हे शिव शंभू देवाधिदेव काशी विश्वेश्वर स्वामी

हे शिव शंभू देवाधिदेव काशी विश्वेश्वर स्वामी

हे शिव शंभू देवाधिदेव काशी विश्वेश्वर स्वामी,
दीनबंधु करुणा के सागर, अंतर्यामी निष्कामी।
भाल विराजे अर्धचंद्रमा, शीश बहे सुरसरि धारा,
नीलकंठ त्रिशूलधारी प्रभु, त्रिभुवन के रखवारा।

हे शिव शंभू देवाधिदेव काशी विश्वेश्वर स्वामी।

अंग विभूति रमी मनोहर, गल रुद्राक्ष की माला,
डमरू की डम-डम धुन सुनकर सकल जगत मतवाला।
बाघम्बर परिधान प्रभु का, रूप अलौकिक भारी,
शरणागत के काज सँवारे, संकट-मोचन हारी।

हे शिव शंभू देवाधिदेव काशी विश्वेश्वर स्वामी।

कालकूट विष कंठ धरा जब, त्राहि-त्राहि मिटाई,
देव, दनुज सब हाथ जोड़कर महिमा प्रभु की गाई।
गौरी संग विराजे नंदी, सोहे रूप अनूपा,
तुम ही सृष्टि के रचयिता, महाप्रलय के रूपा।

हे शिव शंभू देवाधिदेव काशी विश्वेश्वर स्वामी।

नहिं कोई पाखंड सुहावे, केवल भाव के भूखे,
जल की बूँद चढ़ावे कोई, प्रभु बेलपत्र से रीझे।
चरण-शरण जो आन पड़े अब, सब संशय हर लीजे,
भक्ति, ज्ञान, वैराग्य का पावन अमृत, हे प्रभु दीजे।

हे शिव शंभू देवाधिदेव काशी विश्वेश्वर स्वामी,
दीनबंधु करुणा के सागर, अंतर्यामी निष्कामी।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

हे शिव शंभू देवाधिदेव काशी विश्वेश्वर स्वामी

हे शिव शंभू देवाधिदेव काशी विश्वेश्वर स्वामी हे शिव शंभू देवाधिदेव काशी विश्वेश्वर स्वामी, दीनबंधु करुणा के सागर, अंतर्यामी निष्कामी। भाल वि...