आखिर कब तक
कह तो सकता हूँ, पर कैसे,
सह भी सकता हूँ, पर कब तक,
रह भी सकता हूँ पर कब तक,
आखिर कब तक यूँ होगा?
नारी की आँखों में आँसू,
होठों पर चुप्पी भारी है,
घर की देहरी से संसद तक,
किसकी अब जिम्मेदारी है?
जिसने जीवन भर बस झेला ,
उसका भी सम्मान तो होगा,
आखिर कब तक यूँ होगा?
पुरुष खड़ा है धूप में तनकर,
मन में कितने घाव लिए,
हँसता है दुनिया के आगे,
अंदर कितने दाव लिए।
जिस दर्द को कह न पाया,
उसका कुछ अहसास तो होगा,
आखिर कब तक यूँ होगा?
मेहनत जिसने रातें काटीं,
योग्यता को साथ रखा,
फिर भी अवसर उनसे छीना,
जिनका केवल हाथ बड़ा।
कब तक प्रतिभा द्वार खड़ी हो,
क्या प्रतिभा का सम्मान भी होगा
आखिर कब तक यूँ होगा?
सत्ता सेवा से दूर हुई है,
राजनीति व्यापार बनी,
शब्द हुए हैं खोखले सारे,
नीयत जैसे हार बनी।
कुर्सी से ऊपर देश उठेगा,
कब ऐसा ऐलान तो होगा,
आखिर कब तक यूँ होगा?
जाति-धर्म के नाम पे बाँटें,
मन में दीवारें खींच रहे,
अपने ही घर के आँगन में,
अपने ही रिश्ते रीझ रहे।
जिस दिन मानव पहले होगा,
उस दिन नया विहान तो होगा,
आखिर कब तक यूँ होगा?
बिकता सच अखबारों में है,
झूठ सजाया जाता है,
जिसके पास नहीं है ताकत,
उसको ही दबाया जाता है।
निर्बल की आवाज सुनेगी,
ऐसा कोई प्रभात तो होगा।
आखिर कब तक यूँ होगा?
शिक्षा लेकर युवा खड़े हैं,
आँखों में अरमान लिए,
योग्य हाथ अवसर को तरसें,
कंधों पर सम्मान लिए।
मेहनत की फिर कीमत होगी,
ऐसा फिर अंदाज तो होगा,
आखिर कब तक यूँ होगा?
जो चुप हैं, उनकी चुप्पी भी
एक दिवस आवाज बनेगी,
झूठ की ऊँची दीवारों पर
सच की पहली छाप पड़ेगी।
अन्यायों की रात ढलेगी,
न्याय का फिर प्रात तो होगा
आखिर कब तक यूँ होगा?
चलना होगा, कहना होगा,
सहना भी ये कब तक होगा।
अन्याय की हर दीवारों को
एक न एक दिन ढहना होगा
हम बदलेंगे, पल बदलेगा,
फिर से नया विहान तो होगा,
आखिर ऐसा कब होगा?
✍️अजय कुमार पाण्डेय
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