जाने कैसा है मिलन

जाने कैसा है मिलन

धुँधलके में साँझ के आस मद्धम पल रही है,
मौन हैं हम तुम मगर आँख कुछ-कुछ कह रही है।
इन मचलती कामनाओं में छुपी कुछ तो चुभन,
अपना कैसा है मिलन जाने कैसा है मिलन।

मौन हम दोनों यहाँ, पर साँस कुछ तो कह रही,
छू के आँचल को तेरे पौन मद्धिम बह रही।
जब पवन का गीत मद्धम डर रहा क्यूँ आज मन,
अपना कैसा है मिलन जाने कैसा है मिलन।

चाँद के अपने सफर पर रात का क्या जोर है,
जल रही जब दीपिका फिर क्यूँ हृदय में शोर है।
जब खिला उपवन हृदय का मौन फिर क्यूँ मन सुमन,
अपना कैसा है मिलन जाने कैसा है मिलन।
 
कहीं ऐसा न हो गीत अधूरे फिर रह जाएं,
ठहरो न जरा सा आज कि दूरी कम हो जाएं।
है अधरों को स्वीकार काँपता पर अंतर्मन,
अपना कैसा है मिलन जाने कैसा है मिलन।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
       10 जून, 2024

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