मन की बात
अंगारों ने उसी स्वप्न को आकर के हर बार जलाया।
बहकी हुई दिशायें सारी बहके हुए भाव अंतस के,
बहके हुए शब्द के सागर बहके हुए आह अंतस के।
टूटे शब्द, कोष खड़हर हैं आज व्याकरण मौन खड़ा है,
भावों की नदिया के तीरे शुचिता का तन मौन पड़ा है।
नैतिकता के मूल्य सँवर कर जब भी मन को राह दिखाई,
अंगारों ने उसी मूल्य को आकर के हर बार जलाया।
मन के ज्वार निकलने को हों जब आतुर यहाँ हवाओं में,
मूल्य बिखर कर पड़े हुए थे तब दरकी हुई शिलाओं पे।
ओछी नजरों के कोरों से जब-जब इतिहास दिखाते हैं,
शतरंजी प्यादों के जैसे हर पन्ने पीटे जाते हैं।
इतिहासों ने जहाँ पृष्ठ पे सच्चाई की मुहर लगाई,
अंगारों ने उसी पृष्ठ को आकर के हर बार जलाया।
लिखने को तो शब्द बहुत हैं लेकिन उनका मोल नहीं है,
बहरे नक्कारे खानों में तूती अब तो मौन हुई है।
प्रश्न स्वयं ही प्रश्न बनें हैं उत्तर के आसार नहीं हैं,
पलकों के सूखे कोरों को आँसू भी अधिकार नहीं है।
आहों ने जब कभी गीत में परिवर्तन की ज्योत जलाई,
अंगारों ने उसी ज्योत को आकर के हर बार बुझाया।
टूटे सपनों की राखों से फिर से कोई दीप जलाऊँ,
सच के स्वर को मौन दिशा दे अंगारों को गीत सुनाऊँ।
टूटी सारी उम्मीदों को साहस का श्रृंगार सजाऊँ,
कुरू वंश के दरबारों में गीता का संदेश सुनाऊँ।
अँधियारे के सीने पे जब सच का इक सूरज चमकाया,
अंगारों ने उसी सूर्य के सम्मुख अपना शीश झुकाया।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें