साकेत की वेदना

साकेत की वेदना 

​शून्य क्षितिज पर सिमट रही है, आज मिलन की वह मधुर-रात,
बिछड़न के इस मरु-झंझा में, काँपती है साँसों की पाँत।
उमड़ रहा आँखों में सावन, हिय में सुलग रहा साकेत.
अमिट वेदना के नीरव में, विरह दे रहा अगणित प्रपात ।
चेतन की यह विकल रागिनी, शून्य गगन में मौन है आज,
पूछ रही इस मूक विरह में, पुकारे किसको मेरा साज।

याद आ रहा वह स्वर्णिम पल, जब प्राणों में स्पंदन जागा,
प्रकृति के आलिंगन में जब, बँधा चेतना का नव धागा।
मलयज-पवन सुगंधित छूकर, कह रही थी जब कथा अनन्त,
पर निठुर नियति के हाथों में, पल भर था वह सपन अभागा।
टूट गये झंकार हृदय के, बिखरे सुर वीणा के सारे,
अब आँसू के इन मोती में, अलंकार जीवन के हारे।
तुम तो दूर गगन के तारे, मैं साकेत की विकल पुकार,
बीच विरह का सिंधु बह रहा, कैसे आऊँ वहाँ उस पार।
पलकों के सूने कोनों में, बैठी है इक मूक प्रतीक्षा,
चुपके-चुपके सिसक रहा है, इस उर का अपरिमित संसार।
इस निष्ठुर जीवन का मेरे, यह पीड़ा ही अब तो धन है,
मिलन गँवाकर जो पाया है, वही विरह अब अंतर्मन है।
सजल नयन, यह विकल चेतना, महाशून्य में खोई-खोई,
जैसे दीप-शिखा अलसाकर, अपनी ही छाया में सोई।
लो अंतस का राग सौंपकर, सब मौन विसर्जन करता हूँ,
तुम खुश रहना अपने नभ में, चाहे यहाँ बहे दृग-लोई।
यह विछोह ही चरम मिलन है, सब तार-तार अब टूट रहा,
साँस विदा की बेला में भी, अब सभी सहारा छूट रहा।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

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