साँझ का सितारा


साँझ का सितारा 

​मेरे दर्द के साँझ का इक सितारा,
बहुत दूर है इस नदी का किनारा।

​भँवर में फँसी है मेरी नाव कब से,
मिलेगा कहाँ मौज को अब सहारा।

​अँधेरों ने ऐसा घेरा है मुझको,
कि चमका नहीं फिर वो उम्मीद-तारा।

​सदाएँ तो मैंने बहुत दीं मगर हाँ,
कभी लौट कर फिर न आया दुबारा।

​हवाओं ने बदला है रुख़ इस तरह से,
कि दिखाता नहीं कोई अब तो इशारा।

​किस्मत की राहों में चलते ही चलते,
हुआ ख़ुद से ही दिल ये मेरा अवारा।

​बिना तेरे ऐ ज़िंदगी अब तो हमदम,
है मुमकिन नहीं एक पल भी गुज़ारा।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

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