प्रतीक्षा
भीतर प्यास मरुस्थल जैसी, बाहर विरह की अमिट दहाड़।
पलकों की चौखट पर आकर, इक ज्योति आस की ठहरी है,
युगों-युगों तक राह तकी है, प्रतीक्षा बहुत ये गहरी है।
कितने मौसम बीत गए हैं, कितनी ही ऋतुयें बदली हैं,
अनगिन बार हवा ने पूछा, क्यूँ साँसे अब भी पगली हैं।
सूख गए हैं फूल मिलन के, ये सावन अब बस पत्थर है,
तुम बिन मेरा अन्तर्मन भी, बस सूना-सूना अंबर है।
अंतर्मन के किसी कोर में, कुछ आहें अब भी ठहरी हैं,
युगों-युगों तक राह तकी है, प्रतीक्षा बहुत ये गहरी है।
टूट रही है संयम सीमा, थकी-थकी दिल की धड़कन है,
तपकर कुंदन जैसा महका, विरह-अग्नि में अब ये तन है।
आ जाओ के नैन तक रहे, मधुर मिलन की आस सजाये,
चौखट पर साँसे ठहरी हैं, अंतिम इक विश्वास जगाये।
गीत अधूरे अधरों पर हैं, कोरों में आहें ठहरी हैं,
युगों-युगों तक राह तकी है, प्रतीक्षा बहुत ये गहरी है।
शब्द मौन हैं, शून्य हृदय है, जर्जर मेरे मन की वाणी,
अब तो केवल शेष यहाँ पर, आँसू की कुछ मौन कहानी।
अब नहीं चाहिये मोक्ष मुझे, तुम बस इक बार चले आओ,
सूखे मेरे मन उपवन में, बनकर बसंत खिल-खिल जाओ।
सपनों की इक हल्की डोरी, पलकों पर अब भी ठहरी है,
युगों-युगों तक राह तकी है, प्रतीक्षा बहुत ये गहरी है।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें