गंगा की सौगंध : एक स्वाभिमानी की यात्रा

 
गंगा की सौगंध: एक स्वाभिमानी की यात्रा

समर्पण

 जीवन-संध्या के मौन संतों और कर्मयोगियों के चरणों में

प्रथम अर्घ्य: संसार के समस्त कर्मठ पिताओं के पावन चरणों में

यह आत्मकथात्मक दस्तावेज धरती के उन तमाम मौन, अनथक और कर्मठ पिताओं के चरणों में साष्टांग समर्पित है, जिनकी रीढ़ की हड्डी पर आधुनिक समाज की अट्टालिकाएं खड़ी हैं, मगर जिनकी अपनी दास्तानें हमेशा इतिहास के पन्नों से ओझल रह जाती हैं।
यह समर्पण उन पिताओं के नाम है, जो ज्येष्ठ की चिलचिलाती धूप, सावन के चिपचिपे पसीने और पौष की हाड़ कंपा देने वाली रातों में अपने सपनों की बलि चढ़ाकर केवल इसलिए कारखानों के सायरन, रेलवे यार्डों की गिट्टियों और दफ्तरों के बही-खातों के बीच अपनी उम्र गलाते रहे ताकि उनके बच्चों के चेहरे पर कभी अभाव की धूल न पड़े।
यह उन पिताओं की वंदना है, जिन्होंने बाज़ारों में अपनी संतानों के लिए महंगे खिलौने, कॉपियाँ और बस्ते खरीदते वक्त खुद अपनी जेब के फटे अस्तर में उँगलियाँ छिपाए रखीं; जिन्होंने अपने फटे हुए जूतों के तलवों में अखबार और गत्ते की तहें लगाकर मीलों का सफर पैदल तय किया ताकि बस का किराया बचाकर शाम को मुन्नी के लिए रेखागणित का डिब्बा या बेटे के लिए प्रतियोगिता परीक्षा की पत्रिका खरीदी जा सके। जिन्होंने कभी अपने लिए नया कुर्ता नहीं माँगा, जिन्होंने कैंटीन में दोपहर की चाय और समोसे का त्याग करके हलक के नीचे केवल सादा पानी उतारा और अपने साथियों से यह झूठा बहाना बनाया कि आज उनका पेट भारी है।
यह उन स्वाभिमानी पिताओं का आख्यान है, जिन्होंने अपनी बेटियों के कन्यादान के लिए अपनी भविष्य-निधि, अपनी ग्रेच्युटी और अपनी देह की अंतिम जमा-पूँजी को इसलिए पानी की तरह बहा दिया ताकि उनकी लाडली किसी की चौखट पर हीन भावना से कदम न रखे; और जिन्होंने अपने बेटों को उच्च पदों पर आसीन कराने के लिए महाजनों और साहूकारों के अन्यायपूर्ण कर्ज़ों की गठरी अपने कमजोर कंधों पर बाँध ली।
और फिर... जब वही औलादें अपने पैरों पर खड़ी हो गईं, जब उनके अपने पर निकल आए और वे खुले गगन में उड़ने लगीं, तो उसी भरे-पूरे दालान में खड़े होकर अपने उस बूढ़े, थके हुए बाप की छाती में यह ज़हरीला खंजर घोंप दिया—‘आखिर तुमने हमारे लिए किया ही क्या है?’
यह समर्पण उन तमाम पिताओं के उस मौन रुदन को समर्पित है, जो इस असहनीय आघात के बाद भी अपनी आँखों से आँसू नहीं टपकाते, बल्कि उस विष को महादेव की तरह अपने कंठ में धारण कर लेते हैं। जिन्होंने लाचारी और बुढ़ापे के भयानक संताप के बीच भी अपनी संतानों के सामने हाथ फैलाने से इनकार कर दिया, अपने आत्मसम्मान को अपनी लाठी बनाया और समाज की संकीर्ण दीवारों के आगे कभी अपनी पगड़ी को झुकने नहीं दिया।

द्वितीय अर्घ्य: धरती की समस्त ममतामयी और त्यागमयी माताओं के आँचल में

यह ग्रंथ संसार की उन समस्त माताओं की मौन साधना को समर्पित है, जो किसी भी घर की वह अदृश्य धुरी होती हैं जिसके दम पर समूचा परिवार अपनी धड़कनें पाता है, मगर जिनकी अपनी अभिलाषाओं का विसर्जन उस घर के चूल्हे की राख में रोज़ होता है।
यह उन माताओं के पावन चरणों में समर्पित है, जिन्होंने घर में अन्न का अभाव होने पर भी कभी अपने बच्चों को भूखे पेट सोने नहीं दिया; जिन्होंने स्वयं पानी पीकर और यह कहकर कि ‘आज मेरा एकादशी का निर्जला व्रत है’, अपने हिस्से की अंतिम आधी रोटी भी चुपके से संतानों की थाली में सरका दी।
यह उन देवियों का स्मरण है, जिनकी अलमारियों में कभी चटक बनारसी साड़ियाँ या सोने के आभूषण नहीं सजे। जिनके बक्सों में केवल वही तीन-चार सूती, घिसी हुई साड़ियाँ बची रहीं, जिन्हें वे आँगन की तार पर सुखातीं और सूखते ही सहेज कर फिर लपेट लेती थीं; जिन्होंने अपने हाथों की खुरदुरी हथेलियों से पुरानी कतरनों को जोड़-जोड़कर ऐसी गूदड़ियाँ सिलीं जो दिन भर की थकान से चूर पति और संतानों को मखमली नींद दे सकें।
यह उन साध्वियों के नाम है, जिन्होंने पैतृक कलह, बँटवारे के अन्याय और संकट के समय बिना एक पल सोचे अपनी शादी की अंतिम धरोहर—अपनी चाँदी की भारी पाज़ेब और कानों के झाले—अपने पति की हथेली पर रख दिए और भरभराते गले से कहा, ‘यह गहने नहीं, मेरे सुहाग की पगड़ी हैं; हम रूखी रोटी खा लेंगे, पर आपके माथे पर किसी साहूकार की नज़र का मैल नहीं लगने देंगे।’
यह उन माताओं के उस अथाह दर्द को समर्पित है, जो जीवन भर परिवार की ढाल बनकर खड़ी रहीं, जिन्होंने हर ताना सहा, हर अभाव झेला, मगर जब ढलती उम्र में उन्हीं के जने बेटों और बहुओं ने घर के चूल्हे अलग कर लिए, जब कमरों के किवाड़ उनके मुँह पर बंद होने लगे, तो वे किसी कोने में बैठकर अपने फटे पल्लू से मुँह ढँककर सिसकती रहीं।
और उन माताओं को, जो इस नश्वर संसार को अलविदा कहते वक्त भी अपनी बुझती हुई पुतलियों से अपने उसी भटके हुए, अहंकारी बेटे को एक अंतिम बार छाती से लगा लेने की तड़प लेकर मणिकर्णिका की लपटों में विलीन हो गईं। आपकी वह निःस्वार्थ ममता, आपका वह मूक बलिदान इस चराचर जगत का सबसे बड़ा तीर्थ है।
तृतीय अर्घ्य: समाज के समस्त उपेक्षित वरिष्ठ जनों और बुज़ुर्गों को

यह कृति संसार के उन सभी वरिष्ठ जनों, वृद्धों और अशक्त बुजुर्गों की मौन सिसकियों को समर्पित है, जो आज आधुनिकता और स्वार्थ की अंधी दौड़ में अपने ही घरों के भीतर एक 'अवांछित वस्तु' या 'लावारिस मुसाफिर' की तरह जीवन की अंतिम घड़ियाँ गिनने के लिए विवश कर दिए गए हैं।
यह उन वृद्धों की पीड़ा का सजीव दस्तावेज़ है, जिनके घुटनों का गठिया अब हड्डियों को भीतर से कुरेदता है, जिनकी आँखों में मोतियाबिंद का जाला उतर चुका है, जिनके कानों में निरंतर सन्नाटे की सीटियाँ बजती हैं, और जिन्हें खाँसी का एक घूँट पानी माँगने के लिए भी सौ बार यह सोचना पड़ता है कि कहीं उनकी आवाज़ से उनके बेटे-बहू की नींद में खलल न पड़ जाए।
यह उन बुज़ुर्गों के नाम है, जिनकी आधी सदी की तपस्या, संघर्ष और पुरुषार्थ का मोल आज की पीढ़ी केवल उनकी 'पेंशन की पासबुक', उनके 'फंड के रुपयों', 'बैंक खातों' और 'मकान की वसीयत' से लगाने की धृष्टता करती है। जब तक शरीर में जान थी, जब तक हाथ में अधिकार की कलम थी, तब तक वे पूज्य थे; और जैसे ही देह जर्जर हुई, वे अपने ही बनाए मकानों में एक कोने की सीलन भरी कोठरी में धकेल दिए गए।
यह उन सभी वरिष्ठ जनों के स्वाभिमान की जयकार है, जो इस अमानवीय उपेक्षा और लालच के सामने घुटने टेकने के बजाय अपने आत्मसम्मान की अंतिम रक्षा के लिए कड़े और अप्रत्याशित फैसले लेने का साहस दिखाते हैं। जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि बुढ़ापा भले ही शरीर को झुका दे, मगर वह एक सच्चे कर्मयोगी के स्वाभिमान की रीढ़ को कभी तोड़ नहीं सकता।
यह उन सभी उपेक्षित वृद्धों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास है कि जब रक्त के रिश्ते स्वार्थ की तराजू पर तौले जाने लगें, तब भी ईश्वर का न्याय शेष रहता है—जो किसी न किसी रूप में, कभी पोते-पोतियों के अबोध वात्सल्य के रूप में तो कभी अंतर्मन के वैराग्य के रूप में, उस ढलती साँझ को गरिमा और शांति का आलोक प्रदान करता है।

चतुर्थ अर्घ्य: जीवन-कुरुक्षेत्र के समस्त मौन कर्मयोगियों के चरणों में

अंततः, यह संपूर्ण आख्यान उन सभी अनाम, निष्काम और मौन कर्मयोगियों को समर्पित है, जो श्रीमद्भगवद्गीता के उस अमर सूत्र को केवल ग्रंथों में पढ़ते नहीं, बल्कि अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जीते हैं:

 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

यह उन वीरों को समर्पित है, जिनका जीवन जन्म लेते ही अभावों, विस्थापनों और त्रासदियों की भट्ठी में झोंक दिया गया था; जिन्होंने अनाथालय जैसी वीरानियों, ननिहाल के रूखे-सूखे आंचल और महानगरों की दमघोंटू चालों के कड़े अनुशासन के बीच अपनी पहचान खुद अपनी कलम की नोक से गढ़ी।
यह उन आत्माओं की वंदना है, जिन्होंने जीवन भर केवल देना सीखा, कभी किसी से कुछ पाने की याचना नहीं की। जिनके हिस्से में जब छल आया, तो उन्होंने बदले में प्रतिशोध नहीं लिया; जिनके हिस्से में जब पैतृक बँटवारे का खंजर और बंजर ज़मीन आई, तो उन्होंने उस पथरीली मिट्टी को भी अपने पसीने से सींचकर उपजाऊ बना दिया; और जब अपनों ने ही उनकी वफादारी और सेवा पर कालिख पोतनी चाही, तो उन्होंने विवाद के कीचड़ में उतरने के बजाय अपनी अमानत समेटकर मौन प्रस्थान का मार्ग चुना।
यह उन कर्मयोगियों के चरणों में प्रणाम है, जो जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँचकर समस्त सांसारिक मोह, संताप, क्रोध और कड़वाहट का विसर्जन कर देते हैं। जिन्होंने अपने हत्यारों को भी क्षमा किया, अपने कृतघ्न पुत्रों को भी अपने हृदय से मुक्त किया, और अपनी जीवन भर की धरोहर केवल उन निष्कपट, मासूम रूहों को सौंप दी जिन्होंने बिना किसी लोभ के उन्हें प्रेम दिया था।
यह समर्पण उस परम शांति, उस काशी विश्वनाथ की अमर ज्योति और माँ भागीरथी की शीतल धारा का आह्वान है—जहाँ पहुँचकर संसार के सारे खाते बेबाक हो जाते हैं, जहाँ आत्मा पूर्णतः भारहीन हो जाती है, और जहाँ एक साधारण, संघर्षशील मनुष्य अपने समस्त कर्तव्यों की आहुति देकर उस परमपिता के चरणों में लीन हो जाता है।
संसार के समस्त कर्मठ पिताओं, त्यागमयी माताओं, उपेक्षित वरिष्ठ जनों और जीवन-संग्राम के मौन कर्मयोगियों के चरणों में यह आत्मकथात्मक पुष्प सादर, सविनय और साष्टांग समर्पित है।


विषय-सूची

 भाग १: बचपन, विस्थापन और संघर्ष की नींव
   * अध्याय १: उजड़ा हुआ आँगन, मामा का त्याग और पश्चाताप की छाया

   * अध्याय २: मायानगरी की तपिश, रेलवे की मुहर और बनारस की राह

 * भाग २: गृहस्थी, त्याग और पारिवारिक तूफ़ान

   * अध्याय ३: सात फेरे, गंगा की छाँव और नई गृहस्थी का आरंभ

   * अध्याय ४: बँटवारे का खंजर, माँ की सूनी देहरी और रीढ़ पर आई ज़िम्मेदारी

   * अध्याय ५: अपनी ज़रूरतों की आहुति और संतानों के पंख

 * भाग ३: कृतघ्नता, ढलती उम्र और स्वाभिमान की जंग

   * अध्याय ६: 'आखिर तुमने मेरे लिए किया ही क्या?'

   * अध्याय ७: रिटायरमेंट की साँझ, पेंशन का कुरुक्षेत्र और अंतिम निर्णय

 * भाग ४: विछोह, वात्सल्य और वैराग्य

   * अध्याय ८: पछुआ बयार, खाली चौखट और महा-शून्य

   * अध्याय ९: मासूम किलकारियाँ और घावों पर वात्सल्य का मरहम

   * अध्याय १०: वैराग्य की भोर, तुलसी की माला और भगवत शरण

 * भाग ५: पूर्णाहूति और परम शांति

   * अध्याय ११: अंतिम संकल्प और निष्कपट को सर्वस्व

   * अध्याय १२: भारहीन आत्मा, ईश्वरीय अनुग्रह और भक्ति का परम संकल्प

भाग १: बचपन, विस्थापन और संघर्ष की नींव

अध्याय १: उजड़ा हुआ आँगन, मामा का त्याग और पश्चाताप की छाया

यादों की भी अपनी एक अजीब उम्र होती है। कुछ बातें कल की तरह साफ दिखती हैं, तो कुछ किसी पुराने कुएं के पेंदे में जमा पानी की तरह मटमैली और शांत रहती हैं। मेरी उम्र जब केवल ढाई साल की थी, उस समय का मुझे कोई चेहरा याद नहीं, कोई पूरी बात याद नहीं, बस एक भयानक, ठंडा सन्नाटा याद है। ऐसा सन्नाटा जो किसी मकान के ढह जाने के बाद हवा में तैरता रह जाता है।
गाँव के उस कच्चे मकान की लाल मिट्टी वाली दीवारें थीं। चौखट पर हर साल दिवाली में गेरू और चूने से अल्पना बनाई जाती थी, लेकिन उस दिन चौखट के पास सिर्फ धूल बिखरी थी। घर के आँगन में चूल्हा ठंडा पड़ा था। सुबह की चाय की सौंधी खुशबू की जगह हवा में एक अजीब, दमघोंटू गंध थी।
माँ ज़मीन पर बेसुध पड़ी थी। उनके सिर के पास बिखरे हुए रूखे बाल थे और माथे पर वह सिंदूर, जो उस दिन के बाद फिर कभी उस चौखट ने नहीं देखा। गाँव के लोग कहते हैं कि वह घरेलू कलह थी। कुछ का कहना था कि बात बस इतनी थी कि दाल में नमक कम था या खेत से लौटे पिता का क्रोध सातवें आसमान पर था। पर ढाई साल के उस अबोध बालक के लिए ये सामाजिक दलीलें बेमानी थीं। मैंने बस इतना देखा था कि जिस आँचल को मुट्ठी में भींचकर मैं लड़खड़ाते कदमों से चलना सीख रहा था, वह आँचल अब बिल्कुल निष्प्राण था। मैंने माँ की ठंडी पड़ चुकी कलाई की चूड़ियों को हिलाया था, यह सोचकर कि वह करवट बदलेंगी और मुझे अपनी छाती से लगा लेंगी। पर वह देह पत्थर हो चुकी थी।
गाँव के लोग जमा होने लगे थे। मर्दाने दालान में पंचायत जैसी कानाफूसियाँ हो रही थीं। कोई कह रहा था कि बात थाने तक नहीं जानी चाहिए, खानदान की पगड़ी उछल जाएगी। कोई कह रहा था कि औरत की किस्मत में जो लिखा हो, वही होता है। उस पूरी भीड़ में किसी की आँख उस कोने में बैठे उस ढाई साल के अनाथ पर नहीं टिकी थी, जिसकी समूची कायनात एक झटके में उजड़ चुकी थी।
तभी आँगन की लकड़ी की सांकल जोर से खटखटाई और मेरे मामा भीतर दाखिल हुए।
मामा की आँखों में आँसू नहीं, एक दहकता हुआ शोला था। उन्होंने आँगन में पड़े अपनी बहन के निष्प्राण शरीर को देखा, उस टूटी हुई खाट को देखा, और फिर उनकी नज़र मुझ पर पड़ी। वे एक पल के लिए भी नहीं ठिठके। न उन्होंने उस कायर भीड़ से कोई उलझन मोल ली, न किसी के सामने गिड़गिड़ाए। वे सीधे मेरी तरफ बढ़े, बिना एक शब्द कहे मुझे ज़मीन से उठाया और अपने सीने से पूरी ताकत से भींच लिया। उनकी छाती की धड़कन इतनी तेज़ और भारी थी कि मुझे लगा जैसे कोई दरिया उनके भीतर खौल रहा हो।
"यह बच्चा अब इस मनहूस चौखट पर एक पल भी नहीं रहेगा," मामा की आवाज़ में ऐसा वज्रपात था कि आँगन की कानाफूसी एक पल में सन्न रह गई।
तभी दालान के कोने से किसी ने बुदबुदाते हुए टोकना चाहा, "पर यह तो इस घर का वारिस है, कुल का चिराग है... ऐसे कैसे ले जाओगे?"
मामा मुड़े। उनकी आँखों का जो विकराल रूप था, उसने बोलने वाले के हलक में ही शब्द सुखा दिए। उन्होंने दाँत भींचते हुए कहा, "जिस घर के मर्दों के हाथ अपनी ही चौखट की लक्ष्मी का गला घोंटते हों, उस घर की दीवारों के साए में मैं अपनी बहन के इस फूल को सड़ने नहीं दूँगा। आज से यह सिर्फ मेरा बेटा है।"
मामा मुझे लेकर बाहर निकल आए। पीछे छूट गया वह घर, वह पिता जिसका चेहरा उस दिन के बाद मेरे ज़ेहन से हमेशा के लिए मिट गया।
ननिहाल का वह सफर बैलगाड़ी की धीमी चरमराहट के बीच कटा था। मामा ने रास्ते भर मुझे एक बार भी अपनी छाती से अलग नहीं किया। जब हम उनके गाँव पहुँचे, तो दरवाज़े पर मामी बदहवास खड़ी थीं। उनके हाथ में कोई थाली नहीं थी, आँखों से अनवरत बहते आँसू थे। जब मामा ने मुझे उनकी गोद में डाला, तो मामी ने मुझे ऐसे छाती से चिपटाया जैसे कोई बवंडर से बचाकर लाए गए परिंदे के बच्चे को सहेजता है।
मामा के घर में कोई रियासत नहीं थी। तीन बीघे पथरीली ज़मीन, दो बूढ़े बैल और फूस की टपकती छत वाला एक छोटा सा घर। पर उस घर में त्याग का ऐसा समंदर था, जिसकी थाह पाना किसी साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं। उन साढ़े बारह सालों में मामा ने जो किया, वह कोई फरिश्ता ही कर सकता था।
गाँव में जब सूखा पड़ा और दाने-दाने की किल्लत हुई, तो मामा और मामी ने अपने सगे बच्चों की थाली से भी पहले मेरी थाली में रोटी रखी। मामी सुबह-सुबह जब मक्के की रोटी बनातीं, तो चुपके से दूध की मलाई और गुड़ की डली मेरी कटोरी में डाल देती थीं। उनके अपने बच्चे कभी-कभी हसरत भरी नज़रों से देखते, तो मामी आँखों ही आँखों में उन्हें डाँट देतीं और बाद में अकेले में आँचल भिगोकर रोतीं।
"खा ले बबुआ, तेरी देह में जान रहेगी तो तेरी मरी हुई माँ की आत्मा को स्वर्ग में ठंडक मिलेगी," मामी हर निवाले के साथ मेरे सिर पर हाथ फेरतीं।
मामा ने अपनी कमर तोड़ ली ताकि मैं गाँव के मिडिल स्कूल में जा सकूँ। सर्दियों में उनके पैरों में टूटी हुई चप्पलें होती थीं, पर मेरे बस्ते में नई कॉपियाँ और हाथ में लकड़ी की नई तख्ती हमेशा मौजूद रहती। गाँव के लोग कभी-कभी ताना मारते, "दूसरों के खून को पालकर क्या पाओगे? कल को बड़ा होकर उड़ जाएगा।" तब मामा अपने तंबाकू की पुड़िया मसलते हुए धीमे से कहते, "यह दूसरे का खून नहीं, मेरी बहन के कलेजे का टुकड़ा है। जब तक मेरी साँस चलेगी, इसे किसी के आगे हाथ फैलाने नहीं दूँगा।"
वे साढ़े बारह बरस उस ममतामयी छाँव में ऐसे बीते जैसे किसी तपते रेगिस्तान में कोई घने बरगद के नीचे सो रहा हो। मैं पंद्रह वर्ष का हो चुका था। शरीर छरहरा था, चेहरे पर बचपन की मासूमियत के साथ एक आत्मविश्वासी चमक आने लगी थी। मुझे लगता था कि मेरी दुनिया बस यही है—मामा के खेत, मामी की रसोई और गाँव के स्कूल की वह टूटी मेज़।
पर नियति के खाते में कुछ और ही लिखा था।
फागुन की एक दोपहर, जब महुए के पेड़ से पीले फूल टप-टप गिर रहे थे, हमारे दलान पर एक अजनबी साया आकर रुका। खाकी पैंट, पैरों में पॉलिश किए हुए जूते, हाथ में एक पुराना चमड़े का बक्सा और चेहरे पर एक ऐसी झुर्रियों भरी उदासी जो किसी गहरे बोझ को ढोने से आती है।
वह मेरे चाचाजी थे।
पंद्रह सालों में उन्होंने कभी गाँव से ननिहाल की सुध नहीं ली थी। पर आज जब वे चौखट पर आकर खड़े हुए, तो उनके चेहरे पर कोई अकड़ या अहंकार नहीं था। वे चुपचाप चौखट के पास मिट्टी पर ही बैठ गए।
मामा जब खेत से लौटे और चाचा को देखा, तो उनके हाथ की खुरपी ज़मीन पर गिर पड़ी। मामा की त्योरियाँ चढ़ गईं, आँखें पुरानी आग से भर आईं। "तुम यहाँ किस मुँह से आए हो? क्या उस दिन की दरिंदगी अभी पूरी नहीं हुई थी जो अब इस चौखट तक चले आए?"
चाचाजी उठे नहीं। उन्होंने अपनी नज़रें ज़मीन में गड़ा रखी थीं। उनके होंठ कांप रहे थे। जब उन्होंने अपना सिर उठाया, तो उनकी आँखों में पश्चाताप का जो खौलता हुआ आँसू था, उसने मामा के कदमों को वहीं रोक दिया।
चाचाजी ने दोनों हाथ जोड़ लिए। उनकी आवाज़ भीतर से टूटी हुई और भारी थी।
"भाई साहब... मुझे गालियाँ दे लीजिए, चाहे तो जूते से मार लीजिए। हम उस पाप के भागीदार हैं जो उस दिन हमारे घर में हुआ। भैया के उस वहशीपन को हम रोक नहीं सके, यह अपराधबोध मुझे पिछले पंद्रह बरसों से तिल-तिल कर मार रहा है।"
चाचाजी का गला रुँध गया। उन्होंने अपनी छाती पर हाथ मारते हुए कहा, "भाभी की चीखें आज भी मुझे बंबई की चाल में सोने नहीं देतीं। जब भी आँख मूँदता हूँ, लगता है कि भाभी पूछ रही हैं कि मेरे ढाई साल के बच्चे का क्या कसूर था? मैं कायर था जो उस दिन कुछ न कर सका। पर अब मैं उस पाप की आग में जलते-जलते थक चुका हूँ।"
मामा स्तब्ध खड़े थे। चाचाजी घुटनों के बल मामा के सामने बैठ गए।
"मैं बंबई में पोर्ट ट्रस्ट में एक छोटी नौकरी करता हूँ," चाचाजी ने अपनी जेब से रुमाल निकालकर अपनी आँखें पोंछते हुए कहा। "मेरा अपना कोई नहीं है। मैं इस बच्चे का हक छीनने नहीं आया हूँ। मैं तो अपने माथे पर लगा वह कलंक धोना चाहता हूँ। मैं इसे शहर ले जाना चाहता हूँ, इसे पढ़ाऊँगा, अपनी आँखों के सामने बिठाकर सरकारी नौकरी की तैयारी करवाऊँगा। अगर मैं इसे अपने पैरों पर खड़ा न कर सका, तो मरने के बाद भाभी को क्या मुँह दिखाऊँगा?"
उस दिन ननिहाल के आँगन में दो पुरुषों का दर्द आमने-सामने था। एक तरफ मामा का वह निस्वार्थ त्याग था जिसने पंद्रह साल अपना खून जलाकर मुझे पाला था, और दूसरी तरफ चाचा का वह भयानक अपराधबोध और प्रायश्चित, जो अपनी मृत भाभी के कर्ज को उतारने के लिए तड़प रहा था।
मामा ने चाचा की ओर देखा और फिर मेरी ओर। मामा समझ गए थे कि गाँव की इस बंजर ज़मीन पर मैं ज़िन्दगी भर सिर्फ एक खेतिहर मज़दूर बनकर रह जाऊँगा। चाचा का बंबई ले जाना भले ही विछोह का दर्द दे रहा था, पर मेरे भविष्य के लिए वही एक मात्र खुला आसमान था।
मामा ने आगे बढ़कर चाचा के कंधे पर हाथ रखा और उन्हें उठाया। मामा की आवाज़ में एक अजीब-सा ठहराव आ गया था।
"अगर यह तुम्हारा प्रायश्चित है, तो याद रखना... अगर इस बच्चे की आँख में एक भी आँसू तुम्हारी वजह से आया, तो मेरी बहन की रूह तुम्हें कभी माफ नहीं करेगी।"
उस रात ननिहाल के चूल्हे में आग नहीं सुलगी। मामी एक कोने में बैठकर अपनी साड़ी के पल्लू से मुँह ढँककर सिसकती रहीं। उन्होंने चुपचाप मेरे दो पुराने कुर्ते, एक धोती और कपड़े की एक पोटली में थोड़े से भुने हुए चने और सत्तू बाँध दिए।
भोर की पहली किरण जब फूटी, तो स्टेशन जाने का वक्त हो गया। मैंने मामा के पैर छुए। मामा ने मुझे उठाया, देर तक अपनी छाती से चिपकाए रखा। उनकी दाढ़ी के खुरदुरे बाल मेरे गालों पर चुभ रहे थे और उनके आँसू मेरे कंधे को भिगो रहे थे।
"जा बबुआ," मामा ने रुँधे गले से कहा, "चाचा का मान रखना। उनकी आत्मा पर जो बोझ है, उसे अपनी कामयाबी से हल्का करना। और कभी अपनी इस मिट्टी को मत भूलना।"
चाचाजी ने मेरा हाथ पकड़ा। उनके हाथ की पकड़ बहुत सख्त थी, मानो डर रहे हों कि कहीं यह बच्चा उनकी उँगलियों से छूट न जाए और उनका प्रायश्चित अधूरा न रह जाए।
मैंने मुड़कर अंतिम बार देखा। मामी दरवाज़े की ओट में खड़ी पत्थर की मूरत बन चुकी थीं। मामा धूप में अकेले खड़े थे, अपनी सूखी, खुरदरी हथेलियों से अपना चेहरा ढँके हुए। ननिहाल की वह ममतामयी छाँव हमेशा के लिए पीछे छूट रही थी, और सामने चाचा के पश्चाताप की वह कठोर उँगली थी, जो मुझे बंबई के उस अनजान, बेरहम समंदर की ओर खींचकर ले जा रही थी।

अध्याय २: मायानगरी की तपिश, रेलवे की मुहर और बनारस की राह

रेलगाड़ी की छुक-छुक आवाज़ के साथ जब गाँव की सीमाएँ पीछे छूटती जा रही थीं, तो खिड़की से बाहर देखते हुए मुझे लग रहा था जैसे मेरा बचपन भी उन टेलीग्राफ के खंभों की तरह तेज़ी से पीछे भाग रहा है। डिब्बे में कोयले का धुआँ भर रहा था, लोगों की धक्का-मुक्की थी, पर मेरे बगल में बैठे चाचाजी का हाथ पूरे सफर में मेरे कंधे से हटा नहीं। उनका हाथ किसी प्यार भरे स्पर्श जैसा कोमल नहीं था; उसमें एक अजीब-सी बेचैनी, एक डरावनी सतर्कता थी—जैसे किसी ने कोई अनमोल अमानत पकड़ी हो और उसे खोने के डर से अपनी मुट्ठी इतनी कस ली हो कि खुद उसकी उँगलियाँ दुखने लगें।
चाचा पूरे रास्ते कम बोले। बीच-बीच में उन्होंने मुझे अपनी जेब से निकाल-निकाल कर कभी पूरी-आलू खिलाया, तो कभी कुल्हड़ की चाय पिलाई। जब भी मैं चाय का कुल्हड़ थामता, चाचा मेरी आँखों में देखते। उस नज़र में मुझे हर बार एक सवाल तैरता दिखता—क्या तू मुझे पहचानता है? क्या तू मुझे उस दिन के गुनाह का हिस्सेदार मानता है? मैं अपनी नज़रें फेर लेता। पंद्रह साल की उम्र में मैं अपराध और पश्चाताप की परिभाषा तो नहीं समझता था, पर यह ज़रूर भाँप गया था कि इस इंसान का सिर किसी अदृश्य भारी पत्थर के नीचे दबा हुआ है।
दूसरे दिन सुबह गाड़ी जब बंबई के वीटी स्टेशन (विक्टोरिया टर्मिनस) पर रुकी, तो मुझे लगा जैसे मैं किसी दूसरी ही दुनिया में आ गिरा हूँ।
आसमान छूती गोथिक शैली की विशाल पत्थरों वाली इमारतें, भाप और सीटी छोड़ते भारी-भरकम रेलवे इंजन, माथे पर लाल पोटलियाँ लादे दौड़ते कुली, और हज़ारों-लाखों लोगों का एक बेतहाशा, अंधी रफ़्तार से बहता हुआ रेला। गाँव में जहाँ दो मील दूर से भी कोई आवाज़ देता था तो नाम पहचान लिया जाता था, यहाँ बगल से गुज़रने वाला इंसान भी ऐसे देखता था मानो आप कोई बेजान पत्थर हों। चाचा ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा और भीड़ को चीरते हुए प्लेटफॉर्म से बाहर ले आए।
सड़क पर दौड़ती काली-पीली टैक्सियाँ, डबल डेकर लाल बसें और हवा में फैली नम समुद्री हवा व सड़ी हुई मछलियों की मिली-जुली गंध ने मेरा दम घोंट दिया। वह सपनों का शहर नहीं था, मेरे लिए वह एक विशाल, दानवाकार भट्टी थी, जो इंसानों को कच्चा चबाकर उनसे उनका पसीना और रूह निचोड़ लेती थी।
चाचा मुझे परेल की एक रेलवे चाल में ले गए।
वह एक लंबी, बदबूदार और घुप्प अंधेरी सीढ़ी वाली तीन मंज़िला इमारत थी। एक ही छत के नीचे दर्जनों कमरे थे और बीच में एक संकरा सा गलियारा, जहाँ हर वक्त गीले कपड़े लटके रहते थे। चाचा की खोली—दस बाई बारह का एक कमरा थी। कोने में एक पीतल का नल, जिसके नीचे आधी कटी हुई बाल्टी रखी थी; एक तरफ मिट्टी के तेल वाला स्टोव; और दीवार पर टंगे कुछ खूँटियों पर चाचा की दो खाकी पैंटें और सफेद कमीज़ें। कमरे में एक अकेली खिड़की थी, पर उसे खोलने पर भी सामने वाली चाल की मैली, सीलन भरी दीवार के अलावा कुछ नज़र नहीं आता था।
उस कमरे में दाखिल होते ही चाचा ने दरवाज़ा भीतर से बंद कर दिया। उन्होंने अपनी जेब से रूमाल निकाला, अपना पसीना पोंछा, और दीवार पर टंगे एक छोटे से शीशे के पास जाकर खड़े हो गए। फिर वे मुड़े और अपनी खुरदरी आवाज़ में बोले:
"यह गाँव नहीं है बबुआ। यहाँ धूप और छाँव का खेल नहीं चलता। यहाँ सुबह सूरज निकलने से पहले पानी की लाइन में लगना पड़ता है और रात को भूखे पेट भी अगली सुबह की चिंता करनी पड़ती है।"
उन्होंने कमरे के एक कोने में रखी लकड़ी की छोटी मेज़ और एक बेंत की कुर्सी की तरफ इशारा किया। "यह कोना आज से तुम्हारा है। गाँव में मामा ने तुम्हें ममता दी, कलेजे से लगाकर रखा, वह उनका बड़प्पन था। पर अब मेरी बारी है। मैं तुम्हें छाँव नहीं दूँगा। छाँव में रहने वाले पौधे धूप सहते ही मुरझा जाते हैं। मैं तुम्हें ऐसा पत्थर बनाऊँगा कि दुनिया की कोई चोट तुम्हें तोड़ न सके।"
उस दिन के बाद से मेरी ज़िंदगी का जो चक्र शुरू हुआ, उसने मुझे पंद्रह वर्ष की उम्र में ही साठ वर्ष की गंभीरता दे दी।
चाचा का अनुशासन सैन्य छावनी से भी बदतर था। सुबह ठीक चार बजे जब चाल की बत्ती भी पूरी तरह नहीं जलती थी, चाचा मुझे आवाज़ देकर उठा देते। मुझे नल पर जाकर मुँह-हाथ धोना होता, और चार बजकर बीस मिनट पर मेज़ पर बैठना होता था। मेज़ पर एक पीली रोशनी वाला मद्धम लैंप जलता रहता था।
चाचा कहीं से रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षाओं के पुराने हल-प्रश्नपत्र, गणित, सामान्य ज्ञान, और अंग्रेज़ी की मुड़ी-तुड़ी किताबें जुटा लाए थे। वे खुद बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे, पर रेलवे के दफ्तरों में क्लर्कों की ज़रूरत और परीक्षा के मिज़ाज को भली-भाँति समझते थे।
"लिखो!" चाचा की आवाज़ कमरे में गूँजती।
वे स्टोव पर काली चाय खौलाते रहते और बीच-बीच में आकर मेरी कॉपियों पर नज़र डालते। ज़रा सी भी लिखावट में लापरवाही होती या हिसाब में कोई चूक होती, तो उनकी मोटी, सख्त उँगली मेरी मेज़ पर इतनी ज़ोर से बजती कि मैं कांप उठता।
"अगर तुम्हारी कलम में धार नहीं होगी, तो दुनिया तुम्हें काट कर फेंक देगी," वे घूरती हुई आँखों से कहते।
लेकिन उस सख्ती के भीतर का पश्चाताप मुझे तब दिखता, जब रात के बारह-एक बजे मेरी आँखें पढ़ते-पढ़ते मेज़ पर ही झुक जातीं। कभी नींद के झोंके में जब मेरा सिर किताबों पर लुढ़क जाता, तो मुझे किसी आहट का अहसास होता। मैं अधखुली आँखों से देखता कि वही कठोर चाचा, जो दिन में मुझे डाँटते थे, बहुत हौले से मेरी पीठ पर एक पुराना ऊनी कम्बल ओढ़ा रहे होते थे। वे पंखे की धीमी हवा में मेरे माथे पर हाथ फेरते, और उनकी भारी साँसें एक अजीब दर्द से कांप रही होती थीं।
एक रात मैंने देखा, चाचा उस मद्धम लैंप की रोशनी में बैठकर कोने में रखे अपने छोटे से ट्रंक से एक पुराना, पीला पड़ चुका कागज़ निकाल कर देख रहे थे। वह कागज़ मेरी माँ की मृत्यु के समय का मृत्यु-प्रमाणपत्र या कोई पुलिस की रसीद थी। चाचा उसे देखते और उनकी बूढ़ी आँखों से आँसू टपक कर उनकी हथेली पर गिरते। वे बुदबुदा रहे थे, "भाभी... मैं इसे मरने नहीं दूँगा। मैं इसे उस नर्क से बहुत दूर ले जाऊँगा... आप मुझे माफ कर देना।"
उस रात मेरी रीढ़ में एक अजीब-सी सिहरन दौड़ गई। मुझे समझ आ गया कि चाचा की यह डाँट, यह क्रूर अनुशासन कोई ज़ुल्म नहीं था; यह उस अपराधबोध की आग थी, जिसमें वे खुद को और मुझे दोनों को तपाकर कुंदन बनाना चाहते थे ताकि उस पुराने पाप का दाग किसी तरह धुल सके।
उस दिन के बाद मैंने अपनी थकान, अपनी नींद और अपने सारे दर्द को उस लैंप की पीली रोशनी में जला दिया।
दोपहर को जब चाचा काम पर चले जाते, मैं उस बंद कमरे में अकेला होता। बाहर चाल में बच्चों के खेलने का शोर आता, पड़ोस की औरतों के झगड़े सुनाई देते, पर मेरी उँगलियाँ केवल पन्नों पर पेन घिसती रहतीं। मैंने उस पंद्रह साल की उम्र में अपने हाथों में छाले पड़ते देखे। कई बार दोपहर की उमस में प्यास से हलक सूख जाता, पर मैं खुद को सज़ा देता कि जब तक यह अध्याय समाप्त नहीं होगा, मैं पानी का एक घूँट भी नहीं लूँगा।
और फिर, करीब डेढ़ साल की उस तपस्या के बाद, भारतीय रेल में लिपिक संवर्ग की खुली भर्ती निकली। न्यूनतम आयु और विशेष नियमों के तहत चाचा ने न जाने किन-किन बाबुओं के पैर छूकर, कौन-कौन से दफ्तरों के चक्कर काटकर मेरा फॉर्म भरवाया था।
परीक्षा का केंद्र एक विशाल स्कूल की इमारत में था। जब मैं वहाँ पहुँचा, तो मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ रहे थे। मेरे आसपास कोट-पैंट पहने, अंग्रेज़ी में धाराप्रवाह बातें करते हुए शहर के लड़के खड़े थे। उनके चेहरों पर आत्मविश्वास था, उनके पास महँगे पेन थे। और एक मैं था—खादी का घिसा हुआ पाजामा, ढीला कुर्ता और पैरों में चाचा के दिए हुए एक नंबर बड़े बाटा के काले जूते, जो चलते वक्त आगे से मुड़ जाते थे।
चाचा स्कूल के फाटक तक मेरे साथ आए थे। उन्होंने फाटक के बाहर मेरा हाथ पकड़ा। उस दिन पहली बार चाचा के चेहरे की सख्ती पूरी तरह गायब थी। उनकी आँखों में वही अनाथ बच्चा था जिसे वे ननिहाल से खींच लाए थे।
उन्होंने अपनी जेब से एक सिक्का निकाला और मेरे हाथ में रख दिया।
"बबुआ... आज तेरी परीक्षा नहीं है। आज उस दिन की परीक्षा है जिस दिन तेरी माँ मरी थी। आज मेरे पश्चाताप की परीक्षा है। तू अंदर जाएगा, तो यह मत सोचना कि तू अकेला है। तेरी कलम के पीछे तेरी उस मरी हुई माँ का आशीर्वाद है, और मामा का वह खून-पसीना है जो उन्होंने तुझे बड़ा करने में बहाया है। किसी से डरना मत। जा!"
मैंने चाचा के पाँव छुए। उनकी धोती की किनारी पर सिर रखकर जब मैं उठा, तो मेरे भीतर का वह डरा हुआ, अनाथ बालक कहीं विलीन हो चुका था।
परीक्षा हॉल की उस बड़ी सी बेंच पर जब प्रश्न-पत्र मेरे सामने आया, तो एक पल के लिए कमरे की सारी आवाज़ें बंद हो गईं। मुझे न घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी, न परीक्षकों के जूतों की आवाज़। मुझे सिर्फ मामा की वह आवाज़ सुनाई दे रही थी—"मेहनत से जी मत चुराना," और चाचा का वह कांपता हुआ चेहरा दिख रहा था।
मैंने कलम उठाई। अगले तीन घंटे तक वह कलम रुकी नहीं। गणित के सवाल, रेलवे के नियम, भाषा की समझ—जो कुछ भी मैंने उस दस-बाई-बारह की दमघोंटू खोली में उस मद्धम लैंप के नीचे बैठकर अपने मस्तिष्क की नसों में उतारा था, वह सब स्याही बनकर कागज़ पर उतरता चला गया। जब घंटी बजी और परीक्षक ने मेरी उत्तर-पुस्तिका खींची, तो मेरी उँगलियों के पोर नीले पड़ चुके थे, पर मेरी छाती में एक गहरा संतोष था।
इम्तहान खत्म होने के बाद के महीने किसी सदियों की तरह बीते।
और फिर एक रोज़ भादों की मूसलाधार बारिश हो रही थी। बंबई की सड़कें पानी से भर चुकी थीं। चाल की छत से पानी टपक रहा था और मैं बाल्टी लगाकर पानी रोक रहा था।
तभी सीढ़ियों पर भारी कदमों की दौड़ सुनाई दी। कोई बेतहाशा हाँफता हुआ ऊपर आ रहा था।
दरवाज़ा धड़ाम से खुला। सामने चाचा खड़े थे। वे सिर से पाँव तक बारिश में भीगे हुए थे। उनकी खाकी पैंट कीचड़ से सनी थी, छाता कहीं रास्ते में छूट चुका था। पर उनके हाथ में रेलवे भर्ती बोर्ड का एक बड़ा, सरकारी लिफाफा था, जिस पर नीली स्याही से 'भारतीय रेल' की मुहर लगी हुई थी।
चाचा चौखट पर ही खड़े रह गए। वे हाँफ रहे थे। उनके होंठ हिले, पर कोई आवाज़ नहीं निकली।
मैं आगे बढ़ा, "चाचाजी... क्या हुआ?"
चाचा ने बिना कुछ कहे वह लिफाफा मेरी तरफ बढ़ा दिया। उनके हाथ इतनी बुरी तरह कांप रहे थे कि लिफाफे से टपकती बारिश की बूँदें मेरे पाँवों पर गिर पड़ीं।
मैंने लिफाफा खोला। अंदर नियुक्ति पत्र था।
"...सूचित किया जाता है कि आपका चयन भारतीय रेल में कनिष्ठ लिपिक के पद पर किया गया है..."
मेरी नज़रें उस कागज़ पर जम गईं। केवल साढ़े सोलह-सत्रह वर्ष की उम्र में, भारतीय रेल जैसी विशाल व्यवस्था ने मुझे एक 'पहचान' दे दी थी। अब मैं किसी की दया का मोहताज़ अनाथ नहीं था; मैं सरकार का एक मुलाज़िम था, जिसका अपना एक वजूद था, अपनी एक तनख्वाह थी।
मैंने जब सिर उठाया, तो देखा कि चाचा घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ चुके थे।
वह कठोर, पत्थर जैसा इंसान, जिसने महीनों में कभी मुस्कुरा कर बात नहीं की थी, आज दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपाकर बच्चों की तरह फफक-फफक कर रो रहा था। उनकी सिसकियों से उस छोटी सी खोली की दीवारें कांप रही थीं।
"भाभी...!" चाचा ने छत की तरफ दोनों हाथ उठाकर, भरे हुए गले से चीखते हुए कहा, "भाभी... आज मुझे माफ कर देना! आज तुम्हारा बेटा अपने पैरों पर खड़ा हो गया! आज मेरा पाप धुल गया भाभी... आज मैं तुम्हारे सामने सिर उठाकर मरने लायक हो गया!"
मैं दौड़कर चाचा के पास गया और ज़मीन पर बैठकर उन्हें थाम लिया। उस दिन पहली बार मैंने चाचा को गले लगाया था। चाचा ने मुझे अपनी छाती से ऐसे भींच लिया जैसे कोई डूबता हुआ इंसान किनारे को पकड़ता है। उस आलिंगन में न कोई डर था, न कोई दूरी; वहाँ सिर्फ एक पश्चाताप की पूर्णता थी और एक नए जीवन का उदय था।
शुरुआती कुछ महीने बंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस और यार्ड के बड़े दफ्तरों में कागज़ी फाइलों, मालगाड़ियों के बही-खातों और टिकटों के ऑडिट के बीच बीते। बंबई की तेज़ भागती ज़िंदगी में मैंने काम की हर बारीक कड़ी को सीखा। लेकिन चाचा की सेहत अब गिरती जा रही थी। सालों के अपराधबोध और बंबई की सीलन भरी चाल की दमघोंटू हवा ने उनके फेफड़ों को जकड़ लिया था।
वे अक्सर खाँसते हुए कहते, "बबुआ, यह शहर रोटी तो देता है, पर रूह सुखा देता है। तेरी जड़ें उत्तर भारत की मिट्टी में हैं। यह समंदर का खारा पानी तुझे रास नहीं आएगा।"
चाचा ने अपने संपर्कों और रेलवे यूनियनों की मदद से मेरे गृह-राज्य के नज़दीक तबादले के लिए अर्ज़ी डलवाई। और आखिरकार, करीब दो साल की सेवा के बाद, रेलवे बोर्ड का वह आदेश आ गया जिसने मेरी ज़िंदगी का रुख हमेशा के लिए बदल दिया: मुख्यालय से पूर्वोत्तर/उत्तर रेलवे के बनारस (वाराणसी) मंडल में स्थानांतरण।
जब तबादले का कागज़ हाथ में आया, तो चाचा की बूढ़ी आँखों में एक अलग ही चमक थी।
"काशी जा रहे हो बबुआ," चाचा ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा, "भोलेनाथ की नगरी है। वहाँ गंगा का किनारा है। वहाँ तुम्हारे जीवन की नई शुरुआत होगी। जो कलंक और दर्द हमारे पुराने घर की दीवारों में था, उसे गंगा की लहरों में विसर्जित कर देना।"
बंबई से बनारस की ट्रेन जब चली, तो मैं एक बार फिर खिड़की के पास था। पर इस बार मैं वह अनाथ, डरा हुआ बालक नहीं था जो पंद्रह साल की उम्र में मामा के आँचल से छूटकर आया था। इस बार मेरी जेब में रेलवे का पहचान पत्र था, हाथों में खुद के कमाए पैसों से खरीदे गए कपड़े थे, और दिल में गंगा की उस पावन नगरी में अपनी एक नई दुनिया, अपनी एक नई गृहस्थी बसाने का संकल्प था।
दूर क्षितिज पर बंबई की इमारतें ओझल हो रही थीं, और मेरी ट्रेन बनारस के घाटों, घंटियों और जीवन के उस नए पड़ाव की ओर दौड़ी चली जा रही थी जहाँ मेरे लिए रिश्ते और अपनी एक नई दुनिया इंतज़ार कर रही थी...

भाग २: गृहस्थी, त्याग और पारिवारिक तूफ़ान

अध्याय ३: सात फेरे, गंगा की छाँव और नई गृहस्थी का आरंभ

काशी की सुबह जब नींद खोलती है, तो सबसे पहले कानों में घंटों, शंखों और दूर दशाश्वमेध से आती हर-हर महादेव की गूँज सुनाई देती है। बंबई की उस अंधी आपाधापी, सीलन भरी चाल और सीमेंट की दमघोंटू कोठरियों से निकलकर जब मैं बनारस के रेलवे यार्ड और दफ्तरों में पहुँचा, तो पहली बार लगा कि साँस लेने के लिए सीने में पर्याप्त जगह है।
रेलवे कॉलोनी का वह छोटा सा क्वार्टर—लाल ईंटों की पुरानी दीवारें, ऊँची खपरैल की छत, आगे एक छोटा सा कच्चा आँगन जहाँ तुलसी का एक सूखा चबूतरा बना था, और सामने नीम का एक दरख्त। क्वार्टर भले ही साधारण और मामूली था, पर मेरे लिए वह किसी राजमहल से कम नहीं था। ढाई वर्ष की उम्र में अनाथ होने, ननिहाल के अभावों में पलने और फिर परेल की तंग खोली में चाचा के कड़े पहरे में रहने के बाद, यह मेरी ज़िंदगी की पहली छत थी जिस पर मेरे अपने नाम की लोहे की सरकारी तख्ती टंगी थी।
दिन रेलवे के रजिस्टरों, पार्सल की बिल्टियों, मालगाड़ियों के आवागमन और कोयले-पानी के हिसाब की प्रविष्टियों में बीत जाता था। दफ्तर में जब तक कलम चलती, मन उलझा रहता। लेकिन जब शाम ढलती और सायरन बजने के बाद मैं उस क्वार्टर में लौटता, तो उसका भयावह सन्नाटा हड्डियों तक को कंपा देता था।
कमरे में एक अकेला स्टोव था, एक पीतल की थाली, खूँटी पर टंगी रेलवे की खाकी वर्दी, और कोने में बिछी एक खुरदरी चटाई। रात को जब स्टोव पर दाल खौलती, तो उसकी भाप के साथ मन का अकेलापन भी दीवारों पर रिसता रहता था। बाहर नीम की पत्तियों से छनकर आती चाँदनी में मैं अक्सर अपनी हथेलियों को देखता और सोचता—क्या मेरा पूरा जीवन यूँ ही एक बंजारे की तरह, बिना किसी अपने के, सिर्फ फाइलों के पन्ने पलटते बीत जाएगा?
तभी बंबई से चाचाजी का एक लंबा पत्र आया। उनकी कांपती, पुरानी लिखावट में लिखा था:
"बबुआ, नौकरी पक्की हो गई, पाँव ज़मीन पर जम गए। अब अपने जीवन को एक दिशा दो। बिन घरनी घर भूत का डेरा होता है। जिस घर में चूल्हे के पास कोई स्त्री न हो, उस घर में बरकत कभी पाँव नहीं पसारती। हमने तुम्हारे लिए गंगा के उस पार एक सीधा-सादा परिवार देखा है। लड़की संस्कारी है, अभावों में पली है, तुम्हारे अकेलेपन को अपनी ममता से भर देगी। अब देर मत करो, गृहस्थी की नींव रखो।"
शादी की बात जब पक्की हुई, तो कोई बहुत बड़ा तामझाम नहीं था। मेरे पास न तो कोई पुरखों की विशाल ज़मींदारी थी, न ही कोई भरा-पूरा परिवार जो बारात की शोभा बनकर ढोल-ताशों के आगे चलता। मेरे पक्ष में केवल दो ही पूँजी थीं—एक तो मामा के दिए हुए निष्कलंक संस्कार और दूसरी भारतीय रेल की पक्की, पेंशनेबल नौकरी।
गंगा के उस पार के एक छोटे से गाँव से यह नाता जुड़ा था। कन्या पक्ष निहायत सीधा-सादा, मेहनतकश किसान परिवार था। जब फलदान के समय अगुआई हुई, तो लड़की के पिता ने अपनी पुरानी पगड़ी उतारकर मेरे घुटनों पर रख दी थी। उनकी आँखों में आँसू थे। उन्होंने हाथ जोड़कर बस इतना कहा था, "बाबूजी, हमारे पास आपको देने के लिए न सोना है, न चाँदी का थाल। हमारे पास बस एक गाय जैसी सीधी बिटिया है, जो हर हाल में आपका मान रखेगी और रूखी-सूखी खाकर भी आपकी चौखट की लाज निभाएगी।"
मैंने उस दिन नज़र उठाकर पहली बार अपनी होने वाली जीवन-संगिनी को देखा था। पीले सूती आँचल की घूँघट की ओट से केवल उसकी झुकी हुई पलकें और माथे पर कुमकुम की एक सादी बिंदी दिखी थी। उस शांत, सौम्य चेहरे में मुझे कोई बनावट नहीं, बल्कि एक ऐसा गहरा धीरज दिखा जो केवल गंगा की मिट्टी में रची-बसी स्त्रियों में ही पाया जाता है।
उसका नाम कुसुम था।
विवाह का दिन आया। ननिहाल से मामा और मामी आए थे। जब मामा ने मेरे सिर पर सेहरा बाँधा, तो उनकी खुरदरी, बूढ़ी हथेलियाँ बुरी तरह कांप रही थीं। उन्होंने मेरे माथे को चूमा और उनका गला भर आया। वे रुँधे स्वर में बोले, "बबुआ, आज अगर तेरी अभागी माँ जीवित होती, तो आँगन में उसके पाँव न टिकते। पर तू मन छोटा मत करना, गंगा मैया की सौगंध, स्वर्ग के झरोखे से आज वह सिर्फ अपने लाल को ही निहार रही होगी।"
मामी ने अपनी पुरानी काठ की संदूक से निकालकर लाल कपड़े में लिपटी एक चाँदी की भारी पाज़ेब कुसुम के पैरों के लिए दी। वह पाज़ेब कोई मामूली गहना नहीं थी, वह मामा-मामी के उस निस्वार्थ प्रेम और पसीने की अंतिम पूँजी थी, जिसे उन्होंने जाने कितने सावन अपना पेट काटकर केवल इस दिन के लिए सहेज कर रखा था।
वैदिक मंत्रोच्चार और अग्नि की लपटों के बीच जब मैंने सात फेरे लिए, तो मेरे दाहिने हाथ में कुसुम की मेहंदी रची, शीतल हथेली थी। उस स्पर्श में एक विचित्र-सा भरोसा था। जब मैंने चुटकी में सिंदूर भरकर उसकी माँग में डाला, तो मैंने मन ही मन गंगा मैया को साक्षी मानकर एक मौन प्रतिज्ञा ली थी—जिस घरेलू हिंसा, कलह और क्रूरता ने मेरे ढाई साल के अबोध बचपन से मेरी माँ को छीन लिया था, उस ज़हर की एक बूँद भी मैं इस स्त्री के जीवन में कभी नहीं घुलने दूँगा। मैं भले ही खुद आधा पेट सो जाऊँ, पर अपनी इस चौखट पर कुसुम को वह मान-सम्मान और सुरक्षा दूँगा, जो मेरी माँ को इस समाज ने कभी नहीं दी।
गृहप्रवेश के दिन जब कुसुम ने अपने आलता लगे पाँवों से रेलवे क्वार्टर की चौखट के भीतर पहला कदम रखा, तो वह नीरस, ठंडा सरकारी मकान अचानक एक जीवित 'घर' में बदल गया।
कुसुम सचमुच नाम की ही नहीं, स्वभाव से भी एक कोमल, महकते हुए फूल जैसी थी; पर जब परिवार की ढाल बनने की बात आती, तो वह किसी फौलाद से कम साबित नहीं होती थी।
शुरुआती साल बेहद तंगहाली और कड़े अनुशासन के थे। रेलवे क्लर्क का वेतन बँधा हुआ और सीमित था। महीने की पहली तारीख को जो लिफाफा मिलता, उसमें से एक निश्चित हिस्सा मनीऑर्डर के ज़रिए ननिहाल में मामा की खेती और दवाइयों के लिए जाता था, और दूसरा हिस्सा बंबई में चाचाजी के पास उनके बुढ़ापे के सहारे के लिए भेजना मेरा पहला फर्ज़ था। हमारे अपने हाथ में जो बचता, वह बहुत थोड़ा होता था।
लेकिन कुसुम ने उन तंग दिनों में भी कभी अपनी भौंहों पर शिकन नहीं आने दी। उसने कभी किसी नई साड़ी या गहने की माँग नहीं की। उसने टूटी हुई बाँस की चारपाई पर अपनी पुरानी साड़ियों की गूदड़ियाँ सिलकर ऐसा मुलायम बिछौना तैयार किया कि दफ्तर से लौटकर उस पर लेटते ही मेरी दिन भर की थकान कपूर की तरह उड़ जाती थी। उसने आँगन के उस वीरान चबूतरे की मिट्टी को अपने हाथों से लीप-पोतकर तुलसी का नया पौधा रोपा। रोज़ भोर में जब वह पीतल की बाल्टी से तुलसी को जल देती और उसकी गीली लटों से पानी की बूँदें आँगन की मिट्टी पर टपकतीं, तो मुझे लगता था कि साक्षात अन्नपूर्णा मेरे घर में वास कर रही है।
शाम को जब मैं मालगाड़ियों के यार्ड से कोयले की कालिख और धूल में सना हुआ थका-मांदा लौटता, तो दरवाज़े पर कुसुम मिट्टी के दीये की मद्धम रोशनी के साथ खड़ी मिलती। एक लोटा ठंडा पानी, हाथ में पंखा, और चेहरे पर वह निश्चल, मीठी मुस्कान—वह मुस्कान मेरे दिन भर के हर अपमान, हर थकान और हर बोझ को एक पल में धो देती थी।
और फिर, उस शांत आँगन में ईश्वरीय अनुग्रह की पहली बूँद बरसी।
जब हमारे पहले बेटे का जन्म हुआ, तो मुझे लगा जैसे मेरी बंद किस्मत का जंग लगा ताला किसी ने हमेशा के लिए तोड़ दिया हो। रेलवे अस्पताल के उस साधारण से वार्ड में जब दाई ने उस नन्हे से लाल मांस के लोथड़े को मेरी कांपती हथेलियों पर रखा, तो मेरे पाँव थरथरा गए थे। उसकी छोटी-छोटी मुट्ठियाँ, गुलाबी कोमल गाल और उसके बदन से आती ताजे दूध जैसी खुशबू...
मैंने जीवन में पहली बार किसी ऐसे जीव को छुआ था जो पूरी तरह मेरा 'सगा' था, मेरा अपना खून था। अब तक मैं केवल किसी का भानजा था, किसी का अनाथ भतीजा था, किसी का दामाद था; पर उस दिन पहली बार इस धरती पर किसी ने मुझे 'पिता' की उपाधि दी थी।
मेरी आँखों से खुशी के खौलते आँसू टपक कर उस नवजात के माथे पर गिरे। मैंने उसके नन्हे से कान के पास झुककर बहुत आहिस्ता से कहा था, "बेटा, तेरे इस अभागे बाप ने अपने जीवन में माँ-बाप का लाड़-प्यार कभी नहीं देखा, पर मैं ईश्वर की सौगंध खाकर कहता हूँ कि तेरे पाँवों में कभी काँटा भी चुभने नहीं दूँगा।"
समय का पहिया गंगा की धारा की तरह अपनी गति से बहता रहा। दो साल बाद हमारे दूसरे बेटे ने उस आँगन में कदम रखा, और फिर तीन साल के अंतराल पर ईश्वर ने हमारी गोद में साक्षात लक्ष्मी स्वरूप एक नन्हीं, सुंदर बेटी डाल दी।
बेटी के जन्म पर पड़ोस की कुछ संकीर्ण और दकियानूसी औरतों ने ताना मारते हुए कहा, "अरे कुसुम, दो-दो बेटों के बाद लड़की जन दी! अब इसके ब्याह और दहेज के लिए ज़िंदगी भर पाई-पाई जोड़कर छाती जलानी पड़ेगी।"
पर उस दिन मैंने किसी की परवाह नहीं की। मैंने पूरे रेलवे यार्ड और कॉलोनी के हर घर में बनारस के प्रसिद्ध लाल पेड़े बँटवाए थे। जब मैंने उस नन्हीं गुड़िया को अपनी छाती से लगाया, तो मेरी आँखें भर आईं। मुझे लगा जैसे मेरी वही अभागी माँ, जिसे ढाई साल की उम्र में मुझसे छीन लिया गया था, अपने सारे दुख भूलकर एक नन्हीं सी परी के रूप में मेरे ही आँगन में दोबारा लौट आई हो। मैंने बड़े लाड़ से उसका नाम रखा—'मुन्नी'।
अब हमारे उस छोटे से क्वार्टर की हर सुबह बच्चों की मीठी किलकारियों, आँगन में दौड़ते नन्हे कदमों की थाप और कुसुम की प्यार भरी डाँट से महकने लगी थी।
दफ्तर से लौटते वक्त मेरी जेब में कभी दो आने की संतरे वाली गोलियाँ होतीं, तो कभी मुन्नी की दो चोटियों के लिए लाल-पीले चमकीले रिबन। महीने के अंत में जब पैसे खत्म हो जाते, तो मैं चाय की कैंटीन में जाना छोड़ देता, पैदल ही दफ्तर चला जाता, ताकि बच्चों के लिए कॉपी, स्लेट और पेंसिल के पैसों में कभी कोई कमी न आए। बड़े बेटे को अपने कंधे पर बिठाकर जब मैं शाम को रेलवे लाइन के किनारे टहलाने ले जाता, और वह दूर से आती मालगाड़ी के लाल-हरे डिब्बे गिनते हुए ताली बजाकर खिलखिलाता, तो मुझे लगता था कि दुनिया का सबसे बड़ा धनवान और सुखी इंसान मैं ही हूँ।
रात को जब बच्चे सो जाते और घर में एक मीठा सन्नाटा पसर जाता, तो कुसुम हाथ का पंखा झलते हुए मेरे पास बैठती। हम दोनों लालटेन की धीमी, पीली रोशनी में घंटों बैठकर बच्चों के सुनहरे भविष्य के ताने-बाने बुनते।
"सुनिए जी," कुसुम धीरे से मेरा हाथ थामकर कहती, "बड़ा बेटा पढ़ने में बहुत तेज़ है। उसे हम खूब पढ़ाएँगे, बड़ा रेलवे अफसर बनाएँगे। छोटे को भी अच्छी तालीम दिलाएँगे। और बिटिया मुन्नी को तो इतना काबिल बनाएँगे कि वह किसी के आगे कभी बेबस न हो।"
"हाँ कुसुम," मैं उसकी थकी हुई पर सपनों से भरी आँखों में देखकर कहता, "तुम देखना, मैं दिन-रात एक कर दूँगा। बारह-बारह घंटे की डबल ड्यूटी करूँगा, खुद फटे कुर्ते और घिसे हुए जूते पहन लूँगा, पर अपने बच्चों की आँखों में कभी वो लाचारी और अभाव नहीं आने दूँगा, जो मैंने अपने ननिहाल की उस धूल भरी पगडंडी पर झेला है।"
हम दोनों अपने इस छोटे से संसार में पूरी तरह मग्न थे, भविष्य के रंगीन महल सजा रहे थे।
पर हमें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि जिस पैतृक गाँव, जिस खूनी ज़मीन और जिन रिश्तों को मैं पीछे छोड़ आया था, वहाँ ईर्ष्या और स्वार्थ की आग अभी पूरी तरह बुझी नहीं थी। वह बँटवारे, कलह और धोखे का एक ऐसा खूनी चक्रव्यूह बनकर हमारी चौखट पर दस्तक देने वाली थी, जो हमारी इस बसी-बसाई गृहस्थी की रीढ़ को झकझोर कर रख देने वाला था...

अध्याय ४: बँटवारे का खंजर, माँ की सूनी देहरी और रीढ़ पर आई ज़िम्मेदारी

मनुष्य जब अपनी छोटी-सी दुनिया में तिनका-तिनका जोड़कर घोंसला बनाने लगता है, तब उसे एक भोला-सा भ्रम हो जाता है कि आंधियों का दौर अब बीत चुका है। मैं भी इसी मुगालते में जी रहा था। बनारस के रेलवे क्वार्टर में जब शाम ढलती, बच्चों की किलकारियाँ गूँजतीं और रसोई से कुसुम की चूड़ियों की खनक के साथ रोटियों की सौंधी महक उठती, तो मुझे लगता था कि मेरे हिस्से का अंधकार अब गंगा की लहरों में बहकर कहीं दूर चला गया है।
लेकिन अतीत कभी मरता नहीं; वह राख के नीचे दबे उस अंगारे की तरह होता है जो ज़रा-सी हवा का झोंका मिलते ही फिर से दहक उठता है और रूह तक को झुलसा देता है।
एक दिन फागुन की दोपहर में डाकिया साइकिल की घंटी बजाता हुआ आया। उसने जो खाकी लिफाफा मेरे हाथ में थमाया, उस पर पैतृक गाँव का पता लिखा था। उस लिखावट को देखते ही मेरी छाती के भीतर एक पुरानी, ठंडी सिहरन दौड़ गई। वह चौखट, जिसने ढाई बरस की अबोध उम्र में मुझे अनाथ बनाकर दर-बदर कर दिया था, आज वर्षों बाद फिर अपनी मनहूस आवाज़ लेकर मेरी देहरी तक आ पहुँची थी।
कागज़ पर स्याही नहीं, जैसे बरसों का जमा हुआ ज़हर उड़ेला गया था। गाँव में पिता की ढलती उम्र, खानदान के बाकी लोगों की आपसी रंजिशें और पुरखों की ज़मीन-जायदाद के बँटवारे का फरमान। पत्र का अंतिम वाक्य सीधे सीने पर खंजर की तरह लगा: "यदि अपने हिस्से की मिट्टी बचानी हो, तो तुरंत गाँव पहुँचो। यदि नहीं आए, तो पंचायत जो तय करेगी, उसके बाद तुम्हारा इस चौखट और ज़मीन पर रोने का भी अधिकार नहीं रहेगा।"
कुसुम ने जब चाय का गिलास मेज़ पर रखा, तो उसने मेरी कांपती उँगलियों और चेहरे के उड़ते रंग को एक नज़र में भाँप लिया। उसने आँचल का कोना भींचते हुए दबी आवाज़ में पूछा, "गाँव से है न?"
मैंने भारी मन से केवल सिर हिला दिया। "हाँ कुसुम, बँटवारा हो रहा है।"
कुसुम की आँखें छलछला आईं। वह मेरा हाथ थामकर बैठ गई। "सुनिए, उस घर ने आपका बचपन छीना है, आपकी माँ को छीना है। आप वहाँ मत जाइए। हमें किसी की ज़मीन का एक ढेला भी नहीं चाहिए। ईश्वर ने हमें यहाँ अपनी मेहनत की दो रोटियाँ दी हैं, हम उसी में संतुष्ट हैं।"
"जाना होगा कुसुम," मैंने खिड़की के बाहर शून्य में ताकते हुए कहा। "ज़मीन की हवस में नहीं जा रहा हूँ। मैं बस यह देखने जा रहा हूँ कि जिस चौखट ने मेरी माँ की बलि ले ली, वहाँ आज भी इंसान बसते हैं या केवल भेड़ियों का झुंड रह गया है।"
मैंने रेलवे से तीन दिन की आकस्मिक छुट्टी ली और पैसेंजर ट्रेन के जनरल डिब्बे के एक कोने में बैठ गया। पहियों की खड़खड़ाहट के साथ-साथ मेरे सीने में पुरानी यादों का बवंडर उठ रहा था।
जब मैं गाँव की सीमा पर उतरा, तो धूप तीखी हो चुकी थी। उस धूल भरी पगडंडी पर चलते हुए मेरे पाँव भारी हो रहे थे। पंद्रह-सोलह बरसों बाद मेरे कदम उसी रास्ते पर थे, जहाँ से मामा मुझे अपनी छाती से चिपकाकर, रोते हुए ले गए थे।
गाँव के कच्चे रास्तों से गुज़रते हुए मुझे हर पेड़, हर मोड़ पर अपनी अभागी माँ की तलाश थी। मन भीतर ही भीतर एक बच्चे की तरह रो रहा था—काश! आज मेरी माँ ज़िंदा होती। काश, उस दिन उस चूल्हे के पास वह मरी न पड़ी होती। अगर आज मेरी माँ होती, तो इस गाँव की सीमा पर कोई मेरे स्वागत में खड़ा होता। वह दौड़कर आती, मुझे अपने आँचल में छिपा लेती, मेरे सिर पर हाथ फेरती और कहती—'आ गया मेरा बबुआ!' वह गाँव वालों से लड़ जाती, किसी को अपने अनाथ बेटे पर उँगली तक नहीं उठाने देती। पर आज... आज इस भरी दुनिया में मेरा कोई नहीं था। मैं उसी मिट्टी पर एक अजनबी की तरह चल रहा था, जहाँ मेरी नाल गड़ी थी।
जब मैं पैतृक घर के दरवाज़े पर पहुँचा, तो मेरी नज़र सबसे पहले उस देहरी पर पड़ी। बरसों बीत गए थे, मिट्टी का लेप कई बार बदला जा चुका था, लेकिन मेरी आँखों को उस देहरी पर आज भी मेरी माँ का सूखा हुआ खून और उसकी टूटी हुई चूड़ियों के टुकड़े साफ़ नज़र आ रहे थे। मेरी आँखों से दो बूँद खौलते आँसू टपक कर उस चौखट की धूल में समा गए।
घर के बड़े दालान में कोई स्वागत नहीं था, वहाँ सिर्फ एक हिंसक तल्खी थी। गाँव के पंच हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। रिश्तेदार आमने-सामने ऐसे तने बैठे थे मानो एक-दूसरे का गला घोंट देंगे। पिता एक कोने में चारपाई पर लेटे थे। आँखों में मोतियाबिंद का जाला था, खाँसी से सीना घड़घड़ा रहा था, पर उन बुझती आँखों में भी अपने किए का कोई पश्चाताप नहीं था; वहाँ केवल ज़मीन और रुपयों की एक अंधी छटपटाहट थी।
मेरे कदम दालान में पड़ते ही हुक्के की गुड़गुड़ाहट थम गई।
"आ गया बनारस का बाबू!" एक चचेरे भाई ने ज़हरीली मुस्कान के साथ ताना कसा, "रेलवे की पक्की नौकरी की मलाई खा रहे हो, अब पुरखों की मिट्टी में भी हिस्सा बंटाने आ गए? जब तक गाँव में हल चलाना था, तब तो ननिहाल की छाँव में मलाई मार रहे थे!"
मेरा खून खौल उठा, पर मामा की वह सीख मेरे कानों में गूँज गई—बबुआ, कभी अपना मान मत गिराना। मैंने अपने होंठ भींच लिए, हाथ बाँधे चुपचाप एक खंभे के सहारे खड़ा रहा।
पंचायत शुरू हुई, और इंसान के भीतर छिपे गिद्धों का नंगा नाच सामने आने लगा।
जो ज़मीन उपजाऊ थी, जो कुएं के मीठे पानी के पास थी, और जो पक्की सड़क से लगती थी, उस पर खानदान के उन लठैतों ने अपना खूँटा गाड़ दिया जो गाँव में रहकर दबंगई करते थे। जब मेरे हिस्से की बारी आई, तो पंचों ने मिलकर गाँव के सबसे पिछले छोर पर स्थित वह बंजर, पथरीला और ऊबड़-खाबड़ टुकड़ा मेरे नाम लिख दिया, जहाँ बबूल के काँटों के सिवा कभी घास की एक पत्ती तक नहीं उगी थी।
पर असली खंजर तो अभी चलना बाकी था।
गाँव के पुराने महाजन को दालान में बुलाया गया। उसने अपने बस्ते से लाल कपड़े में बँधे, पीले पड़ चुके पुराने बही-खाते निकाले और पंचों की मेज़ पर पटक दिए।
"यह देखिए पंचों," महाजन ने अपनी पतली मूँछों पर ताव देते हुए कहा, "इनके पिता ने पिछले बीस सालों में जो कर्ज़ लिया है—तीज-त्योहार का, मुकदमों का, ब्याज़ का—वह सब जोड़कर आज हज़ारों में पहुँच चुका है। अब बँटवारा हो रहा है, तो मेरा पैसा कौन देगा?"
पंचायत के मुखिया ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा। उसने सीधे मेरी तरफ उँगली उठाई और वह फैसला सुनाया जिसने मेरे पैरों तले से ज़मीन खींच ली।
"चूँकि तुम सरकारी नौकर हो, हर महीने की पहली तारीख को सरकार तुम्हारे हाथ में रोकड़ा रखती है," मुखिया ने बेरहमी से कहा, "इसलिए पुरखों के सिर चढ़ा यह पूरा कर्ज़ तुम्हारे हिस्से जाएगा। अगर उस बंजर ज़मीन पर भी अपना नाम चाहते हो, तो महाजन की पूरी पाई-पाई तुम्हें चुकानी होगी। और हाँ, इस बूढ़े पिता की दवा-दारू, तीमारदारी और इस पुराने खंडहर की मरम्मत का खर्च भी तुम्हारी ही तनख्वाह से निकलेगा। बाकी भाई गाँव में रहकर खेती देखेंगे।"
वह बँटवारा नहीं था; वह एक बेसहारा, अनाथ बेटे की खुली डकैती थी।
मलाईदार ज़मीन, अन्न से भरे कोठार और घर के पक्के कमरे उन लोगों ने आपस में बाँट लिए जिन्होंने मेरे बचपन में कभी मुझे एक बासी रोटी का टुकड़ा तक नहीं पूछा था। और मेरे हिस्से क्या आया? पिता का सदियों पुराना कर्ज़, बंजर ज़मीन और ज़िम्मेदारियों का ऐसा विशालकाय पहाड़, जो किसी भी सीधे इंसान की रीढ़ की हड्डी को हमेशा के लिए तोड़कर रख दे।
उस पल मेरे भीतर एक भयानक चीख उठी। मेरा मन हुआ कि उस भरी पंचायत में अपना आपा खो दूँ। मैं चीखकर उस बूढ़े पिता से पूछूँ—किस हक से तुम मुझे यह कर्ज़ सौंप रहे हो? क्या दिया तुमने मुझे? ढाई साल की उम्र में मेरी ममतामयी माँ की जान ले ली! मुझे भूख से तड़पने के लिए अनाथों की तरह ननिहाल की दहलीज पर फेंक दिया! न कभी एक नई कमीज़ दी, न कभी एक पैसे की दवा दी। आज जब मैं अपनी हड्डियों का पानी बनाकर अपने पैरों पर खड़ा हुआ हूँ, तो तुम अपने गुनाहों और कर्ज़ों की यह ज़हरीली गठरी मेरे सिर पर बाँध रहे हो?
मेरी आँखें भर आईं। मैंने दालान की उस मिट्टी को देखा और मन ही मन अपनी मृत माँ से बात की—माँ, तू कहाँ है? देख आज तेरे लाल के साथ क्या हो रहा है। अगर तू होती, तो क्या ये भेड़िए मुझे इस तरह नोच पाते? तू अपनी छाती आगे कर देती ना माँ?
पर उस सन्नाटे से कोई आवाज़ नहीं आई। आई तो सिर्फ एक अंतरात्मा की पुकार।
मुझे समझ आ गया कि अगर आज मैं भी इनकी तरह गाली-गलौज, मुकदमेबाज़ी और कलह के उसी कीचड़ में उतर गया, तो मैं भी इसी नर्क का हिस्सा बन जाऊँगा। जिस हिंसा ने मेरी माँ की बलि ली थी, अगर आज मैं भी उसी रास्ते पर चला, तो मेरी माँ की आत्मा को कभी शांति नहीं मिलेगी। मुझे इस खूनी और स्वार्थी चक्रव्यूह को हर हाल में तोड़ना था। अपने बच्चों को इस नर्क की परछाईं से भी दूर रखना था।
मैंने कांपते हाथों से कलम उठाई और उस अन्यायपूर्ण पंचनामे पर अपने दस्तखत कर दिए।
फिर मैंने सिर उठाया। मेरी आँखों में आँसू सूख चुके थे, उनकी जगह स्वाभिमान की एक दहकती हुई आग थी। मैंने उन सभी पंचों और रिश्तेदारों की आँखों में आँखें डालकर कहा:
"मुझे आपकी उपजाऊ ज़मीन का एक ढेला भी नहीं चाहिए। मुझे यह बंजर टुकड़ा मंज़ूर है। और यह कर्ज़... यह कर्ज़ भी मैं चुकाऊँगा। मेरे पिता ने मुझे भले ही प्यार न दिया हो, पर मुझे अपनी माँ की कोख का मान रखना है। मैं यह सारा कर्ज़ अपनी मेहनत के पसीने से पाई-पाई करके चुकाऊँगा ताकि कल को कोई मेरे मासूम बच्चों को यह ताना न मार सके कि उनका बाप किसी बकाएदार और बेईमान का बेटा था। आज के बाद इस चौखट से मेरा हर नाता समाप्त होता है।"
उस शाम जब मैं स्टेशन लौट रहा था, तो मेरे पैरों में चप्पलें घिस चुकी थीं, जेब खाली थी, और कंधों पर उस ज़माने के हिसाब से एक असहनीय कर्ज़ का बोझ था। पर मेरे भीतर एक अजीब-सा फौलादी संकल्प जन्म ले चुका था।
आधी रात को जब मैं बनारस के क्वार्टर पहुँचा, तो कुसुम जाग रही थी। लालटेन की धीमी रोशनी में जब मैंने उसे सब कुछ सच-सच बताया, तो मुझे लगा कि वह रो पड़ेगी, अपनी किस्मत को कोसेगी।
पर कुसुम ने जो किया, उसने मेरी रूह को झकझोर दिया।
वह बिना कुछ बोले उठी। उसने कमरे के कोने में रखी लोहे की पुरानी पेटी खोली। उसने अपनी शादी की वही एकमात्र चाँदी की भारी पाज़ेब निकाली जो विदाई के समय मामी ने अपनी गरीबी की थाती से दी थी, और अपने कान के सोने के छोटे झाले उतारे। उसने वह सब लाकर मेरी कांपती हथेली पर रख दिया।
"कुसुम... यह क्या कर रही हो?" मेरी आँखों से आँसू छलक कर उन गहनों पर गिर पड़े। "यह तो तुम्हारी अंतिम पूँजी है। एक पति होकर मैं तुम्हारी देह के गहने छीन लूँ?"
कुसुम ने मेरी दोनों हथेलियों को अपनी आँखों से लगा लिया। उसकी पलकें भीगी हुई थीं, पर आवाज़ में एक चट्टान जैसा धीरज था।
"यह गहने नहीं हैं, यह मेरे सुहाग की पगड़ी हैं," कुसुम ने रुँधे गले से कहा। "उस गाँव के पत्थरों ने समझा होगा कि वे आपको अकेले पाकर तोड़ देंगे। पर वे नहीं जानते कि आपकी माँ भले ही स्वर्ग में हों, पर उनका आशीर्वाद और इस दासी का समर्पण आपके साथ है। हम दोनों मिलकर यह पहाड़ खोदेंगे। आप चिंता मत करिए; हम दिन में एक वक्त नमक-रोटी खा लेंगे, पर आपके माथे पर किसी साहूकार की नज़र का मैल नहीं लगने देंगे। आपकी रीढ़ झुकेगी नहीं, यह मेरी सौगंध है।"
उस रात के बाद मेरी ज़िंदगी एक जीवित अग्निपरीक्षा बन गई।
मैंने रेलवे में वह काम करने शुरू किए जिन्हें दूसरे कर्मचारी हाथ लगाने से भी डरते थे। मैंने लगातार बारह-बारह, चौदह-चौदह घंटे की डबल ड्यूटियाँ और नाइट शिफ्ट चुनीं।
सर्दियों की उन भयानक रातों में, जब बनारस का कोहरा इतना घना होता था कि पटरियों पर खड़ी बोगियाँ भी काली परछाइयों जैसी दिखती थीं और कड़ाके की ठंड हड्डियों में सुई की तरह चुभती थी, मैं हाथ में लाल-हरी लालटेन लेकर घंटों यार्ड में गश्त करता था। मालगाड़ियों के भारी लोहे के डिब्बों को जोड़ते वक्त कई बार उँगलियाँ बोगियों के बीच दबकर नीली पड़ जाती थीं। गर्म चाय के अभाव में हलक सूखता था, आँखों में रतजगे के मारे अंगारे दहकते थे।
महीने की पहली तारीख को तनख्वाह मिलते ही, बच्चों के दूध और राशन के पैसे काटकर, सबसे पहले महाजन की किश्त का मनीऑर्डर कटता था और गाँव में पिता की दवाइयों के पैसे भेजे जाते थे।
मैंने लगातार सात वर्षों तक अपने शरीर पर एक नया कपड़ा नहीं डाला। खाकी पैंट घिस-घिस कर इतनी पतली हो चुकी थी कि जाँघों के पास से धागे दिखने लगते थे, तो कुसुम रात को दीये की रोशनी में उस पर रफू करती थी। मेरे बाटा के काले जूते नीचे से पूरी तरह फट चुके थे; पटरियों की गिट्टियाँ सीधे तलवों में चुभती थीं, तो मैं जूतों के भीतर गत्ते और पुराने अखबार की तह लगाकर दफ्तर जाता था।
दफ्तर के बाबू मेरा उपहास उड़ाते थे, "अरे बाबूजी, इतना पैसा बचाकर क्या ज़मीन खरीदोगे? कफ़न में जेब नहीं होती।" वे नहीं जानते थे कि मैं कोई दौलत नहीं जोड़ रहा था, बल्कि अपनी मृत माँ की इज़्ज़त और अपने स्वाभिमान को उस पैतृक कर्ज़ के दलदल से बाहर खींचने के लिए अपनी हड्डियों का चूरा बेच रहा था।
घर में कई बार ऐसी नौबत आई जब महीने के आखिरी पाँच दिनों में केवल माँड़-भात बनता था। कुसुम बच्चों को पहले खिला देती, और खुद पानी पीकर सो जाती थी। जब मैं पूछता, तो मुस्कुराकर कह देती, "आज मेरा एकादशी का व्रत है।" पर मैं जानता था कि वह व्रत ईश्वर के लिए नहीं, मेरे स्वाभिमान की रक्षा के लिए था।
और अंततः, सात लंबे, तपस्वी और कष्टप्रद वर्षों के बाद वह सुबह आई, जब गाँव के उस महाजन की अंतिम रसीद मेरे हाथ में आई। उस पर लाल स्याही से लिखा था—'समस्त कर्ज़ चुकता, खाता बेबाक।'
उस कागज़ को हाथ में लेकर मैं सीधे बनारस के दशाश्वमेध घाट की ओर भागा।
गंगा की सीढ़ियों पर बैठकर मैं उस दोपहर फूट-फूट कर रोया। चालीस साल का एक प्रौढ़ पुरुष, बच्चों का बाप, घाट के पत्थरों पर अपना माथा टेककर किसी अबोध बालक की तरह हिचकियाँ ले-लेकर रो रहा था।
"माँ...!" मैंने गंगा की बहती लहरों की तरफ दोनों हाथ जोड़कर, रुँधे गले से पुकारा, "माँ, आज देख! तेरे उस अनाथ बेटे ने तेरे हत्यारों का सारा कर्ज़ उतार दिया! आज मैंने तेरे दूध की लाज रख ली माँ! आज तेरे बेटे की रीढ़ टूटी नहीं... आज मैं तेरे सामने सिर उठाकर खड़ा हो गया माँ!"
उस दिन गंगा की ठंडी बूँदें जब मेरे चेहरे पर पड़ीं, तो मुझे लगा जैसे मेरी माँ ने ही स्वर्ग से झुककर अपने आंचल से मेरे आँसू पोंछ दिए हों। मैंने अपने पुरखों के सारे पाप, उनका ज़हर और अपने हिस्से का सारा अपमान बिना किसी से एक पैसा माँगे, केवल अपने खून-पसीने से धो डाला था।
उस रात जब मैं घर लौटा और आँगन में अपने मासूम बच्चों को सुकून से सोते देखा, तो मुझे अपनी छाती फौलाद जैसी मज़बूत महसूस हुई। उस बँटवारे के खंजर ने मेरे जिस्म को लहूलुहान ज़रूर किया था, पर उसने मेरी आत्मा को अमर कर दिया था। अब मैं अपनी संतानों के लिए किसी भी तूफ़ान के आगे एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ा होने को तैयार था।

