जग से बस आभार चाहा

 जग से बस आभार चाहा

बस यही अपराध है कि जग से बस आभार चाहा,
भूल थी मेरी कि जग से बस घड़ी भर प्यार चाहा।

दे सकी ना मौन साँसें दर्द को अपनी जुबानी,
चाह कर भी लिख सके ना दर्द की कोई कहानी।
जो कहे थे शब्द दिल के भीड़ में सब खो चुके थे,
जो लिखे थे गीत मिलकर कोर उनको धो चुके थे।

छंद भूले गीत से जब इक तनिक आभार चाहा।
बस यही अपराध है कि..........।

उस गीत का अस्तित्व नहीं जो हृदय न जोड़ पाया,
वो किनारे व्यर्थ सारे लहरों को न मोड़ पाया।
मँझधार में थी नाव जब पतवार छूटी हाथ से,
जब लड़खड़ाये बीच निकले सब झूठ जो भी साथ थे।

बीच धारे में लहर के इक तनिक आधार चाहा।
बस यही अपराध है कि..........।

कौन किसका है जगत में हैं सबके अपने रास्ते,
चल रहे हैं सब जगत में बस अपने-अपने वास्ते।
रात के अंतिम प्रहर का चाँद मद्धम हो रहा है,
बादलों की गोद में इक मौन तारा रो रहा है।

रात के अंतिम प्रहर में नेह का अधिकार चाहा।
बस यही अपराध है कि..........।

हूँ खिलौना इस जगत का या कहो निर्लिप्त साकी,
चुक गया हूँ मैं कहीं या साँस है कुछ और बाकी।
मानकर जिसको यहाँ हर दर्द अपना कह सुनाया,
उसने ही हर मोड़ पर मुझको बस नीचा दिखाया।

टूटकर भी मुस्कुराने का तनिक अधिकार चाहा,
बस यही अपराध है कि जग से बस आभार चाहा।

अब न कोई आस मुझको अब नहीं कोई गिला है,
जो मिला इस राह मुझको अब वही मेरा सिला है।
मैंने काँटों को भी हँस भाग्य का श्रृंगार माना,
हार को स्वीकार करके जीत का आधार जाना।

अंत में बस सत्य का ही एक क्षण दीदार चाहा,
बस यही अपराध है कि जग से बस आभार चाहा।

जो दिया जग को वही फिर लौट मेरे पास आया,
दर्द था तो दर्द पाया प्रेम था तो प्रेम पाया।
अब न कोई माँग बाकी अब न कोई भार बाकी,
शब्द मेरे मौन होकर भी कहेंगे बात बाकी।

मौन से पहले ज़रा-सा प्रेम का उपहार चाहा,
बस यही अपराध है कि जग से बस आभार चाहा।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 



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