प्यार उतरते देखा है

प्यार उतरते देखा है 

प्रिये तुम्हारे इन नयनों में चाँद उतरते देखा है,
सूने मन के गलियारों में प्यार उतरते देखा है।

संध्या के इन मुखर पलों में मधुर चाँदनी डोल रही,
सुर्ख अधर पर मधुमासों के रंग मचलकर घोल रही।
मंद पवन के झोंकों में भी गंध बसी पुरवाई की,
जैसे भूली सरगम लौटी तान लिए शहनाई की।

नयनों के खिलते सावन में स्वप्न सँवरते देखा है 
सूने मन के गलियारों में प्यार उतरते देखा है।
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काले केशों की छाया में रैन सुहानी ढलती है,
तेरी बातों की सरगम से साँसों की लय चलती है।
पलक झुकें तो लाज भरे इस मौसम में ठहराव मिले,
अधरों पर मुस्कान खिले तो जीवन को मधुमास मिले।

कदम जहाँ भी पड़े तुम्हारे, फूल बिखरते देखा है,
सूने मन के गलियारों में प्यार उतरते देखा है।
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चाँद-सितारे मौन खड़े हैं, रात ठिठककर सुनती है,
अपने मूक मिलन के किस्से हवा चुराकर बुनती है।
एक तुम्हारा साथ मिले तो हर पतझड़ भी फाग बने,
हाथों में जो हाथ तुम्हारा, हर धड़कन अनुराग बने।

तेरी पावन प्रीति नगर में भाग्य सँवरते देखा है,
सूने मन के गलियारों में प्यार उतरते देखा है।
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तुम जो मेरे साथ चलो तो राह नई भी खिल जाये,
सूखी-सूखी सी साँसों को मधुर रागिनी मिल जाये।
तुम हो तो हर टीस पुरानी मधुर तराने गाती है,
मूक व्यथा भी तेरे छूते अमर कथा बन जाती है।

तेरे होने से साँसों का अर्थ निखरते देखा है,
सूने मन के गलियारों में प्यार उतरते देखा है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

मन की बात

मन की बात 

आँखों ने रंगीन स्वप्न के धागों की जो रेख बनाई,
अंगारों ने उसी स्वप्न को आकर के हर बार जलाया।

बहकी हुई दिशायें सारी बहके हुए भाव अंतस के, 
बहके हुए शब्द के सागर बहके हुए आह अंतस के।
टूटे शब्द, कोष खड़हर हैं आज व्याकरण मौन खड़ा है,
भावों की नदिया के तीरे शुचिता का तन मौन पड़ा है।

नैतिकता के मूल्य सँवर कर जब भी मन को राह दिखाई,
अंगारों ने उसी मूल्य को आकर के हर बार जलाया।

मन के ज्वार निकलने को हों जब आतुर यहाँ हवाओं में,
मूल्य बिखर कर पड़े हुए थे तब दरकी हुई शिलाओं पे।
ओछी नजरों के कोरों से जब-जब इतिहास दिखाते हैं, 
शतरंजी प्यादों के जैसे हर पन्ने पीटे जाते हैं।

इतिहासों ने जहाँ पृष्ठ पे सच्चाई की मुहर लगाई,
अंगारों ने उसी पृष्ठ को आकर के हर बार जलाया।

लिखने को तो शब्द बहुत हैं लेकिन उनका मोल नहीं है,
बहरे नक्कारे खानों में तूती अब तो मौन हुई है।
प्रश्न स्वयं ही प्रश्न बनें हैं उत्तर के आसार नहीं हैं,
पलकों के सूखे कोरों को आँसू भी अधिकार नहीं है।

आहों ने जब कभी गीत में परिवर्तन की ज्योत जलाई,
अंगारों ने उसी ज्योत को आकर के हर बार बुझाया।

टूटे सपनों की राखों से फिर से कोई दीप जलाऊँ,
सच के स्वर को मौन दिशा दे अंगारों को गीत सुनाऊँ।
टूटी सारी उम्मीदों को साहस का श्रृंगार सजाऊँ,
कुरू वंश के दरबारों में गीता अब हर बार सुनाऊँ।

अँधियारे के सीने पे जब सच का इक सूरज चमकाया,
अंगारों ने उसी सूर्य के सम्मुख अपना शीश झुकाया।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 




प्यार उतरते देखा है

प्यार उतरते देखा है  प्रिये तुम्हारे इन नयनों में चाँद उतरते देखा है, सूने मन के गलियारों में प्यार उतरते देखा है। संध्या के इन मुखर पलों मे...