अध्याय ५: अपनी ज़रूरतों की आहुति और संतानों के पंख

कर्ज़ का वह काला नाग जब मेरी छाती से उतरा, तो मुझे लगा कि अब गंगा किनारे बैठकर मद्धम हवा में साँस लेने का थोड़ा अवकाश मिलेगा। पर एक पिता का जीवन उस कुम्हार की तरह होता है, जो आंधी-तूफान की परवाह किए बिना अपनी गीली मिट्टी के बर्तनों को धूप और भट्ठी की लपटों में पकाता रहता है ताकि वे दुनिया की निर्दयी ठोकरों से चटकने न पाएँ। मेरे लिए वे बर्तन मेरी तीन संतानें थीं—बड़ा बेटा आनंद, छोटा बेटा विजय, और मेरी सूनी आँखों की शीतल पुतली, नन्हीं मुन्नी।
गाँव के बँटवारे और महाजन के तगादों ने मेरी देह का कतरा-कतरा निचोड़ लिया था, पर उन झंझावातों ने मेरे भीतर एक ज़िद पत्थर की लकीर की तरह खींच दी थी—जो अंधकार, जो भूख, जो लाचारी और जो बेबसी मैंने अपने अनाथ बचपन में ननिहाल की पगडंडियों पर झेली थी, और जिस घुटती हुई सिसकी के बीच मेरी अभागी माँ ने दम तोड़ा था, उसकी ज़रा-सी परछाईं भी मैं अपने बच्चों के भविष्य पर नहीं पड़ने दूँगा।
बनारस के रेलवे क्वार्टर का वह आँगन अब केवल एक छत नहीं था, वह एक जीवित यज्ञशाला बन चुका था, जहाँ हर दिन मेरी और कुसुम की इच्छाओं की समिधा जलती थी।
जैसे-जैसे बच्चे बड़े हो रहे थे, उनकी ज़रूरतें भी आकाश की तरह फैल रही थीं। आनंद की आँखों में किताबों के बड़े-बड़े सवाल तैरते थे, वह रातों को टेबल लैंप जलाकर गणित के कठिन सूत्रों में खोया रहता। विजय का मिज़ाज थोड़ा चंचल ज़रूर था, पर कल-पुर्जों और मशीनों को खोलकर जोड़ देने में उसकी उँगलियों में गज़ब का हुनर था। और मुन्नी... मुन्नी तो उस घर की धड़कन और प्राणवायु थी। जब शाम को रेलवे यार्ड में बारह घंटे की दोहरी ड्यूटी करके मेरे पाँवों की नसें फूल जाती थीं और तलवों में जलन होती थी, तब मुन्नी का स्कूल से लौटकर बस्ता फेंकना और दौड़कर मेरे गले से लिपट जाना—"बाबूजी! आज मास्टर साहब ने मेरी लिखावट की पूरे दर्जे में पीठ थपथपाई!"—वह एक पल मेरे चौबीस घंटे के दर्द को कर्पूर की तरह उड़ा ले जाता था।
लेकिन अच्छी और मुकम्मल शिक्षा का अर्थ था—हर दिन, हर महीने बहता हुआ एक अंतहीन खर्च।
उस ज़माने में रेलवे के एक कनिष्ठ लिपिक के सीमित वेतन में से सरकारी स्कूल की फीस, गणित और विज्ञान की महंगी प्राइवेट ट्यूशनें, जिल्द बँधी भारी किताबें, ड्राइंग शीट और परीक्षा फॉर्मों की फीस जुटाना कोई आसान काम नहीं था। महीने की दस तारीख आते-आते चमड़े का वह पुराना बटुआ इतना हल्का हो जाता था कि उसमें केवल टिकट और सिक्के ही खड़कते थे।
दफ्तर की कैंटीन में दोपहर को जब समोसों की खुशबू और मलाईदार चाय की चुस्कियाँ गूँजती थीं, तो साथी बाबू अक्सर पुकारते, "अरे बाबूजी! कलम छोड़िए, आइए दो घूँट मारिए। सब पैसा घर में ही गाड़ेंगे क्या?"
मैं अपनी पतलून की जेब में हाथ डालता, जहाँ सिर्फ एक खोटा सिक्का और लोहे की चाबी होती थी। मैं अपनी झेंप मिटाने के लिए चेहरे पर एक फीकी मुस्कान सजाकर झूठ बोल देता, "आप लोग लीजिए, आज सवेरे से पेट में कुछ भारीपन है, डॉक्टर ने सादे पानी की सलाह दी है।" फिर मैं दफ्तर के बाहर लगे ठंडे पानी के नल पर जाता, दोनों हाथों की अंजलि बनाकर दो-तीन घूँट पानी हलक के नीचे उतार लेता। वह सादा पानी मुझे दुनिया के किसी भी पकवान से अधिक मीठा लगता था, क्योंकि मैं जानता था कि वहाँ बचाए गए चार आने शाम को मुन्नी के लिए रेखागणित की परकार (कंपास बॉक्स) या आनंद के लिए सामान्य ज्ञान की नई पत्रिका बनकर घर पहुँचेंगे।
कुसुम ने तो जैसे अपने स्त्रीत्व की सारी अभिलाषाओं का विसर्जन ही कर दिया था।
उसके बक्से में मुश्किल से तीन या चार सूती साड़ियाँ बची थीं। एक लाल छींट वाली साड़ी थी, जो धुलते-धुलते इतनी महीन हो चुकी थी कि ज़रा-सा खिंचने पर धागे अलग होने लगते थे। वह उसी साड़ी को आँगन की तार पर सुखाती और सूखते ही सहेज कर फिर लपेट लेती। पड़ोस के रेलवे क्वार्टरों में जब किसी की बारात आती, कोई मुंडन होता या छठ का महापर्व आता, तो महिलाएँ चटक बनारसी और ज़रीदार साड़ियों में सजकर निकलती थीं। मैं जब खिड़की की ओट से कुसुम को उन औरतों को चुपचाप निहारते देखता, तो मेरी छाती पर जैसे कोई भारी सिल रख दी जाती थी।
एक बार जब रेलवे से मुझे वार्षिक बोनस का कुछ अतिरिक्त लिफाफा मिला, तो मैंने शाम को आकर दृढ़ता से कहा, "कुसुम, आज कोई बहाना नहीं चलेगा। चलो गोदौलिया बाज़ार, आज तुम्हारे लिए एक अच्छी बनारसी ज़रीदार साड़ी लाऊँगा। आखिर तुम भी किसी घर की बहू हो।"
कुसुम ने मेरी तरफ देखा। उसकी थकी हुई, धँसी आँखों में पानी की एक पतली लकीर उतर आई। उसने हौले से मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उसकी हथेलियाँ घर का काम करते-करते खुरदरी हो चुकी थीं।
"मेरी देह पर रेशम लिपट भी गया, तो क्या बदल जाएगा जी?" उसने अत्यंत धीमे, पर मर्मभेदी स्वर में कहा। "आनंद को अगले हफ्ते इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की कोचिंग में दाखिला लेना है। वहाँ एकमुश्त पंद्रह सौ रुपये की मांग है। अगर मैंने वह साड़ी पहन भी ली, और मेरे बेटे की राह में पैसों की तंगी का पत्थर आ गया, तो वह ज़री मेरी चमड़ी को ताउम्र जलाएगी। आप यह पैसा सीधे उस कोचिंग के दफ्तर में जमा कर आइए। मेरी साड़ी अभी दो बरस और हँसकर कटेगी।"
उस रात मैं देर तक छत की कड़ियों को घूरता रहा। सोचता रहा कि ईश्वर ने इस स्त्री की मिट्टी किस धातु से बनाई है, जो अपनी हर साँस, अपनी हर चाहत को अपनी संतानों के कदमों में बिछाकर भी मुस्कुराती रहती है।
मैंने भी अपनी कमर को और कस लिया। रेलवे के माल-गोदाम और यार्ड में जब अतिरिक्त नाइट शिफ्ट की बात आती, तो नौजवान कर्मचारी बहाने बनाकर खिसक लेते, पर मैं सुपरवाइज़र की टेबल पर सबसे पहले अपनी अर्ज़ी रखता। जेठ की तपती दोपहर हो या सावन-भादों की वह चिपचिपी, उमस भरी रात—जब पंखा भी बदन पर गर्म थपेड़े मारता था—मैं सीमेंट और खाद के भारी बोरों की लदान सूचियाँ लेकर वैगनों के बीच घूमता रहता था। पसीने से बनियान पीठ पर चिपक जाती, आँखों में रतजगे के मारे कंकड़ियाँ चुभने जैसा दर्द होता, पर उस धुंधलके में मुझे सिर्फ एक ही सपना दिखाई देता था—मेरे बच्चे समाज की उस कतार में खड़े न हों जहाँ उनका बाप खड़ा था। वे सिर उठाकर जिएँ।
और ईश्वर गवाह है, हमारी इस कठोर, मौन तपस्या की एक भी बूँद व्यर्थ नहीं गई।
आनंद ने प्रवेश परीक्षा में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त किया और उसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिल गया। जिस दिन उसका चयन पत्र आया, उस दिन मैं रेलवे स्टेशन के आउटर सिग्नल के पास अकेला खड़ा होकर आंसुओं से भीगता रहा। मुझे लगा, पटरियों पर बहने वाले मेरे पसीने को भगवान ने गंगाजल मानकर स्वीकार कर लिया। छोटा बेटा विजय भी पीछे नहीं रहा; उसने अपनी मेहनत से तकनीकी डिप्लोमा पूरा किया और एक प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान में जूनियर इंजीनियर के पद पर चयनित हो गया। कुछ ही वर्षों में आनंद को भी एक बड़े औद्योगिक उपक्रम में राजपत्रित अधिकारी स्तर की नौकरी मिल गई।
वह दिन मेरे जीवन का स्वर्णिम दिन था जब आनंद अपनी पहली तनख्वाह लेकर घर लौटा था।
उसने चमचमाता हुआ लिफाफा सीधे मेरी हथेली पर रख दिया और झुककर मेरे घुटने छू लिए। मैंने उस लिफाफे को चूमा और अपनी कांपती आँखें उठाकर दीवार पर टंगी भगवान की तस्वीर और सामने खड़ी कुसुम को देखा। कुसुम के आँसू उसकी पुरानी साड़ी के पल्लू को भिगो रहे थे। वह बिना कुछ कहे कमरे के उस छोटे से मंदिर के आगे माथा टेककर साष्टांग गिर पड़ी। लगा कि जीवन के सारे अभाव, सारी रातें जो भूखे पेट कटी थीं, और पैरों के वे सारे छाले जो फटे जूतों से रिसते थे—उन सबका हिसाब चुकता हो गया।
अब सबसे पावन और सबसे भारी उत्तरदायित्व सामने था—मुन्नी का हाथ पीले करना।
मुन्नी मेरे लिए केवल पुत्री नहीं थी; वह मेरे उस वीरान, अनाथ जीवन में मेरी स्वर्गवासी माँ की सजीव प्रतिमूर्ति थी। उसने जब से होश सँभाला था, कभी किसी नए खिलौने के लिए मचलना नहीं सीखा था। जब उसके दोनों भाई नई किताबों के पन्ने पलटते, तो मुन्नी उनकी बची हुई पुरानी कॉपियों के खाली पन्नों को धागे से सिलकर अपनी डायरी बना लिया करती थी। उसने घर के अभावों को इतनी गरिमा से जिया था कि कभी किसी बात का मलाल उसके चेहरे पर नहीं दिखा।
जब मुन्नी के रिश्ते की बात चली, तो हमने एक सुशिक्षित, प्रतिष्ठित परिवार में उसका संबंध तय किया। लड़का सरकारी उच्च विद्यालय में प्रवक्ता था।
मोहल्ले और नाते-रिश्तेदारों के कुछ लोगों ने सलाह दी, "बाबूजी, लड़की की शादी है, अब ज्यादा दिखावे की क्या ज़रूरत है? सादे ढंग से निपटा दीजिए, आजकल कौन इतना भार उठाता है।"
पर उस दिन मेरे भीतर का अनाथ बालक नहीं, एक स्वाभिमानी पिता गरज उठा। मैंने अपने रेलवे प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी की संभावित अग्रिम राशि से एक बहुत बड़ा हिस्सा निकाल लिया। मैंने कुसुम से दो-टूक कहा था, "मुन्नी किसी की चौखट पर हाथ जोड़कर नहीं जाएगी। वह एक ऐसे पिता की बेटी बनकर जाएगी जिसने भले ही खुद रूखी रोटी खाई हो, पर अपनी बेटी के मान-सम्मान में कभी एक रत्ती की कमी नहीं आने दी।"
शादी की रात रेलवे का वह कम्युनिटी हॉल रोशनी से नहाया हुआ था।
शहनाई की तान पर जब मुन्नी लाल बनारसी लहंगे में, सखियों के बीच घूँघट गिराए मंडप की ओर बढ़ी, तो मेरा कलेजा फटने लगा। उसके हाथों में रची गाढ़ी मेहंदी की महक हवा में घुल रही थी। जब पुरोहित ने वैदिक मंत्रों के बीच उच्च स्वर में कहा, "कन्यादान का संकल्प लेने हेतु वर-वधू के पिता आगे आएँ..."—तो मेरे घुटने थरथरा रहे थे।
मैंने अपनी कांपती हथेलियों में मुन्नी के फूल जैसे कोमल हाथ को थामा। जब कुश और गंगाजल की पवित्र धारा हमारे जुड़े हुए हाथों पर से फिसलकर शालिग्राम शिला पर गिरी, तो उस जल में केवल तीर्थ का पानी नहीं था—उसमें मेरे पिछले पच्चीस बरसों का एक-एक कतरा पसीना, कुसुम के अनगिनत निर्जला उपवास और हमारी रीढ़ की गल चुकी हड्डियाँ घुली हुई थीं।
विदाई की वह घड़ी आई जब कहारों ने डोली उठाई। मुन्नी मेरी छाती से ऐसे लिपट गई जैसे कोई छोटा बच्चा किसी गहरे अंधेरे में अपनी माँ से चिपटता है। वह हिचकियों के बीच केवल इतना कह पा रही थी, "बाबूजी... मुझे अपना आँगन छोड़कर नहीं जाना... बाबूजी, मैं आपके बिना कैसे रहूँगी?"
मेरा वह फौलादी सीना, जिसने गाँव के बँटवारे के खंजर को बिना एक आह भरे सह लिया था, उस क्षण सैकड़ों टुकड़ों में बिखर गया। मैं किसी असहाय बालक की तरह फूट-फूट कर रो पड़ा।
मैंने कांपते हाथों से उसका सिर सहलाया और रुँधे गले से कहा, "जा मेरी बच्ची... अपने नए आँगन को अपनी ममता से महकाना। कभी किसी ज़्यादती के आगे अपना मस्तक मत झुकाना, क्योंकि तेरे इस बाप ने तुझे किसी की दया पर नहीं, अपने स्वाभिमान के लहू से सींचकर बड़ा किया है।"
मुन्नी की गाड़ी जब दूर सड़क के मोड़ पर ओझल हो गई, तो मुझे लगा जैसे मेरे रेलवे क्वार्टर की सारी रोशनी और प्राण ही उसके साथ चले गए हों। आँगन एक डरावने सन्नाटे से भर गया।
इसके कुछ समय बाद दोनों बेटों के विवाह का दायित्व भी हमने पूरी मर्यादा से निभाया। दोनों बहुएँ संभ्रांत और संस्कारी परिवारों से आईं। बहुओं के पहले कदम जब चौखट पर पड़े, तो कुसुम ने अपने कांपते हाथों से पूरी देहरी पर चावल के आटे से चौक पूरे। हमने दोनों समधियों के सामने हाथ जोड़कर साफ कह दिया था, "हमें एक पैसे का दहेज या दिखावा नहीं चाहिए। हमारे बेटे अपने पैरों पर खड़े हैं, ईश्वर ने हमें सब दिया है। बस हमारी चौखट पर आपकी बेटियों का मान बना रहे और परिवार में प्रेम की छाँव रहे।"
शादियों के बाद घर में कुछ समय तक रौनक का एक ऐसा वसंत आया जिसने पिछले सारे ज़ख्मों को ढक दिया।
घर में बहुओं के पाँवों की पायलें छनछनातीं, सुबह-शाम चाय के प्यालों पर चर्चाएँ होतीं, और आँगन एक बार फिर आबाद लगने लगा। कॉलोनी के लोग जब शाम को मिलते, तो मेरी मिसाल दिया करते थे—"बाबूजी का भाग्य देखिए! अनाथ होकर जीवन शुरू किया था, पर अपनी रीढ़ के दम पर दोनों बेटों को अफ़सर बनाया, बिटिया को राजा के घर ब्याहा, और आज पूरा परिवार एक वटवृक्ष की तरह लहलहा रहा है।"
शाम ढले जब मैं रेलवे कॉलोनी के उस पुराने नीम के पेड़ के नीचे बेंच पर बैठता, तो दूर ढलते सूरज की लालिमा को देखकर एक गहरी, संतोष भरी साँस लेता। मन ही मन गंगा मैया और काशी विश्वनाथ का आभार मानता कि एक टूटे हुए बीज से इतना हरा-भरा वृक्ष तैयार हो गया। मुझे पूरा विश्वास था कि अब जीवन की ढलान पर शांति, बेटों की छत्रछाया, बहुओं की ममता और नाती-पोतों की खिलखिलाहट ही मेरी संगिनी होगी।
पर हाय रे अभागा मनुष्य! वह यह कभी नहीं समझ पाता कि समय के गर्भ में कौन-सा नया तूफान पल रहा है।
मैं यह भूल गया था कि परिंदे जब तक घोंसले में होते हैं, तभी तक उन्हें अपने माता-पिता के परों की गर्माहट की दरकार होती है। जैसे ही उनके अपने डैने मज़बूत हो जाते हैं और वे खुले आकाश की ऊँचाइयाँ नापने लगते हैं, तो उसी घोंसले का तिनका-तिनका उन्हें भारी लगने लगता है। ज़मीन पर बैठा, अपनी सामर्थ्य गँवा चुका बूढ़ा बाप अब उनकी उड़ानों में एक पंख नहीं, बल्कि एक अनावश्यक 'भार' और 'अवरोध' बनने की दिशा में बढ़ रहा था।
उस भरे-पूरे, खिलखिलाते आँगन के कमरों में अब धीरे-धीरे फुसफुसाहटों, अलग चूल्हों की सुगबुगाहट और स्वार्थ का एक ऐसा ज़हरीला धुआँ उठने लगा था, जो बहुत जल्द मेरे स्वाभिमान पर सबसे बड़ा वार करने वाला था...

भाग ३: कृतघ्नता, ढलती उम्र और स्वाभिमान की जंग

अध्याय ६: 'आखिर तुमने मेरे लिए किया ही क्या?'

पेड़ जब फल देने लायक हो जाए, तो माली यह उम्मीद नहीं करता कि पेड़ झुककर उसके पाँव छुएगा; पर वह यह भी कभी नहीं सोचता कि जिस डाल को उसने अपनी रीढ़ झुकाकर धूप और पाले से बचाया था, वही डाल एक दिन उस पर सूखी टहनी बनकर गिर पड़ेगी।
हमारे उस रेलवे क्वार्टर की आबोहवा अब पहले जैसी नहीं रही थी। मुन्नी की ससुराल विदाई के बाद घर की चहारदीवारी के भीतर से जैसे कोई मर्मस्पर्शी संगीत अचानक गायब हो गया था। बहुओं के आगमन के शुरुआती कुछ महीने तो मान-मनुहार और नई दुल्हनों की संकोच भरी मुस्कानों में बीते, पर जैसे ही समय के पाँव आगे बढ़े, उस छोटे से सरकारी मकान के कमरों की दीवारें मानो एक-दूसरे की तरफ खिसकने लगीं।
अब घर में होने वाली बातें दालान के खुलेपन में नहीं होती थीं। शाम को जब दोनों बेटे दफ्तर से लौटते, तो पहले की तरह तुलसी के चबूतरे के पास बैठकर दिन भर का हाल नहीं पूछते। वे सीधे अपने-अपने कमरों में दाखिल होते, और किवाड़ हल्के से बंद कर लिए जाते। उन बंद किवाड़ों के पीछे से फुसफुसाहटों की ऐसी महीन आवाज़ें आतीं, जो कानों तक भले न पहुँचें, पर सीधे सीने में सुई की तरह चुभती थीं।
कुसुम अब भी भोर में चार बजे उठकर रसोई में चूल्हा सुलगाती थी। उसके घुटनों का दर्द अब इतना बढ़ चुका था कि वह ज़मीन पर बैठती, तो उठते वक्त उसकी आँखों में पानी भर आता था। पर उसने कभी किसी बहू को सुबह की चाय बनाने के लिए आवाज़ नहीं दी। वह चुपचाप पीतल की केतली में चाय खौलाती, दोनों बहुओं के कमरों के बाहर ट्रे सजाकर रख आती।
पर बदले में घर की हवा में एक अजीब-सी तल्खी घुलती जा रही थी।
छोटी बहू को लगता था कि बड़े भाई की तनख्वाह ज़्यादा है फिर भी घर के खर्च में उनका हिस्सा कम है। बड़ी बहू के मन में यह शिकायत पक रही थी कि ससुर ने अपनी पेंशन और जमा-पूँजी का बड़ा हिस्सा बिटिया मुन्नी की शादी में लुटा दिया, और उनके हिस्से सिर्फ रेलवे का यह पुराना, सीलन भरा क्वार्टर आया है जहाँ एक अदद नया फर्नीचर रखने की भी जगह नहीं है।
पैसों और हैसियत की यह तुलना धीरे-धीरे दोनों भाइयों के बीच एक चौड़ी खाई बनाती चली गई।
आनंद, जो कभी मेरी आवाज़ सुनते ही खड़ा हो जाता था, अब उसकी आँखों में एक अजीब-सी बेरुखी तैरने लगी थी। वह बात-बात पर झुँझलाने लगा था। विजय का मिज़ाज भी रूखा हो चुका था। डाइनिंग टेबल पर जब कभी नमक कम होता या सब्ज़ी में मिर्च ज़्यादा होती, तो बात केवल खाने तक सीमित नहीं रहती थी; वह बात सीधे परिवार के 'पिछड़ेपन' और 'पुराने ढर्रे' पर आ टिकती थी।
कुसुम ने कई बार बात को सँभालने की कोशिश की। वह बहुओं के तानों को हँसकर टाल देती। कभी कोई बहू कहती, "माँ जी, इस ज़माने में ऐसे पुराने बर्तनों में कौन खाना खाता है? हमारे मायके में तो कब के क्रॉकरी सेट आ गए,"—तो कुसुम सिर्फ इतना कहती, "बहू, यह तुम्हारे ससुर की पहली तनख्वाह के लोटे-थाली हैं, इनमें जो बरकत है, वह किसी नए काँच में कहाँ।" पर उसकी यह ममता उन पढ़ी-लिखी, आधुनिक बहुओं को केवल दकियानूसी अहसास कराती थी।
और फिर, आषाढ़ की एक उमस भरी रात वह भयानक बवंडर उठा, जिसने मेरे जीवन भर की तपस्या को एक ही फूँक में राख कर दिया।
बात बेहद मामूली थी। आनंद की पत्नी अपने मायके जाने के लिए एक नए एयर-कंडीशनर और बड़ी गाड़ी की मांग कर रही थी। आनंद का कहना था कि घर के साझा खर्चों और बाबूजी की कुछ पुरानी देनदारियों के चलते वह अभी इतना बड़ा कर्ज़ नहीं ले सकता।
रात के नौ बजे थे। हम सब भोजन की मेज़ पर बैठे थे। वातावरण में पहले से ही एक भारी तनाव तैर रहा था।
अचानक आनंद ने अपनी कटोरी ज़ोर से मेज़ पर पटकी। दाल छलक कर साफ मेज़पोश पर बिखर गई।
"यह क्या रोज़-रोज़ का तमाशा है!" आनंद चिल्लाया। उसका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था। "मेरी पूरी जवानी इस घर के सड़े हुए ढाँचे को ढोने में निकल जाएगी क्या? मेरे साथ के लड़के आज फ्लैट खरीद रहे हैं, गाड़ियों में घूम रहे हैं, और मैं यहाँ इस रेलवे की पुरानी खोली में अपने अरमानों का गला घोंट रहा हूँ!"
मैं अवाक रह गया। मैंने अपने कांपते हाथों को थाली के किनारे टिकाया और बहुत धीमे स्वर में कहा, "आनंद... बेटा, थोड़ा धीरज रखो। अभी तुम्हारी नौकरी को कुछ ही साल तो हुए हैं। हमने भी तो पूरा जीवन अभावों में..."
"बस कीजिए बाबूजी!"
आनंद की उस कड़क, ज़हरीली आवाज़ ने कमरे के पंखे की गड़गड़ाहट को भी दबा दिया। वह अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसकी आँखों में अपने ही पिता के लिए वह आदर नहीं, एक भयानक घृणा थी।
"अभावों की यह कहानी मुझे पिछले पच्चीस बरसों से मत सुनाइए!" आनंद ने अपनी उँगली सीधे मेरे चेहरे की तरफ तान दी। "आपने अभाव झेले, तो यह आपकी नाकामी थी! आपने पूरी ज़िंदगी रेलवे के उस घिसे-पिटे यार्ड में क्लर्क बनकर फाइलें पलटने के सिवा किया ही क्या? दुनिया के बाप अपने बेटों के लिए ज़मीनें छोड़ जाते हैं, शहर में बँगले खड़े कर देते हैं, व्यापार का साम्राज्य सौंपते हैं! आपने हमें क्या दिया? केवल यह सड़ा हुआ क्वार्टर और गाँव का वह बंजर खेत? आखिर आपने मेरे लिए किया ही क्या है?"
वह वाक्य—'आखिर तुमने मेरे लिए किया ही क्या है?'
वह शब्द नहीं था; वह कोई पिघला हुआ सीसा था जो सीधे मेरे दोनों कानों से होकर मेरी आत्मा में उतर गया। मुझे लगा जैसे मेरे फेफड़ों की सारी हवा अचानक बाहर खिंच गई हो। मेरी छाती के भीतर की नसें एक झटके में सूख गईं।
कमरे में सन्नाटा छा गया। विजय अपनी थाली में नज़रें गड़ाए बैठा रहा। उसने एक बार भी अपने बड़े भाई को नहीं टोका, न ही यह कहा कि 'भैया, बाबूजी से इस तरह मत बोलो।' उसका वह मौन आनंद के उस खंजर से भी अधिक तीखा था। बहुएँ अपने पल्लू को ठीक करते हुए चुपचाप खड़ी थीं, मानो इस अपमान का भरपूर आनंद ले रही हों।
कुसुम कांपती हुई उठी। उसकी आँखों से आँसू नहीं, जैसे लहू बह रहा था। वह थरथराते कदमों से आनंद के सामने जाकर खड़ी हो गई।
"आनंद...!" कुसुम की आवाज़ ऐसी निकली जैसे किसी का गला घोंटा जा रहा हो। "तू यह अपने पिता से कह रहा है? उस पिता से, जिसने सात साल तक अपनी देह पर नया कुर्ता नहीं डाला ताकि तेरी इंजीनियरिंग की फीस भरी जा सके? उस पिता से, जिसके पैरों के छाले आज भी रेलवे यार्ड की गिट्टियों की गवाही देते हैं? अरे कृतघ्न! अपनी इस ज़बान को काट क्यों नहीं लेता तू?"
"माँ, आप बीच में मत बोलिए!" आनंद ने उपेक्षा से मुँह फेर लिया। "फीस भरी तो कौन-सा एहसान कर दिया? बाप थे, तो औलाद को पालना उनका कानूनी फर्ज़ था! पैदा किया था तो क्या सड़क पर भीख माँगने के लिए छोड़ देते? हर बाप पढ़ाता है! इसमें कोई पहाड़ नहीं तोड़ दिया!"
मैं अपनी कुर्सी पर बैठा रहा। मेरे हाथ-पैर बर्फ की तरह ठंडे पड़ चुके थे।
मेरी आँखों के सामने एक चलचित्र की तरह सब कुछ घूमने लगा।
मुझे याद आया वह दिन, जब बनारस की मूसलाधार बारिश में आनंद को निमोनिया हुआ था। रात के दो बजे जब कोई रिक्शा नहीं मिल रहा था, मैं इस लड़के को अपनी छाती से चिपकाकर, नंगे पाँव तीन किलोमीटर कीचड़ में भागते हुए रेलवे अस्पताल पहुँचा था। मेरे पाँवों से खून बह रहा था, पर मेरी आँखें सिर्फ इसकी साँसों को नाप रही थीं।
मुझे याद आई वह दोपहर, जब आनंद की कोचिंग फीस के पंद्रह सौ रुपये चुकाने के लिए मैंने कैंटीन में महीनों तक दोपहर का खाना छोड़ दिया था और नल का पानी पीकर अपनी भूख मारी थी।
मुझे याद आई कुसुम की वह पुरानी, फटी हुई लाल सूती साड़ी, जिसे उसने पाँच साल तक इसलिए नहीं बदला ताकि आनंद के लिए अंग्रेज़ी की मोटी गाइड खरीदी जा सके।
और आज... आज उसी लड़के ने, जिसकी रीढ़ को सीधा करने के लिए मैंने अपनी पूरी रीढ़ गला दी थी, मेरे चेहरे पर थूकते हुए पूछ लिया था—आखिर तुमने मेरे लिए किया ही क्या है?
मेरी आँखों से एक बूँद आँसू नहीं गिरा। जब दर्द इंसान की सहने की सीमा को पार कर जाता है, तो आँसू भी सूखकर पत्थर बन जाते हैं।
उस रात मुझे पहली बार अपनी उस अभागी माँ की याद बहुत शिद्दत से आई।
मैंने मन ही मन अपनी माँ से पूछा—माँ, तू बहुत भाग्यशाली थी। तू ढाई साल की उम्र में ही मुझे छोड़कर इस दुनिया से चली गई। तूने अपने उस नन्हे लाल के मुँह से ऐसे ज़हरीले शब्द नहीं सुने। काश! काश मैं भी उसी दिन तेरे साथ उस ठंडे चूल्हे के पास मर गया होता! कम से कम आज अपनी ही औलाद के हाथों अपने स्वाभिमान की यह नग्न हत्या तो न देखनी पड़ती!
मैं धीरे से उठा। बिना एक शब्द बोले, बिना किसी की तरफ देखे, मैं अपने कमरे की ओर बढ़ गया। मेरे कदम इतने भारी थे मानो मैं अपने ही पैरों में अपने कफ़न का सिरा बाँधकर घसीट रहा हूँ।
पीछे डाइनिंग रूम में पंखे की घरघराहट के बीच बर्तनों के पटकने की आवाज़ें आ रही थीं।
कमरे में आकर मैंने बत्ती नहीं जलाई। अंधेरे में खटिया के कोने पर बैठ गया। कुसुम कमरे में आई और मेरे पैरों के पास ज़मीन पर बैठकर अपना सिर मेरे घुटनों पर रखकर सिसकने लगी। उसकी देह हिचकियों से कांप रही थी।
"मुझे माफ कर दीजिए..." कुसुम रोते-रोते कह रही थी, "मेरी कोख से ऐसे पत्थर पैदा हुए... मुझे माफ कर दीजिए..."
मैंने बहुत धीमे से अपना कांपता हुआ हाथ कुसुम के सफेद हो चुके बालों पर रख दिया।
मेरी आवाज़ में कोई क्रोध नहीं था, कोई चीख नहीं थी; वहाँ केवल एक ऐसा भयावह सन्नाटा था जो श्मशान की राख पर उतरता है।
"कुसुम, रोओ मत," मैंने शून्य में देखते हुए कहा। "इसमें तुम्हारी कोख का कोई दोष नहीं है। दोष इस अभागे बाप की उम्मीदों का था। मैंने सोचा था कि मैं अपने बच्चों को संस्कार दे रहा हूँ, पर मैं भूल गया था कि दुनिया केवल लेन-देन का बाज़ार है। जिस दिन पिता देने लायक नहीं रहता, उस दिन वह अपने ही घर में बेगाना हो जाता है।"
उस रात रेलवे कॉलोनी के ऊपर का आसमान बादलों से ढँका था, पर एक बूँद बारिश नहीं गिरी। उमस इतनी थी कि दम घुट रहा था।
और उस घुटन भरी रात में मेरे भीतर का वह पिता, जिसने पच्चीस साल तक अपने स्वाभिमान को सीने से लगाकर रखा था, हमेशा के लिए मर गया। अब उस खटिया पर केवल एक बूढ़ा, थका हुआ रेलवे कर्मचारी बैठा था, जो अपनी ही छत के नीचे एक लावारिस मुसाफिर की तरह अपनी बची हुई साँसों के दिन गिनने के लिए विवश था।

अध्याय ७: रिटायरमेंट की साँझ, पेंशन का कुरुक्षेत्र और अंतिम निर्णय

पैंतीस बरस, सात महीने और नौ दिन।
रेलवे के सेवा-अभिलेखों के पीले पड़ चुके पन्नों पर यह केवल एक संख्या थी, पर मेरी देह के लिए यह एक पूरा युग था। बनारस कैंट स्टेशन के माल-गोदाम और यार्ड से जो सायरन हर रोज़ ठीक शाम पाँच बजकर तीस मिनट पर गूँजता था, उस दिन वह मेरे लिए अंतिम बार बजा। जब वह भोपू चीखकर शांत हुआ, तो मुझे लगा जैसे मेरी छाती के भीतर धड़कने वाली घड़ी की कमानी भी हमेशा के लिए ढीली पड़ गई हो।
दफ्तर के सभागार में औपचारिक विदाई की रस्म पूरी की गई थी। एक सस्ता, खुरदुरा सूती शॉल मेरे कंधों पर ओढ़ाया गया था, हाथ में शीशे के फ्रेम में मढ़ा प्रशस्ति-पत्र और गेंदे के फूलों का एक भारी, बासी हार थमाया गया था। मंडल रेल प्रबंधक ने मंच से भारी-भरकम शब्दों में कहा था, "बाबूजी ने भारतीय रेल को अपना जीवन समर्पित किया। इनका अनुशासन, इनकी ईमानदारी आने वाली पीढ़ियों के लिए नज़ीर है।"
मैं मंच पर सिर झुकाए बैठा रहा। मेरे भीतर एक कड़वी, सूखी हँसी मूक क्रंदन कर रही थी। जिस दफ्तर के लिए मैंने अपनी जवानी, अपने फेफड़े और अपनी आँखों की ज्योति होम कर दी, उसने मुझे एक शॉल और लकड़ी की एक दीवार-घड़ी देकर विदा कर दिया था; और जिन बच्चों के लिए मैंने अपनी पूरी रीढ़ गला दी, उनके भीतर मेरे वजूद का मोल कब का खत्म हो चुका था।
हाथ में रिटायरमेंट का वह भारी स्टील का बक्सा लिए जब मैं रेलवे कॉलोनी के अपने क्वार्टर की देहरी पर पहुँचा, तो नीम के पेड़ की लंबी, उदास परछाइयाँ आँगन को लील रही थीं। सरकारी नियम के अनुसार, ठीक साठ दिन के भीतर यह छत मुझे खाली करनी थी। अब मैं सरकार का मुलाज़िम नहीं, समाज के उस हाशिए पर खड़ा एक 'बुजुर्ग' था जिसकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी थी।
दरवाज़ा खुला। कुसुम चौखट पर खड़ी थी।
उसके सफेद पड़ चुके बालों की लटें हवा में उड़ रही थीं। उसकी आँखों में कोई उल्लास नहीं था, केवल पैंतीस साल की उस लंबी जंग की गहरी थकान थी। उसने आगे बढ़कर मेरे हाथ से वह भारी बक्सा लेना चाहा, पर मैंने उसे रोक दिया।
"रहने दो कुसुम, अब तो सिर्फ बोझ ढोने की ही आदत बची है," मैंने फीकी आवाज़ में कहा।
कमरे के भीतर कदम रखते ही वातावरण का खिंचाव मुझे अपनी चमड़ी पर महसूस हुआ। दालान में कोई सन्नाटा नहीं था, बल्कि एक ऐसी बेचैनी तैर रही थी जैसे किसी अदालत में पेशी से पहले वकीलों के बीच होती है।
बीच की मेज़ पर बड़ा बेटा आनंद बैठा था। उसकी कलाई पर चमचमाती विदेशी घड़ी बंधी थी, सामने एक मोटी डायरी खुली थी और उँगलियों के बीच पार्कर का पेन घूम रहा था। छोटा बेटा विजय उसके बगल में दोनों हाथ बाँधे, दीवार से टिककर खड़ा था। उसकी आँखें लगातार कमरे के फर्श को कुरेद रही थीं।
रसोई के पर्दे की ओट से दोनों बहुओं की सुगबुगाहट आ रही थी।
"बाबूजी, बैठिए," आनंद ने अपनी डायरी का पन्ना पलटते हुए बात की शुरुआत की। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सा बनावटी भारीपन था। "आज आपका बहुत बड़ा दिन है। यह क्वार्टर दो महीने में खाली होना है, इसलिए अब आपको बनारस में किसी किराए के मकान में भटकने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। हम दोनों बेटों ने फैसला किया है कि आप और माँ हमारे साथ ही रहेंगे।"
"हाँ बाबूजी," आनंद ने पेन की नोक को मेज़ पर ठक-ठक करते हुए बात आगे बढ़ाई, "पर आगे की व्यवस्था कागज़ पर साफ़ होनी चाहिए। रेलवे से आपको फंड का जो एकमुश्त भुगतान मिला है, और जो हर महीने पच्चीस हज़ार पेंशन आएगी, उसका क्या हिसाब है? महंगाई बहुत है, इसलिए फंड आधा-आधा दोनों भाइयों में बँट जाना चाहिए। और पेंशन हर महीने हमारे साझा खाते में आनी चाहिए, ताकि हम दोनों भाई आधा-आधा बाँटकर आपके खाने-पीने और दवा का इंतज़ाम देख सकें।"
'पेंशन का बँटवारा'—यह शब्द सुनते ही कुसुम के हाथ से पीतल का लोटा छूटकर फर्श पर गिर पड़ा। छनछनाहट की आवाज़ ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया।
इससे पहले कि कोई कुछ बोलता, बड़ी बहू दालान के बीचों-बीच आ खड़ी हुई। उसके चेहरे पर बरसों से जमा मैल और तल्खी मर्यादा की सारी सीमाएं तोड़कर बाहर आ गई। उसने चाय की खाली प्याली को मेज़ पर इतनी ज़ोर से पटका कि चीनी-मिट्टी की तश्तरी में बाल-भर दरार पड़ गई।
"बाबूजी, आप चुप क्यों हैं? ज़रा इस पेंशन के बँटवारे पर भी रोशनी डालिए!" बड़ी बहू की तीखी आवाज़ दालान की दीवारों को चीरती हुई गूँजी। "आप सीधे-सीधे यह क्यों नहीं कह देते कि आपको शुरू से ही बड़े बेटे और मुझसे परहेज़ रहा है? अगर पेंशन का बँटवारा नहीं होगा, तो क्या हम बेवकूफ हैं जो हर महीने घर का साझा बजट अपने सिर पर ढोएँ? शहर में फ्लैट का मेंटेनेंस, बच्चों के कॉन्वेंट का खर्च क्या आसमान से टपकता है? अगर आपकी पेंशन घर के खर्च में बराबर नहीं जुड़ेगी, तो हम किस बूते पर आपको अपने साथ रखें?"
कुसुम ने कांपते हाथों से अपनी छाती पकड़ ली। "बहू! कुछ तो मर्यादा रखो... ससुर हैं तुम्हारे, पिता समान हैं।"
"मर्यादा की बात आप मत ही कीजिए माँ जी!" बड़ी बहू ने अपने हाथ नचाते हुए सीधे कुसुम पर वार किया। "मर्यादा तो तब भी देखनी चाहिए थी जब आप दोनों का झुकाव हमेशा छोटे बेटे और छोटी बहू की तरफ रहा। आप चाहे लाख इंकार कर लें, पर हमें सब दिखता है। छोटी बहू सुबह उठकर आपके पैर दबाने का जो ढोंग करती है, जो दिन-भर मीठी-मीठी बातें बनाकर 'तन, मन और धन' से आपकी सेवा में जुटी रहती है, वह कोई मुफ्त में नहीं है! वह सब इसी पेंशन और फंड को हड़पने का रचा गया नाटक है!"
उसने विजय और छोटी बहू की तरफ ज़हरीली उँगली तानी।
"ये जो छोटा बेटा और छोटी बहू बने फिरते हैं न श्रवण कुमार, असलियत यह है कि इन्होंने अपनी 'तन-मन-धन की सेवा' का जाल इसीलिए बिछाया है ताकि आपकी पूरी गाढ़ी कमाई और हर महीने की पेंशन अपनी तिजोरी में समेट सकें। और बाबूजी, आप भी इनके इस पाखंड में अंधे हो चुके हैं! अगर ऐसा नहीं है, तो कहिए कि पेंशन आधी-आधी बँटेगी! साबित कीजिए कि आपके लिए दोनों बेटे बराबर हैं!"
आरोप इतना नीच था कि विजय का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वह आगे बढ़ा, उसकी मुट्ठियाँ भिंच गईं। "भाभी! अपनी ज़बान संभालिए! मेरी पत्नी ने अगर कभी माँ के घुटनों में तेल लगाया है या बाबूजी की दवाइयों का ध्यान रखा है, तो वह संस्कार के नाते किया है, किसी वसीयत के लालच में नहीं! आपने तो कभी एक लोटा पानी भी बाबूजी को सीधे हाथ से नहीं दिया, और आज जब सेवा की बात आई, तो आप हमारे भाव पर कीचड़ उछाल रही हैं?"
"हाँ-हाँ, रहने दो! हमें सब पता है!" बड़ी बहू तिनक कर बोली। "अगर इतने ही बड़े सेवादार हो, तो ले जाओ दोनों को अपने साथ! रखो अपने सिर पर! फिर हम भी देखते हैं कि बिना पेंशन के यह तन-मन-धन की सेवा कितने दिन चलती है!"
आनंद ने अपनी पत्नी को रोकने की रत्ती-भर कोशिश नहीं की। वह चुपचाप अपनी कलाई की घड़ी देखता रहा, मानो अपनी पत्नी की ज़बान से अपने ही मन की बात कहलवा रहा हो।
घर का दालान एक बाज़ार बन चुका था, जहाँ मेरी पैंतीस साल की तपस्या की बोली लग रही थी। एक तरफ पैसे की अंधी हवस और अहंकार था, दूसरी तरफ आरोपों की कालिख।
मैंने अपनी नज़रें घुमाकर छोटी बहू को देखा। वह रसोई के खंभे से सटी, सिर झुकाए आँसू बहा रही थी। उसने एक बार भी पलटकर जेठानी को कोई अपशब्द नहीं कहा। मुझे याद आया, जब भी मेरी या कुसुम की तबीयत बिगड़ी थी, इसी छोटी बहू ने रात-रात भर जागकर सेवा की थी, बिना किसी झिझक के हमारी दवाइयों और पथ्य का ध्यान रखा था। विजय की आँखें भी अपमान के आंसुओं से भरी थीं, पर उसके चेहरे पर अपने माँ-बाप को ठुकराने का कोई भाव नहीं था।
मेरे भीतर का सारा संशय समाप्त हो चुका था।
गंगा के पानी की तरह सब कुछ बिल्कुल निर्मल और साफ हो गया। रिश्तों की इस आख़िरी परीक्षा ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया था।
मैंने अपना भारी हाथ उठाया। उस एक इशारे में ऐसा फौलादी अनुशासन था कि बड़ी बहू की ज़बान जहाँ की तहाँ थम गई। कमरे में केवल पंखे की थकी हुई आवाज़ बची।
मैंने मेज़ पर रखी अपनी रेलवे की लाल पेंशन-बुक को अपनी हथेली में कसकर भींच लिया।
"बहू, तुमने आज मेरी बची-खुची ज़िंदगी का हिसाब बहुत अच्छी तरह चुकता कर दिया," मेरी आवाज़ में न कोई कंपन था, न कोई चीख; वहाँ केवल एक पत्थर जैसा अटल निर्णय था। "तुमने ठीक कहा। सेवा का कोई मोल नहीं होता, और जहाँ हर निवाले का हिसाब पेंशन के सिक्कों से लगाया जाए, वहाँ रहना किसी नर्क में घुटने से भी बदतर है।"
मैंने आनंद की तरफ देखा। वह अपनी नज़रें मुझसे मिला नहीं सका।
"आनंद, तू मेरा बड़ा बेटा है। तुझे अफ़सर बनाने के लिए मैंने अपनी देह का कतरा-कतरा गलाया था। पर आज मुझे अहसास हुआ कि मैं तुझे डिग्रियाँ तो दिला सका, पर एक संवेदनशील इंसान न बना सका। तेरी यह चौखट, जहाँ मेरे पसीने की कमाई को गिद्धों की तरह नोचने की होड़ लगी है, मेरे और तेरी माँ के लिए आज से पराई हो गई।"
फिर मैं मुड़ा और विजय तथा छोटी बहू के सामने जाकर खड़ा हुआ।
"विजय... बहू..." मेरा गला एक क्षण के लिए रुँधा, पर मैंने खुद को सँभाला। "तुम दोनों पर तुम्हारी भाभी ने आरोप लगाया कि तुम 'तन-मन-धन' से सेवा का दिखावा करते हो। पर इस बूढ़े बाप ने अपनी ज़िंदगी भर इंसानों की आँखों को पढ़ा है। मैंने देखा है कि जब तुम्हारी माँ दर्द से कराहती थी, तो किसकी आँखों में सच्चा दर्द होता था और कौन मुँह फेरकर अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लेता था।"
मैंने आगे बढ़कर अपनी वह लाल पेंशन-बुक विजय की खुली हथेली पर रख दी।
विजय चौंक गया। "बाबूजी... यह क्या कर रहे हैं आप? मुझे यह नहीं चाहिए! मैंने कभी इस पैसे के लिए..."
"चुप रहो विजय," मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे रोक दिया। "यह मैं तुम्हें कोई खैरात या बँटवारे का हिस्सा नहीं दे रहा हूँ। यह मेरे स्वाभिमान की अमानत है। आज से, इस घड़ी से—मैं और तुम्हारी माँ केवल और केवल तुम्हारे और छोटी बहू के साथ रहेंगे।"
बड़ी बहू का मुँह खुला का खुला रह गया। आनंद का चेहरा फक पड़ गया।
"बाबूजी, आप यह क्या कर रहे हैं?" आनंद घबराकर खड़ा हुआ। "समाज क्या कहेगा कि आपने बड़े बेटे को छोड़ दिया?"
"समाज तब कहाँ था आनंद, जब तूने इसी कमरे में खड़े होकर मुझसे पूछा था कि 'आपने मेरे लिए किया ही क्या है?'" मैंने पलटकर उसे देखा। मेरी आँखों की ठंडक ने उसे वहीं जमा दिया। "समाज को जाकर बता देना कि तुम्हारे बाप ने अपनी सेवा और अपने आत्मसम्मान का सौदा करने से इनकार कर दिया।"
मैंने विजय की आँखों में देखा। "बेटा, हम तुम्हारे साथ रहेंगे, तुम्हारी रूखी-सूखी रोटी खाएँगे। यह पेंशन तुम्हारी है, घर के खर्च में लगाओ, अपनी माँ की दवा में लगाओ, या अपने बच्चों के भविष्य में। पर याद रखना, जिस दिन तुम्हारी चौखट पर भी इस बूढ़े बाप और माँ के आत्मसम्मान को ठेस पहुँची, उस दिन यह अमानत वापस समेटकर हम दोनों गंगा किनारे चले जाएँगे।"
विजय ने घुटनों के बल बैठकर मेरे और कुसुम के पाँव पकड़ लिए। उसकी आँखों से आँसू बहकर मेरे पैरों को धो रहे थे। छोटी बहू ने आगे बढ़कर कुसुम के आँचल को थाम लिया और फफक पड़ी, "बाबूजी, जब तक हमारे शरीर में एक भी साँस है, आपको कभी किसी बात का दुख नहीं होने देंगे। यह घर आपका है, हम आपके सेवक हैं।"
उस रात, बँटवारे का वह भयानक कुरुक्षेत्र समाप्त हो गया।
बड़ी बहू और आनंद अपने कमरों में अपने टूटे हुए अहंकार और लालच के साथ बंद हो गए। और उस पुराने सरकारी क्वार्टर की वीरान चौखट पर, एक अनाथ, संघर्षशील पिता ने अपनी ढलती उम्र का सबसे कड़ा, स्वाभिमानी और निर्णायक फैसला लेकर अपने आत्मसम्मान की अंतिम रक्षा कर ली थी।

भाग ४: विछोह, वात्सल्य और वैराग्य

अध्याय ८: पछुआ बयार, खाली चौखट और महा-शून्य

पचहत्तर वर्ष की आयु तक आते-आते मनुष्य की देह किसी ऐसे पुराने खपरैल वाले मकान जैसी हो जाती है, जिसकी हर ईंट से चूना झड़ चुका हो और जिसकी कड़ियाँ अपनी ही छत का भार संभालते हुए चरमराने लगी हों। विजय के घर की इस बाहरी कोठरी में पड़े-पड़े जब मैं अपनी कांपती, नीली नसों से भरी हथेलियों को देखता, तो मुझे विश्वास ही नहीं होता था कि इन्हीं हाथों ने कभी रेलवे के भारी बही-खाते पलटे थे, फावड़े चलाए थे और जीवन भर महाजनों के कर्ज़ का बोझ ढोया था।
घुटनों का गठिया अब हड्डियों को भीतर से कुरेदता था। आँख के मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने के बाद भी दुनिया के रंग मद्धम, मटमैले और धुंधले हो चुके थे। कानों में एक अनवरत सीटी बजती रहती थी। खाँसी का ऐसा दौरा उठता कि पसलियाँ दुखने लगतीं और छाती थामकर बैठना पड़ता था।
छोटा बेटा विजय और छोटी बहू अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ते थे। छोटी बहू सुबह ठीक समय पर गर्म पानी, मेथी का काढ़ा और दलिया लेकर आ जाती। विजय दफ्तर जाने से पहले रोज़ कमरे का दरवाज़ा खोलकर पूछता, "बाबूजी, दवा ली? कोई तकलीफ तो नहीं?"
पर सेवा और अपनत्व के इस कवच के भीतर भी बुढ़ापे की एक ऐसी ज़हरीली बेचारगी होती है, जो इंसान को अंदर ही अंदर दीमक की तरह चाटती है। जब अपनी ही धोती बदलने के लिए किसी का सहारा लेना पड़े, जब रात के अंधेरे में पेशाब की नली या लाठी ढूँढने के लिए खटिया टटोलनी पड़े और खाँसी का एक घूँट पानी माँगने के लिए भी यह सोचना पड़े कि कहीं बच्चे अपनी नींद से जागकर परेशान न हो जाएँ—तब लंबी उम्र कोई वरदान नहीं, ईश्वर द्वारा दी गई सबसे निर्मम सज़ा लगने लगती है।
और इस जर्जर काया के ऊपर सबसे बड़ा वज्रपात तब हुआ, जब कुसुम की साँसों की डोरी टूट गई।
कुसुम भी पिचहत्तर की हो चुकी थी। वह देह से तो इस घर में थी, पर उसकी आत्मा उसी दिन कुम्हला गई थी जब बड़े बेटे आनंद ने पेंशन के सिक्कों से माँ-बाप के वजूद का मोल लगाया था। उसने पिछले कुछ सालों में अन्न का एक-एक दाना ऐसे निगला था मानो कड़वा घूँट पी रही हो। वह हर पहर शून्य में ताकती रहती।
माघ की उस सर्द रात को बनारस पर कोहरा इतना घना था कि खिड़की के काँच पर भाप की बूँदें जम गई थीं। रात के पिछले पहर कुसुम ने अचानक मेरी रज़ाई का कोना खींचा। उसकी साँसें उखड़ रही थीं, कंठ से एक घुरघुराहट सी आवाज़ आ रही थी।
विजय बदहवास होकर डॉक्टर को फोन करने दौड़ा, छोटी बहू ने गर्म पानी से उसकी हथेलियाँ मलनी शुरू कीं। मैंने अपने थरथराते हाथों से उसका सिर अपनी गोद में रख लिया। उसके माथे का पसीना मेरी उँगलियों पर ठंडा पड़ रहा था।
"कुसुम... अरे कुसुम! आँखें खोलो!" मेरी आवाज़ में वह अनाथ बच्चा रो पड़ा, जिसकी दुनिया एक बार फिर उजड़ने वाली थी। "मुझे अकेला मत छोड़ो कुसुम... मैं इस वीराने में किसके सहारे जियूँगा?"
कुसुम ने बहुत प्रयास करके अपनी धुंधली, पथराई पुतलियाँ उठाईं। उसकी उँगलियों में अब इतनी भी ताक़त नहीं थी कि वे मेरी कलाई को थाम सकें। उसने कांपते होंठों से बहुत महीन, बुझती हुई आवाज़ में कहा, "माफ कर दीजिएगा... मैं पहले जा रही हूँ... आपको इस... इस अकेलेपन में छोड़कर..."
उसकी नज़र एक क्षण के लिए कमरे की खाली चौखट की तरफ घूमी। उस नज़र में अपनी बिखरी हुई गृहस्थी, अपने दूर हो चुके बड़े बेटे आनंद, अपनी ब्याही हुई बेटी मुन्नी—सबको एक अंतिम बार अपनी छाती से लगा लेने की असीम, बेबस तड़प थी। वह अपनी आँखों से ही सबको ढूँढ रही थी। पर चौखट सूनी थी।
और फिर, एक हिचकी के साथ कुसुम की गर्दन एक तरफ ढुलक गई।
उसकी देह निष्प्राण हो चुकी थी। वह स्त्री, जिसने आधी सदी तक मेरी हर फटी कमीज़ पर रफू किया था, जिसने महाजन का कर्ज़ उतारने के लिए अपनी शादी की अंतिम पाज़ेब मेरी हथेली पर रख दी थी, जिसने अपने बच्चों के तानों का ज़हर पीकर भी मेरे स्वाभिमान को कभी झुकने नहीं दिया था—वह मुझे इस संसार के क्रूर मेले में अकेला छोड़कर हमेशा के लिए विदा हो गई।
मणिकर्णिका घाट पर जब चिता की लपटें गंगा के काले पानी पर नाच रही थीं, तब आनंद भी आया था। उसने सिर मुंडाया, सफेद धोती पहनी। पर वह मेरे करीब आने का साहस न जुटा सका। मैंने भी उसकी तरफ नहीं देखा। क्योंकि जब भीतर का समंदर ही सूख जाए, तो किनारे के पत्थरों से क्या गिला करना?
क्रिया-कर्म बीत जाने के बाद जब घर में रिश्तेदारों की भीड़ छँट गई, तो उस कमरे में जो सन्नाटा उतरा, वह किसी श्मशान से भी अधिक भयावह था।
कुसुम की पुरानी लाल किनारी वाली साड़ियाँ खूँटी पर टंगी रह गईं। उसका चश्मा, उसकी तुलसी की कंठी, और वह पीतल की डिबिया जिसमें वह अपनी लौंग-इलायची रखती थी—सब कुछ अपनी जगह पर था, बस वह देह नहीं थी जो आधी रात को मेरी ज़रा-सी खाँसी पर उठकर पानी का लोटा मेरे मुँह से लगा देती थी।
अब दिन पहाड़ की तरह कटते थे। सुबह से शाम तक खटिया पर लेटे-लेटे मैं छत की कड़ियों को घूरता रहता।
इस उम्र में, जब मौत सिरहाने खड़ी दिखती है, तो मन विचित्र-विचित्र भ्रमों और तृष्णाओं से घिर जाता है। सारे गिले-शिकवे, सारा क्रोध और सारा स्वाभिमान पिघलकर एक अजीब-सी कमज़ोरी में बदलने लगता है। मन करता था कि कोई आए, मेरे पास बैठे, मेरा हाथ थामे।
मन में एक बेतहाशा, अधीर इच्छा उठती कि काश, आनंद अपने बच्चों को लेकर आ जाए। वह बस चौखट पर खड़ा होकर एक बार कह दे—'बाबूजी, मुझे माफ कर दीजिए।'—तो मैं अपने कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ फेर दूँ। मन करता कि मुन्नी आए, अपने ससुराल की सारी चिंताएँ छोड़कर दो दिन मेरे सिरहाने बैठे, मेरे सफेद बालों में अपनी उँगलियाँ फिराए और मुझे अपने बचपन की बातें सुनाए। कभी लगता कि पैतृक गाँव की उस धूल भरी पगडंडी पर एक बार फिर जाऊँ, उस ननिहाल के आँगन की मिट्टी को माथे से लगाऊँ जहाँ मामा ने मुझे अपनी छाती से लगाकर जीवन की पहली साँसें दी थीं।
पर कोई नहीं आता था। सबके अपने-अपने संसार थे, अपनी-अपनी आपाधापी थी, अपनी-अपनी दीवारें थीं।
दोपहर के सन्नाटे में जब घर के बाकी लोग अपने-अपने कमरों में सो जाते, मैं अपनी लाठी टेककर धीरे-धीरे उस खूँटी के पास जाता जहाँ कुसुम की साड़ी लटक रही थी। मैं उस सूती, घिसे हुए कपड़े को अपने चेहरे से सटा लेता। उसमें से अब भी कुसुम के बदन और गंगाजल की मिली-जुली सौंधी महक आती थी।
मैं उस बेजान कपड़े को छाती से भींचकर बच्चों की तरह सिसक-सिसक कर रोता—"कुसुम, तू मुझे क्यों छोड़ गई? तू तो कहती थी कि सात जन्मों का साथ है, फिर इस ढलान पर मुझे इस बेचारगी के हवाले क्यों कर दिया? मुझसे यह बुढ़ापा अब और झेला नहीं जाता कुसुम... मुझे भी अपने पास बुला ले..."
बाहर से सड़क पर गुज़रती गाड़ियों का शोर आता, कभी किसी फेरीवाले की आवाज़ गूँजती, पर उस कमरे के भीतर पिचहत्तर वर्ष का एक लाचार, बीमार और थका हुआ पिता अपने अस्तित्व के अंतिम, टूटे हुए तिनकों को समेटने की नाकाम कोशिश में अपनी ही सिसकियों के साथ दम साध रहा था। संसार का सारा वैभव, सारे रिश्ते और सारी उपलब्धियाँ उस खाली चौखट और कुसुम के बिछोह के आगे धूल के समान प्रतीत हो रही थीं।

अध्याय ९: मासूम किलकारियाँ और घावों पर वात्सल्य का मरहम

कुसुम की तेरहवीं बीत चुकी थी। घर में आए नाते-रिश्तेदारों का जमघट जैसे ही छँटा, कमरों से धूप-बत्ती और हवन का धुआँ तो हवा में विलीन हो गया, पर मेरे सीने की कोठरी में जो धुंधलका जमा था, वह किसी भी तरह छंटने का नाम नहीं ले रहा था।
मेरी पूरी दुनिया अब उस खटिया, दीवार के सहारे टिकी बाँस की लाठी और सामने की सूनी खिड़की तक सिमट कर रह गई थी। भूख-प्यास की कोई सुध नहीं रहती थी। छोटी बहू जब कटोरे में दलिया या खिचड़ी लेकर आती, तो मैं केवल दो चम्मच हलक के नीचे उतारकर थाली खिसका देता। देह का भार दिन-ब-दिन घट रहा था, पर आत्मा पर उस अकेलेपन और कुसुम के चले जाने का बोझ इतना भारी था कि हर साँस के साथ पसलियों में दर्द उठता था।
लेकिन उस घोर अंधकार में ईश्वर ने मुझे पूरी तरह बेसहारा नहीं छोड़ा था। उसी आँगन में ज़िंदगी का एक ऐसा पावन और निश्छल सोता फूट पड़ा, जिसने मेरे पथरा चुके आंसुओं को धीरे-धीरे पिघलाना शुरू किया।
उस घर में जीवन का नया वसंत चार नन्हे परिंदों के रूप में चहक रहा था—छोटे बेटे विजय की दो बेटियाँ, बड़ी पोती आरोही (आठ वर्ष) और छोटी आशी (पाँच वर्ष); तथा छुट्टियों में ननिहाल आई बेटी मुन्नी की दो संतानें—दस बरस का नाती कबीर और सात बरस की नातिन मायरा।
घर के बड़े लोग जब अपनी-अपनी औपचारिकताओं, नौकरी की आपाधापी और गृहस्थी के तनावों में उलझे रहते, तब इन चार मासूमों को बड़ों की उस बेरहम, स्वार्थी दुनिया की ज़रा भी खबर न थी। उनके लिए मेरी वह बाहरी कोठरी किसी बीमार, थके हुए बूढ़े का कमरा नहीं थी; उनके लिए वह एक ऐसी जादुई गुफा थी जहाँ प्यार, दुलार और परियों की अनकही कहानियों का असीम खजाना छिपा था।
शुरुआत फागुन की एक ऐसी ही उदास दोपहर को हुई, जब मैं कुसुम की तस्वीर के आगे आँखें मूँदे, अपनी खटिया पर बेसुध पड़ा था।
अचानक कमरे का परदा बहुत हौले से हिला। छोटी पोती आशी दबे पाँव कमरे में दाखिल हुई। उसके पीछे-पीछे नातिन मायरा भी चली आई। दोनों के हाथों में काँच की कुछ पुरानी, खनकती हुई रंग-बिरंगी चूड़ियाँ थीं—वही चूड़ियाँ जो कुसुम पूजा के ताखे पर सिंदूर की डिबिया के साथ सहेज कर रखा करती थी।
आशी ने लड़खड़ाते हुए मेरी खटिया का कोना पकड़ा और अपनी तोतली, मिश्री जैसी बोली में पुकारा, "दादाजी... आप सो रहे हो क्या?"
मैंने भारी पलकें उठाईं। उस नन्ही बच्ची की आँखों में कोई सवाल नहीं था, केवल एक अथाह, अबोध अपनापन था।
वह बिना किसी झिझक के खटिया पर चढ़ने की कोशिश करने लगी। उसके नन्हे घुटने कांप रहे थे। मैंने अपनी दुर्बल, थरथराती बाँहों को आगे बढ़ाया और सहारा देकर उसे अपनी छाती के पास खींच लिया। उसके ठीक पीछे मायरा भी खटिया के पाए से टिककर बैठ गई और उसने अपना नन्हा सा हाथ मेरी उँगलियों में उलझा दिया।
आशी ने अपनी मुलायम, मखमली हथेली मेरे गाल की खुरदरी झुर्रियों पर फेर दी। उसकी उँगलियों के उस शीतल स्पर्श ने मेरी आत्मा तक को भीतर से तरबतर कर दिया।
"दादाजी, आपकी आँखों में पानी क्यों है?" आशी ने अपनी नन्हीं उँगली से मेरे गाल पर ढुलक आए आँसू को छूते हुए पूछा।
फिर मायरा ने अपने दोनों हाथों में रखी वे लाल और हरी चूड़ियाँ मेरी खुली हथेली पर सजा दीं।
"नानाजी, यह नानी की चूड़ियाँ हैं ना? माँ कह रही थी कि नानी तारों के पार भगवान जी के पास चली गई हैं। पर नानी ने सपने में आकर कहा था कि जब नानाजी और दादाजी उदास हों, तो हम चारों उनके पास जाकर बैठें। देखिए, हम आपके पास आ गए हैं!"
उन दो अबोध बच्चियों के मुँह से कुसुम का यह ज़िक्र सुनते ही मेरी पथराई आँखों के बाँध एक बार फिर टूट पड़े। पर इस बार वे आँसू किसी अपमान या कड़वाहट के नहीं थे; वे उस निस्वार्थ वात्सल्य के अमृत-घूँट थे जो केवल इन निश्छल कलियों से ही रिस सकते थे। मैंने उन दोनों बच्चियों को अपने सीने से पूरी ताकत से चिपका लिया। उनके बदन से आती ताजे दूध और बच्चों के पाउडर की वह सौंधी गंध सीधे मेरे फेफड़ों में उतर गई और उसने कमरे के उस सड़े हुए, दमघोंटू सन्नाटे को एक ही पल में बाहर फेंक दिया।
तभी बाहर दालान से दौड़ते हुए कदमों की आवाज़ आई और नाती कबीर तथा बड़ी पोती आरोही भी कमरे में दाखिल हो गए।
कबीर के हाथ में उसकी पुरानी, टूटी हुई प्लास्टिक की रेलगाड़ी थी, जिसका एक पहिया निकल चुका था। आरोही के हाथ में उसकी स्कूल की चित्रकला की कॉपी और मोम वाले रंग थे।
"नानाजी! देखिए ना, इस ट्रेन का पहिया निकल गया," कबीर ने पूरे अधिकार के साथ मेरी रज़ाई पर अपनी गाड़ी रखते हुए कहा। "माँ कहती है कि आप तो बहुत बड़ी-बड़ी असली रेलगाड़ियों के बाबू थे। आपको तो सब जोड़ना आता है। आप ही मेरी इस गाड़ी को ठीक कर दीजिए!"
और आरोही ने आगे बढ़कर मेरी बाँस की पुरानी लाठी को अपनी दोनों हथेलियों में कसकर थाम लिया, "दादाजी! आप हर वक्त इस बंद कमरे में क्यों लेटे रहते हैं? चलिए न बाहर आँगन में! देखिए, आज नीम के पेड़ के नीचे कितनी गुनगुनी धूप खिली है। हमें आपकी कहानियाँ सुननी हैं—वो गाँव के मामा के खेतों वाली, वो बंबई की भारी बारिश वाली और गंगा मैया के घाटों वाली!"
उस एक दोपहर ने मेरी ढलती साँझ की पूरी काया ही पलट दी।
जिन बेटों के लिए मैंने अपनी ज़िंदगी भर की कमाई, अपनी रीढ़ की हड्डियाँ और अपने अरमान होम कर दिए थे, उन्होंने तो मेरे बुढ़ापे को केवल एक 'बोझ' और 'पेंशन का खाता' मानकर किनारे कर दिया था; पर इन चार मासूम रूहों ने बिना किसी लालच, बिना किसी वसीयत या धन की आस के, मुझे अपनी छोटी सी दुनिया का सबसे बड़ा राजा बना दिया था। उनके लिए मेरी पेंशन का कोई मोल नहीं था; उनके लिए तो बस मेरे कांपते हाथों का वह सहारा, मेरी खटिया का वह कोना और मेरी कहानियों की जादुई आवाज़ ही दुनिया का सबसे अनमोल खजाना थी।
उस दिन के बाद से मेरी वीरान ज़िंदगी में एक नया, पवित्र अध्याय शुरू हुआ।
अब सुबह जब मेरी आँख खुलती, तो खाँसी की घबराहट या सीने के दर्द से पहले कानों में आँगन से आती इन बच्चों की चहचहाहट गूँजती। मैं खुद लाठी टेककर धीरे-धीरे कमरे से बाहर आता और नीम के पेड़ के नीचे बिछी तख्तपोश पर बैठ जाता।
दोपहर की मीठी धूप में कबीर मेरे घुटनों के पास बैठकर तार और धागे से अपनी रेलगाड़ी ठीक करवाता। जब पहिया घूमने लगता, तो वह पूरे आँगन में तालियाँ बजाता हुआ नाच उठता—"मेरे नानाजी ने रेलगाड़ी ठीक कर दी! मेरे नानाजी दुनिया के सबसे बड़े अफसर हैं!"—उस दस साल के नाती के उन मासूम शब्दों में जो गहरा गर्व था, उसने बड़े बेटे आनंद द्वारा दिए गए उन सारे तीखे तानों के ज़ख्मों को एक पल में भर दिया।
मायरा और आरोही मेरी गोद में अपनी कॉपियाँ रखकर बैठ जातीं। मैं अपनी थरथराती उँगलियों से उनकी नन्हीं हथेलियों को थामता और उन्हें सुलेख लिखना सिखाता। जब अक्षरों की बनावट सीधी हो जाती, तो दोनों उछल पड़तीं—"दादाजी ने शाबाशी दी!"
और छोटी आशी... वह तो मेरी साक्षात परछाईं बन चुकी थी। जब भी मैं खाँसता, वह दौड़कर अपनी छोटी सी स्टील की कटोरी में पानी लेकर आती और अपने नन्हे हाथों से मेरे होंठों से लगा देती।
"दादाजी, पानी पी लो... फिर खाँसी भाग जाएगी," वह मेरी आँखों में झांककर कहती। उस वक्त मुझे लगता कि साक्षात गंगा मैया ही उस अबोध बच्ची का रूप धरकर मेरे पाँवों के पास उतर आई हैं।
शाम के समय जब बनारस के मंदिरों से घंटियों और शंखों की आवाज़ गूँजती, तो ये चारों बच्चे मेरी चारपाई के चारों ओर एक घेरा बनाकर बैठ जाते। कोई मेरा चश्मा पोंछकर मेरी आँखों पर लगाता, तो कोई मेरे पाँवों को अपनी नन्हीं हथेलियों से सहलाने लगता।
मैं उन्हें रामायण की चौपाइयाँ सुनाता, मामा के उस ननिहाल के खेतों की सादगी बताता, और समझाता कि जीवन में कभी किसी के आगे झुकना नहीं, हमेशा सच की राह पर चलना। जब कभी कहानियों के बीच कुसुम की याद आकर मेरा गला भर आता और मेरी पलकों से आँसू छलक पड़ते, तो मायरा और आशी अपनी फ्रॉक के कोने से मेरे गाल पोंछ देती थीं।
"नानाजी, रोते नहीं हैं... हम चारों तो आपके पास हैं ना!"
वे चार मासूम चेहरे और उनके निष्कपट शब्द किसी भी ब्रह्मज्ञान से बड़े थे।
मुझे अहसास हुआ कि कुसुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं गई थी। वह इन दोनों पोतियों और नाती-नातिन की निश्छल आँखों में, इनकी हंसी में और इनकी इस निस्वार्थ सेवा में हर पल मेरे ही साथ सांस ले रही थी। जिस संसार ने मुझे उम्र की ढलान पर कंगाल समझकर छोड़ दिया था, ईश्वर ने इन चार नन्हे फरिश्तों के रूप में मुझे प्रेम की वह अमर दौलत सौंप दी थी जिसे दुनिया की कोई दौलत, कोई स्वार्थ और कोई बँटवारा कभी नहीं छीन सकता था।

अध्याय १०: वैराग्य की भोर, तुलसी की माला और भगवत शरण

मनुष्य जब जीवन की धूप-छाँव से थककर अपनी लाठी टेकता है, तब उसे समझ आता है कि संसार केवल एक सराय है—जहाँ सब मुसाफिर बनकर कुछ देर ठहरते हैं, अपना-अपना स्वार्थ साधते हैं और सुबह होते ही अपनी राह चल पड़ते हैं। जो घर कभी मेरा गर्व था, जिसकी ईंट-ईंट में मेरे पसीने की महक थी, अब वह मेरे लिए केवल एक ऐसा पड़ाव था जहाँ से मुझे अपनी अंतिम यात्रा की तैयारी करनी थी।
पोतियों और नाती-नातिन के निश्छल प्रेम ने मेरे सीने पर लगे तानों और उपेक्षा के ज़ख्मों को भर तो दिया था, पर उस वात्सल्य के पार भी एक ऐसा मौन था जो मुझे अपनी ओर खींच रहा था।
मेरी उम्र अब अस्सी के मुहाने पर पहुँच चुकी थी। काया इतनी जीर्ण-शीर्ण हो गई थी कि सुबह चारपाई से उठने के लिए भी अपनी ही कांपती हड्डियों से मिन्नतें करनी पड़ती थीं। अब न किसी से कोई अपेक्षा थी, न किसी बात की शिकायत। बड़े बेटे आनंद का वह कड़वा सवाल—'आखिर तुमने मेरे लिए किया ही क्या है?'—अब चुभता नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा कड़वा सच बनकर मेरे भीतर जम गया था जिसने मुझे मोह के सबसे बड़े बंधन से मुक्त कर दिया था।
एक दिन भोर में, जब गंगा पर मद्धम कुहासा तैर रहा था और आकाश में भोर का तारा टिमटिमा रहा था, मैंने अपनी खटिया छोड़ी।
अलमारी के पुराने कोने से मैंने कुसुम की वही तुलसी की कंठी निकाली, जो उसने मणिकर्णिका जाने से पहले ताखे पर रखी थी। काठ के वे घिसे हुए दाने जब मेरी उँगलियों में आए, तो मुझे लगा जैसे कुसुम ने अपनी उँगलियाँ मेरी हथेली में डाल दी हों। मैंने उस माला को अपने माथे से लगाया और गले में धारण कर लिया।
उसी दिन से मेरी ज़िंदगी की दिशा पूरी तरह बदल गई।
अब मैं किसी से संसार की बातें नहीं करता था। विजय जब दफ्तर के तनाव की बात छेड़ता, तो मैं केवल मंद-मंद मुस्कुरा देता। घर में कौन-सा नया सामान आया, बाहर बाज़ार में क्या भाव है, कौन-सा रिश्तेदार क्या कह रहा है—ये सारी बातें मेरे कानों तक पहुँचने से पहले ही हवा में विलीन हो जाती थीं।
मेरी कोठरी के उस छोटे से ताखे पर अब केवल दो ही ग्रंथ रह गए थे—श्रीमद्भगवद्गीता और रामचरितमानस।
मोटे काँच के चश्मे को नाक पर टिकाकर, जब मैं कांपती उँगलियों से गीता के पन्ने पलटता, तो भगवान श्रीकृष्ण का वह श्लोक सीधे मेरी अंतरात्मा में गूँज उठता था:

 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
 मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
 
मैं उस श्लोक को बार-बार पढ़ता और देर तक छत की कड़ियों को देखता रहता।
मुस्कुराकर मन ही मन सोचता—हे माधव! तूने कितना बड़ा सत्य कितने सरल शब्दों में कह दिया था। मैं अभागा ही था जो फल की आस लगाए बैठा रहा। मैंने सोचा था कि जिन बच्चों को मैंने अपनी पसलियों का चूरा बेचकर पाला है, वे बुढ़ापे में मेरे आंसुओं का घूँट पिएँगे। मैं भूल गया था कि मेरा अधिकार केवल अपने कर्तव्य पर था, उनके मन पर नहीं। जब मेरा दिया हुआ जीवन ही उनका नहीं रहा, तो फिर उनके भावों पर मेरा क्या अधिकार?
उस दिन मेरे भीतर से मोह का अंतिम तिनका भी भस्म हो गया।
अब न आनंद के प्रति कोई कड़वाहट थी, न विजय के प्रति कोई विशेष आसक्ति। मैंने सबको क्षमा कर दिया था—उस पिता को भी जिसने ढाई साल की उम्र में मेरी माँ की बलि ले ली थी, उस महाजन को भी जिसने सात साल तक मेरा पसीना निचोड़ा था, और अपने उन बेटों को भी जिन्होंने मेरी पेंशन की मेज़ पर मेरे स्वाभिमान को नीलाम किया था। क्षमा किसी पर उपकार नहीं थी; वह तो मेरी अपनी आत्मा को उस मैल से धोकर निर्मल करने का एकमात्र मार्ग था।
सुबह का समय अब काशी विश्वनाथ के नाम हो गया था।
जब भोर में मंदिर की घंटियाँ बजतीं, मैं अपनी लकड़ी की लाठी टेकते हुए, बहुत धीरे-धीरे दालान में रखे तुलसी के पौधे के पास आ बैठता। वही तुलसी, जिसे कभी कुसुम ने अपने हाथों से सींचा था। मैं पीतल के तांबे से उस पर गंगाजल चढ़ाता और आँखें मूँदकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने लगता:

 ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
 उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
 
मंत्रों की वह गूँज जब मेरे सूखे कंठ से निकलती, तो मुझे अपनी छाती में एक अपार, असीम शांति महसूस होती। लगता जैसे गंगा की शीतल धारा मेरे भीतर बह रही हो और जीवन भर की सारी तपन, सारे अपमान और सारे संताप उस जल में बहकर विलीन हो रहे हों।
दोपहर में जब बच्चे स्कूल से लौटते, तो वे मेरी इस भक्ति में भी मेरे साथी बन जाते।
छोटी पोती आशी मेरी गोदी में आकर बैठ जाती और अपनी नन्हीं उँगलियों से मेरी तुलसी की माला के दानों को गिनने लगती—"एक... दो... तीन... दादाजी, राम जी कितनी दूर रहते हैं?"
और मैं उसके सिर पर हाथ फेरकर कहता, "राम जी कहीं दूर नहीं रहते मेरी बच्ची, वे वहीं रहते हैं जहाँ किसी के मन में छल-कपट न हो, जहाँ कोई किसी के पसीने का मोल पैसे से न लगाए। वे तेरे इस छोटे से दिल में रहते हैं।"
बड़ी पोती आरोही मेरी पोथी का पन्ना खोल देती, और कबीर तथा मायरा ज़मीन पर पालथी मारकर बैठ जाते। मैं उन्हें श्लोकों का अर्थ नहीं समझाता था, मैं उन्हें जीवन का सार सुनाता था—कि किसी का दिल मत दुखाना, कभी किसी की लाचारी का उपहास मत उड़ाना, और चाहे कितनी भी विपत्ति आए, अपने स्वाभिमान और सत्य का दामन मत छोड़ना।
बच्चे शांत होकर सुनते। उनकी आँखें उस पीली रोशनी में ऐसी चमकतीं मानो वे भविष्य की किसी पवित्र ज्योति को अपनी आत्मा में उतार रहे हों।
अब मुझे अपनी देह के छूटने का कोई भय नहीं रह गया था। मृत्यु अब किसी भयानक अंधकार जैसी नहीं लगती थी; वह तो एक ऐसी परम सखी जान पड़ती थी जो मुझे इस जर्जर चोले से मुक्त करके, उस अनंत विश्राम की ओर ले जाने वाली थी जहाँ न कोई बँटवारा था, न कोई पेंशन की रसीद, और जहाँ कुसुम मेरा इंतज़ार कर रही थी।
मैंने अपने दोनों हाथ जोड़कर उस परम सत्ता के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था।
मन भीतर से इतना हल्का हो चुका था जैसे हवा में उड़ता हुआ कोई सूखा पत्ता—जो किसी भी डाल से नहीं बंधा, जिसे ज़मीन पर गिरने का कोई मलाल नहीं, क्योंकि वह जानता है कि हवा का हर झोंका अब उसे केवल और केवल ईश्वर के चरणों की ओर ही ले जा रहा है। संसार के सारे खाते बंद हो चुके थे, अब केवल उस अंतिम फैसले का इंतज़ार था जो मुझे अपनी जीवन-संध्या में लेना था।

भाग ५: पूर्णाहूति और परम शांति

अध्याय ११: अंतिम संकल्प और निष्कपट को सर्वस्व

अस्सी वर्ष की देह अब किसी जीर्ण-शीर्ण नौका जैसी हो चुकी थी, जो गंगा के किनारे लगी केवल उस अंतिम लहर की प्रतीक्षा कर रही थी जो उसे इस पार से उठाकर उस पार पहुँचा दे।
सुबह का सूरज जब खिड़की की झिर्रियों से छनकर मेरे पैरों पर पड़ता, तो मुझे अपनी देह किसी पराई वस्तु जैसी लगती। पर मन भीतर से इतना स्वच्छ और दर्पण जैसा निर्मल हो चुका था कि उसमें भविष्य का हर निर्णय बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा था। ईश्वर के चरणों में स्वयं को सौंप देने के बाद अब इस नश्वर संसार में मेरा केवल एक अंतिम सांसारिक कर्तव्य शेष था—मेरे जीवन भर की गाढ़ी कमाई, मेरी अंतिम जमा-पूँजी का न्यायपूर्ण निस्तारण।
रेलवे से मिले फंड के जो बचे हुए फिक्स्ड डिपॉजिट थे, मेरी वह पुश्तैनी बंजर ज़मीन जिसे मैंने महाजन के कर्ज़ से छुड़ाया था और जो अब शहर के विस्तार के चलते बेशकीमती हो चुकी थी, और हर महीने की संचित पेंशन की अंतिम पाई—यह सब कुछ बैंक के खातों और सरकारी स्टांप पत्रों पर दर्ज था।
एक दिन दोपहर को, जब घर में सब शांत थे, मैंने विजय से कहा कि वह एक वकील और नोटरी को घर बुला लाए।
विजय चौंक गया। उसके चेहरे पर घबराहट तैर गई, "बाबूजी, वकील किसलिए? आपकी तबीयत तो ठीक है न? किसी कागज़ की क्या ज़रूरत आ पड़ी?"
मैंने उसके कंधे पर अपनी दुर्बल, कंपकपाती हथेली रखी। "विजय, जो यात्रा सामने दिख रही हो, उसकी तैयारी समय रहते कर लेनी चाहिए। मुसाफिर को अपना सामान समेटकर ही स्टेशन की बेंच पर बैठना चाहिए। तू बस वकील को बुला ला।"
शाम को जब खाकी बस्ते वाला बूढ़ा वकील अपनी फाइलें लेकर कमरे में दाखिल हुआ, तो घर का माहौल एक बार फिर खिंच गया।
खबर बिजली की तरह बड़े बेटे आनंद तक भी पहुँच चुकी थी। वह वर्षों बाद अपनी पत्नी के साथ उस चौखट पर आया था। उसके चेहरे पर वही पुरानी घबराहट और अनकहा लालच था। दोनों बहुएँ दालान के पर्दे के पीछे सांस साधे खड़ी थीं। चारों तरफ वही पुराना, दमघोंटू खिंचाव था—वसीयत का खिंचाव। सबको लग रहा था कि बूढ़ा अब अपनी अंतिम घड़ी में बेटों के नाम अपनी मिल्कियत की लकीरें खींचेगा।
कमरे की मेज़ पर कानूनी स्टांप पेपर बिछाए गए। वकील ने अपना चश्मा ठीक किया और कलम उठाकर मेरी ओर देखा, "हाँ बाबूजी, बताइए। आपकी चल-अचल संपत्ति, बैंक खाते, फिक्स्ड डिपॉजिट और गाँव वाली ज़मीन के हकदार कौन-कौन होंगे? दोनों बेटों में किस अनुपात में बँटवारा दर्ज करना है?"
कमरे में सुई गिरने जितना सन्नाटा था।
आनंद की आँखें मेज़ पर गड़ी थीं, विजय हाथ बाँधे एक कोने में सिर झुकाए खड़ा था।
मैंने अपनी नज़रें घुमाईं। कमरे के दरवाज़े पर चारों बच्चे खड़े थे—बड़ी पोती आरोही, छोटी आशी, नाती कबीर और नातिन मायरा। वे चारों अपनी बड़ी-बड़ी मासूम आँखों से मुझे देख रहे थे। उन्हें इस बात की ज़रा भी समझ नहीं थी कि उस मेज़ पर रखे सफेद और नीले कागज़ों का क्या अर्थ है। आशी के हाथ में वही लाल चूड़ी थी और कबीर अपनी जेब में टूटी हुई रेलगाड़ी का पहिया लिए खड़ा था।
मैंने वकील की तरफ देखा। मेरी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर उसमें हिमालय जैसी अटलता थी।
"वकील साहब, लिखिए।"
मैंने एक गहरी साँस ली।
"मेरी जितनी भी संचित पूँजी है, रेलवे के तमाम बॉन्ड, बैंक के फिक्स्ड डिपॉजिट और गाँव की वह पूरी ज़मीन—उसमें से एक भी पाई, एक भी इंच मिट्टी मेरे दोनों बेटों—आनंद और विजय—को नहीं मिलेगी।"
कमरे में जैसे कोई अदृश्य वज्रपात हुआ। आनंद अपनी जगह से उछल पड़ा, "बाबूजी! यह क्या अन्याय है? हम आपके सगे बेटे हैं!"
बड़ी बहू पर्दे के पीछे से चीख पड़ी, "देखा! हमने तो पहले ही कहा था कि यह सब छोटे बेटे को गुपचुप देने का नाटक है!"
"चुप रहिए!"
मेरी उस एक डाँट में पैंतीस साल के पुराने रेलकर्मी का वह अनुशासन गूँज उठा जिसने पूरे कमरे को स्तब्ध कर दिया। मेरी आँखों की चमक ने आनंद को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
मैंने वकील की ओर रुख किया और बहुत शांत, स्पष्ट शब्दों में अपनी अंतिम वसीयत लिखवाई:
"मेरी कुल संपत्ति, बैंक खाते और ज़मीन की समान उत्तराधिकारी केवल और केवल मेरी दोनों पोतियाँ—आरोही और आशी—तथा मेरी नातिन मायरा होंगी। और नाती कबीर के नाम पर उच्च शिक्षा का एक अलग ट्रस्ट बनेगा। जब तक ये बच्चियाँ इक्कीस वर्ष की वयस्क नहीं हो जातीं, यह पूरी संपत्ति बैंक के संरक्षण में रहेगी। इनके विवाह, इनकी उच्च शिक्षा और इनके स्वाभिमान पर ही यह धन खर्च होगा। मेरे दोनों बेटों या उनकी पत्नियों का इस पर कोई कानूनी अधिकार नहीं होगा।"
वकील के हाथ एक पल के लिए रुके, फिर उसने विस्मय से मुझे देखा। उसने कुछ कहना चाहा, पर मेरे चेहरे के तेज को देखकर वह चुपचाप लिखने लगा।
आनंद का चेहरा राख जैसा सफेद पड़ चुका था। वह थरथराते हुए आगे बढ़ा, "बाबूजी... आपने हमें जीते-जी बेदखल कर दिया? अपनी ही औलाद को पराया कर दिया? हमने आपके लिए क्या नहीं किया..."
"तूने मेरे लिए क्या किया, यह तू उसी दिन बता चुका था आनंद," मैंने उसकी आँखों में देखकर बहुत धीमे स्वर में कहा। उस आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी, केवल एक अंतिम सत्य था। "तूने मुझसे पूछा था कि 'आखिर तुमने मेरे लिए किया ही क्या है?' आज इस बाप ने तुझे तेरे उस सवाल के बोझ से भी आज़ाद कर दिया। मैंने तुझे पढ़ा-लिखाकर अफ़सर बना दिया, तू अपने पैरों पर खड़ा है। तुझे मेरे पसीने के इन चंद रुपयों की दरकार नहीं होनी चाहिए।"
फिर मैंने विजय की ओर देखा, जिसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
"और विजय... तूने मेरी और अपनी माँ की सेवा की। पर अगर आज मैं यह सब तेरे नाम कर दूँगा, तो दुनिया कहेगी कि तेरी सेवा का एक मोल था, तेरी निष्ठा बिकाऊ थी। मैं तेरी सेवा को किसी वसीयत की कालिख से मैला नहीं होने दूँगा बेटा। तूने जो किया, उसका फल ईश्वर तुझे देगा।"
मैंने चारों बच्चों को अपने पास बुलाया। वे चारों आकर मेरी खटिया से चिपक गए।
मैंने अपने कांपते हाथों से आरोही और आशी के नन्हें सिरों को छुआ।
"यह धन उन मासूम रूहों का है, जिन्होंने उस वक्त मेरा हाथ थामा जब मेरी अपनी औलादें मेरी पेंशन के टुकड़े गिन रही थीं। इन्होंने मुझे तब प्यार दिया जब मेरे पास देने के लिए केवल खाँसी और बुढ़ापे के आँसू थे। इन्होंने बिना किसी लालच के मेरी सूनी साँझ को परियों के देश जैसा बना दिया। यह कोई संपत्ति नहीं है, यह एक दादा और नाना का अपनी इन मासूम देवियों को दिया गया अंतिम आशीर्वाद है।"
कागज़ात तैयार हुए।
मैंने अपने कांपते, बूढ़े हाथों से अंतिम पन्ने पर हस्ताक्षर किए—वही हस्ताक्षर जो कभी बनारस यार्ड के रजिस्टरों पर शान से होते थे।
दस्तखत पूरे होते ही मुझे लगा जैसे मेरे सीने से सदियों पुराना एक भारी पहाड़ उतर गया हो। आत्मा इतनी हल्की, इतनी शांत हो गई मानो गंगा की शीतल बयार ने मेरे समूचे अस्तित्व को अपने आगोश में ले लिया हो।
मैंने अपनी आँखें मूँद लीं।
कमरे के भीतर अब कौन रो रहा था, कौन स्तब्ध खड़ा था, मुझे इससे कोई सरोकार नहीं था। मुझे तो केवल अपने भीतर कुसुम की वही पुरानी, जानी-पहचानी चूड़ियों की खनक सुनाई दे रही थी, जो शायद स्वर्ग के द्वार पर खड़ी मुस्कुराते हुए मेरा स्वागत करने के लिए अपनी बाँहें फैलाए मेरा ही इंतज़ार कर रही थी।

अध्याय १२: भारहीन आत्मा, ईश्वरीय अनुग्रह और भक्ति का परम संकल्प

कागज़ात पर हस्ताक्षर की वह अंतिम स्याही जैसे ही सूखी, वकील ने अपनी मुहर लगाई और फाइलों को सहेजकर अपने खाकी बस्ते में रख लिया। मेज़ पर रखे वे कानूनी दस्तावेज अब केवल कागज़ के टुकड़े नहीं थे; वे मेरे अस्सी वर्षों के तप, स्वाभिमान और पुरुषार्थ का वह पवित्र कवच बन चुके थे, जो मेरी चारों मासूम संतानों—आरोही, आशी, मायरा और कबीर—को जीवन भर दुनिया के हर अभाव और संकीर्णता से बचाए रखने वाला था।
वकील के जाने के बाद दालान में एक गहरा, शांत ठहराव उतर आया।
आनंद अपने मुरझाए चेहरे और पराजित कदमों के साथ बिना एक शब्द बोले दरवाज़े से बाहर निकल गया। उस चौखट को पार करते वक्त उसके कंधे झुके हुए थे। मैंने उसकी जाती हुई पीठ को खिड़की से देखा। उस पल मेरे भीतर न कोई तल्खी थी, न ही प्रतिशोध का कोई उल्लास। मुझे बस ऐसा लगा जैसे बरसों से मेरी छाती पर बंधा वह उम्मीदों का आखिरी भारी पत्थर भी अपने आप खिसककर गिर पड़ा हो। मैंने उसे मन ही मन पूर्ण रूप से मुक्त कर दिया था।
विजय सिर झुकाए मेरे पास आया। उसकी आँखों में अब भी पश्चाताप और भावुकता की नमी थी। उसने धीरे से मेरे घुटने छुए। मैंने अपना कांपता हुआ हाथ उसके सिर पर रख दिया।
"जा बेटा, अपने कमरे में जा। अब कोई हिसाब बाकी नहीं रहा। तूने सेवा की, ईश्वर तुझे उसका फल देगा। अब इस बूढ़े बाप की चिंता छोड़ दे।"
जब सब चले गए, तो कमरे में केवल मैं और वे चार मासूम फरिश्ते रह गए।
चारों बच्चे मेरी चारपाई के पास आकर खड़े हो गए। आशी ने मेरी गोद में अपना नन्हा सा सिर टिका दिया और आरोही ने अपने दोनों नन्हे हाथों से मेरी लाठी को थाम लिया। कबीर और मायरा मुस्कुराते हुए मेरी ओर देख रहे थे। उन्हें ज़रा भी भान नहीं था कि उनके इस बूढ़े दादा और नाना ने आज उनके नन्हें कन्धों पर अपने स्वाभिमान की कितनी बड़ी धरोहर सौंप दी है। उनके लिए तो बस यही खुशी बहुत थी कि उनके दादाजी आज मुस्कुरा रहे थे।
मैंने उन चारों के माथों को बारी-बारी से चूमा। उनकी कोमल छुअन ने मेरी जीर्ण-शीर्ण देह में एक नई, सात्विक ऊर्जा भर दी।
"जाओ बच्चों, बाहर धूप में खेलो," मैंने बहुत हौले से कहा। चारों चहकते हुए आँगन की ओर दौड़ पड़े। उनकी पायल और जूतियों की खट-खट जब दालान में गूँजी, तो मुझे लगा जैसे मेरे पूरे अस्तित्व पर गंगाजल की सहस्त्र धाराएं बरस गई हों।
मैं अपनी लाठी के सहारे धीरे-धीरे उठा।
आश्चर्य की बात थी कि पिछले कई महीनों से जो घुटने एक कदम चलने पर भी सुई की तरह चुभते थे, आज उनमें कोई दर्द नहीं था। पसलियों का वह दमघोंटू खिंचाव, जो हर साँस के साथ भारी लगता था, पूरी तरह गायब हो चुका था।
मुझे लगा जैसे मैं शरीर से नहीं, केवल चेतना से चल रहा हूँ। यह वही भारहीनता थी, जिसका अनुभव केवल तब होता है जब मनुष्य संसार के सारे कर्ज़, सारे संबंध और सारी जिम्मेदारियाँ पूरी ईमानदारी से चुकाकर बिल्कुल निष्कलंक हो जाता है।
मैं लाठी टेकते हुए कमरे से बाहर आँगन में आया।
दोपहर की सुनहरी धूप नीम की पत्तियों से छनकर कुसुम के उस तुलसी के चबूतरे पर गिर रही थी। वही तुलसी, जिसके आगे बैठकर कुसुम ने जीवन भर केवल मेरी लंबी उम्र और बच्चों के सुख की मन्नतें माँगी थीं।
मैंने दोनों हाथ जोड़े और आकाश की ओर अपना मुख उठाया। मेरी बूढ़ी, झुर्रियों से भरी आँखों से गर्म आँसुओं की दो अविरल धाराएँ बहकर मेरी सफेद दाढ़ी में समाने लगीं। पर ये आँसू किसी पीड़ा, अभाव या अपमान के नहीं थे; ये आँसू कृतज्ञता के उस अथाह समंदर से रिस रहे थे, जो केवल ईश्वर के सम्मुख पिघलता है।
"हे जगदीश्वर! हे विश्वनाथ!" मेरा कंठ भर आया, पर भीतर से आवाज़ बिल्कुल स्पष्ट थी। "तेरा कोटि-कोटि धन्यवाद! तूने इस अनाथ पर कितनी बड़ी कृपा की। जिस बालक की माँ ढाई साल की उम्र में छिन गई थी, जिसे दुनिया ने बेसहारा समझकर बंजर ज़मीन और कर्ज़ के गड्ढे में धकेल दिया था, तूने उसकी रीढ़ को कभी झुकने नहीं दिया। तूने मुझे इतना सामर्थ्य दिया कि मैं अपने स्वाभिमान को बेचे बिना अपनी संतानों को मुकाम तक पहुँचा सका।"
मैंने झुककर तुलसी के पौधे की गीली मिट्टी को छुआ और अपने माथे से लगा लिया।
"और हे माधव, तेरा सबसे बड़ा उपकार तो यह है कि तूने मेरी जीवन-संध्या में मुझे इन मासूम रूहों का सहारा दिया। तूने मुझे मोह के उस गंदे दलदल से खींचकर बाहर निकाल लिया जहाँ केवल पैसे और पेंशन की सौदेबाज़ी हो रही थी। आज मेरा हर खाता बेबाक हो गया। आज के बाद मेरा इस संसार से कोई लेन-देन शेष नहीं रहा।"
उस क्षण, आँगन की उस मद्धम बयार में मुझे एक परम शांति का स्पर्श मिला।
मैंने अपनी छाती पर हाथ फेरा, जहाँ कुसुम की दी हुई तुलसी की कंठी लटक रही थी। काठ के उन घिसे हुए मोतियों को छूते ही मेरे मन में एक अडिग, हिमालय जैसा अटल संकल्प जन्म ले चुका था।
संसार का खेल समाप्त हो चुका था। गृहस्थी की जो परीक्षा ढाई वर्ष की उम्र से शुरू हुई थी, वह अस्सी वर्ष की इस दहलीज पर आकर अपनी पूर्णता को प्राप्त कर चुकी थी। अब जो भी साँसें इस जर्जर काया में शेष थीं, वे किसी व्यक्ति, किसी रिश्ते या किसी अपेक्षा के लिए नहीं थीं।
अब मेरा सर्वस्व केवल और केवल उस परमपिता परमात्मा के चरणों में समर्पित था।
मैंने मन ही मन संकल्प लिया—अब यह देह केवल ईश्वर का मंदिर होगी। यह जिह्वा अब किसी सांसारिक विवाद या शिकायत का नाम नहीं लेगी, इस पर केवल 'हरे कृष्ण, हरे राम' और महामृत्युंजय की ध्वनि रमेगी। जब तक इस कंठ में प्राणवायु का स्पंदन रहेगा, मेरा मन काशी विश्वनाथ की उस अनंत ज्योति और गंगा की पावन धारा में लीन रहेगा।
सामने आँगन में चारों बच्चे तितलियों की तरह दौड़ रहे थे। उनकी हँसी की खिलखिलाहट तुलसी के पत्तों से टकराकर पूरे घर को महका रही थी।
मैं तख्तपोश पर पद्मासन लगाकर बैठ गया। पीठ बिल्कुल सीधी थी, जैसे किसी योगी की होती है। मैंने अपनी आँखें मूँद लीं। बाहर का सारा कोलाहल थम गया। भीतर केवल एक अनहद नाद गूँजने लगा।
एक अनाथ बालक के रूप में जो यात्रा आंसुओं और संघर्षों की भट्ठी में शुरू हुई थी, वह आज एक स्वाभिमानी पिता और दादा के रूप में, मुक्ति, परम संतोष और अनन्य भगवत-भक्ति के अमृत-कुंड में पहुँचकर धन्य हो चुकी थी।
उपसंहार: जीवन का मर्म
एक इंसान की असली वसीयत बैंक की पासबुक या ज़मीन के कागज़ात नहीं होते; उसकी असली वसीयत वह चरित्र, वह स्वाभिमान और वह निष्कलंक आचरण होता है जो उसने अभावों की भट्ठी में जलकर भी कभी मैला नहीं होने दिया। जब तक अंतर्मन में सत्य और स्वाभिमान की लौ जलती रहती है, दुनिया का कोई भी तूफ़ान मनुष्य की रीढ़ को झुका नहीं सकता।

— समाप्त —

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

गंगा की सौगंध : एक स्वाभिमानी की यात्रा

  गंगा की सौगंध: एक स्वाभिमानी की यात्रा समर्पण   जीवन-संध्या के मौन संतों और कर्मयोगियों के चरणों में प्रथम अर्घ्य: संसार के समस्त कर्मठ पि...