना है।
आज समय ने द्वार खटखटाया,
अब निर्णय की घड़ी खड़ी,
कल तक जो केवल सोच रहे थे,
अब उनकी बारी आन पड़ी।
चलो उठाएँ मशाल सत्य की,
चलो जगाएँ सोया देश,
अन्यायों के अंधकार में,
नव प्रकाश का दें संदेश।
अब न कोई आवाज दबेगी,
न कोई अधिकार झुकेगा,
जिस भारत का स्वप्न सजाया,
वह भारत अब न रुकेगा।
सीने में विश्वास जगे तो
पर्वत भी झुक जाते हैं,
जनता जब संकल्प करे तो
युग के पक्ष बदल जाते हैं।
शंखनाद है राष्ट्र प्रेम का ,
पीछे कैसे हटना,
जीवन से बढ़कर है अपने,
सत्य राह पर चलना,
मुट्ठी में संकल्प लिए हम,
हर बदलेंगे अँधियारा
जनता की हुंकार से गूँजे,
भारत का जयकारा।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें