॥ श्रीगीता (अवधी चौपाई) ॥
🌿 मंगलाचरण (दोहा)
वंदन करउँ सो सत्य ही, जेहि जग के आधार कृष्ण वचन गीता बनहिं, जीवन के विस्तार॥
धर्मभूमि मँह जब उठे, संशय के अति धूल। तब प्रकटे गीता सुधा, हरै हिये के शूल॥
🌸 प्रस्तावना (चौपाई)
जब-जब जीवन रण बनि जाई। मन उलझे जब मोह सहाई॥ होहिं परस्पर द्वंद्व अपारा। नयन भरहिं जब नीर की धारा॥ धर्म पुकारे सत के राहा। ममता बाँधे मन के चाहा॥ तब गीता कर दीप जलावे। मोह-तमस को दूर भगावे॥
कुरुक्षेत्र नहिं केवल भूमी। मानुष तन मँह द्वंद्व अहूमी॥ भीतर चलत निरंतर युद्धा। आत्मा दर्पण करहिं विशुद्धा॥ इक तो मोह-पाश दुखदाई। दूजी मन में कठिन लड़ाई॥ स्वार्थ जाल इक ओर पसारा। दूजे सत्य-दुआर पियारा॥
पार्थ रूप सब जीव खड़ा है। संशय के अँधियार पड़ा है॥ नाते-रिश्ते बंधन भारी। व्याकुल मन गलियारे भारी॥ तब माधव कर गूँजे बानी। अमृत धार बहे जिमि जानी॥ चेतन सुरुज उगे तब नीका। मिटे तमस जो हृदय सतीका॥
🌸 ज्ञान संदेश (चौपाई)
आतम अजर अमर अविनासी। मरत न जनमत यह सुखरासी॥ जैसे नर तज वस्त्र पुराना। देह बदलत त्यों जानु सयाना॥ दुख-सुख लाभ-हानि सब माया। आवत जावत जैसे छाया॥ समता भाव धरे मन माँही। सत्य लखत सोई जन-माँही॥
धरम हेतु तुम कर्म कराऊ। फल की चिंता दूर बहाऊ॥ करहु समर्पण हरि के चरणा। तजहु मान प्रभु की बस शरणा॥ ज्ञान-दीप अज्ञान नसावे। भक्ति-प्रेम अनुराग बढ़ावे॥ कर्मयोग के पथ पर धाये। सफल जनम सोई नर पावे॥
🌸 गीता महत्त्व (चौपाई)
गीता शास्त्र मात्र नहिं जानहु। जीवन तत्व सार पहिचानहु॥ मानुष के अंतस कर बाता। भाव-विस्तार सकल सुखदाता॥ पढ़ने वाले पावत पंथा। कर्मयोग कर आधार यह ग्रंथा॥ ज्ञानी भक्त और जे योगी। पावत दिव्य प्रकास निरोगी॥
अमर ज्ञान युग-युग हरसावा। संकट मँह जो राह दिखावा॥ जाके मन मँह गीता बसिहें। सोई सत्य पथ सहजहिं गहिहें॥ जो गीता जिय मँह उपजावे। भय से मुक्त परम सुख पावे॥ आतम से परमात्मा ताईं। पावहिं पंथ कवनु कठिनाई॥
🌼 समापन (दोहा)
गीता जाके मन बसे, मिटे सकल जंजाल। भक्ति ज्ञान अरु कर्म से, जीवन हो खुशहाल॥
शांति समर्पण त्याग मँह, बसे मान कल्यान। गीता कर संदेस यह, जग हित अमृत दान॥
॥ श्रीमद्भगवद्गीता: प्रथम अध्याय (सरल हिंदी सार) ॥
युद्ध की शुरुआत (धृतराष्ट्र का प्रश्न):
धर्म भूमि कुरुक्षेत्र मँझारी। जुटे युद्ध सब वीर विचारी॥ धृतराष्ट्र पूँछि संजय बाता। पांडु पुत्र क्या करते ताता॥ धृतराष्ट्र पुनहि संजय पूछा। रण भूमी महँ का विधि सूझा॥ मम सुत पांडु पुत्र मिलि भाई। करत युद्ध का नीति बनाई॥ संजय बोले धीरज धारी। पांडव सैन्य खड़ी है भारी॥
दुर्योधन का अभिमान और सेना वर्णन:
देखि पांडवहिं सैन्य विशाला। दुर्योधन तब भयू बिहाला॥ देखि सैन्य व्याकुल चित भयऊ। दुर्योधन समीप गुरु गयऊ॥ गुरु द्रोण पहिं जाइ सुनाई। भीष्म रक्षित सेना दिखाई॥ द्रोण! देखिये पाण्डव सेना। सजी खड़ी जो बुद्धि प्रवीणा॥ भीम, अर्जुन अरु वीर विराट। द्रुपद खड़ा ज्यों महा सम्राट॥ चेकितान, काशिनरेश बली। कुन्तिभोज अरु वीर अति भली॥
कौरव दल के योद्धा:
अपने भी योद्धा सुन लीजै। नायक नाम ध्यान अब दीजै॥ गंगा सुत भीषण रणधीरा। जिमि सागर अति गहर गभीरा॥ इहा(इच्छा)मृत्यु वरदान सुहावा। कालहु देखि देखि डरि जावा॥ द्रोण चतुर धनु विद्या धारी। शस्त्र अस्त्र के ज्ञाता भारी॥ पाण्डव कौरव गुरु कहलाए। अद्भुत कौशल रण में लाए॥ सूर्य पुत्र कर्ण महादानी। समर वीर सम कोउ न ज्ञानी॥ कंचुक(कवच) कुंडल सोभा पावा। रिपु दल देखि देखि थर्रावा॥ दुर्योधन अभिमान बढ़ावहिं। अनीति पथ पर पैर बढ़ावहिं॥ दुःशासन बल बुद्धि विहीना। कुल कलंक दुख साहस कीना॥ अश्वत्थामा काल समाना। शिव अंसा अति महा बवाना॥ अमर वीर नहिं मृत्यु डराई। भीषण अस्त्र काल सम आई॥
पांडव योद्धा वर्णन
धर्म राज अति धीर सुजाना। सत्य वचन जिन्ह के प्रवाना॥ यम के अंश शांत मति धारी। नीति निपुण सब जग हितकारी॥ पवनसुत भीम महबलवंता। गदा युद्ध महँ कोउ न अंता॥ दस सहस्र गज शक्ति शरीरा। रिपु दल दलन वीर रणधीरा॥ पार्थ धनुष गांडीव सँभारे। कपि ध्वज रथ पर प्रभु पगु धारे॥ सव्यसाचि अस्त्रन के ज्ञाता। महाबाहु जय विजय विधाता॥ नकुल रूप अति सुंदर सोहे। अश्व विधा लखि मुनि मन मोहे॥ सहदेव सुज त्रिकाल विचारी। ज्योतिष विद्या निपुण अपारी॥ सुभद्र सुत अति वीर किशोरा। चक्रव्यूह महुँ कीन्ह मरोरा॥ अल्प आयु यश कीर्ति कमाई। समर भूमि अद्भुत गति पाई॥
शंखों की गूँज:
भीष्म पितामह शंख बजाया। सिंह नाद सम गगन गुँजाया॥ फिर माधव ने शंख बजाया। अर्जुन ने भी स्वर फैलाया॥ पाञ्चजन्य गूँजा देवदत्त। गूँज उठा युद्ध क्षेत्र प्रमत्त॥ काँप उठे सुन रिपु के तन मन। गूँज उठी धरती और गगन॥
अर्जुन का मोह और विषाद:
कपि ध्वज रथ पर पार्थ विराजे। अच्युत! से तब विनती साजे॥ दोनों सेना बीच खड़ाऊँ। अपने जन के देखन चाहूँ॥ देखि स्वजन अर्जुन मन मोहा। हृदय शोक उपजा अति छोहा॥ सब अपने हन कर क्या पाऊँ। राज्य भोग तजि वन को जाऊँ ॥ काँपत अंग नैन भरि बारी। गांडीव नाहि जात सँभारी॥
अर्जुन का विलाप:
केशव! अंग शिथिल हैं सारे। मुख सूखा, सब धीरज हारे॥ अपनों को किस कारन मारूँ। ऐसा राज्य नहीं मैं चाहूँ।। गुरु, पितामह, पुत्र अरु सखा। इन पर कैसे उठाऊँ शखा॥ कुल का नाश अधर्म बढ़ावे। कुल यश कीर्ति नरक में जावे॥
त्याग और शोक:
कुल के नास अधर्म पसारा। धर्म लोप होइहिं संसारा॥ कुल के नाशे धर्म नशाहीं। नारि दूषित नरक महुँ जाहीं॥ पितर गिरहिं अरु वंश विनासा। नरक वास कर होत तमासा॥ पाप लगे हमका प्रभु भारी। बंधु मारि का होय सुखारी॥ मारहिं भल सब हमका आके। कैसे शस्त्र उठाऊँ जाके॥ कहिके अर्जुन रथ पर बैठा। शोक मग्न हो मन में ऐंठा॥ धनुष बाण सब नीचे डाले। आँखों में आँसू भर पाले॥ अश्रु भरत नयनन अस भारी। बैठ्यु पार्थ धनुष तजि डारी॥ कायरता वश बुद्धि भुलानी। का श्रेयस्कर कहहु बखानी॥ शिष्य भाव प्रभु शरण तिहारी। संशय हरहु कृष्ण बनवारी॥
बिहँसि मंद प्रभु बचन उचारे। सुनु अर्जुन तुम मोह पधारे ॥
पण्डित जैसी बात बनाओ। मृतक शोक तजि ज्ञान जगाओ ॥
जैसे बालक वृद्ध कहावे। देह बदलती देही गावे ॥
तैसे ही यह तत्व सुजाना। मोह न करई धीर सयाना ॥
आत्मा का बोध (अमरता का ज्ञान)
अविनाशी यह आत्मा जानो। घट-घट व्यापक सत्य बखानो ॥ नयन छिन्दति शस्त्राणि गाई। शस्त्र काटि नहिं सके सखाई ॥ पावक जारि सके नहिं ताही। जल न भिगोवे, पवन सुखाही ॥ जैसे जीर्ण वसन नर त्यागे। नूतन लेइ प्रेम अनुरागे॥ तैसे देह तजत यह देही। नूतन रूप धरत बिनु देही ॥
कर्तव्य का बोध (निष्काम कर्म)
धर्म युद्ध क्षत्रिय सुखकारी। तजे रण होय अपयश भारी ॥ हारे स्वर्ग, जीत महि भोगा। तस्मादुत्तिष्ठ तज सब शोगा ॥
कर्महिं में अधिकार तिहारा। फल की इच्छा तज संसारा ॥ सिधि-असिधि सम कर चित्त धारे। योगयुक्त हो भव-निधि तारे ॥ जो नर राग द्वेष मद त्यागे। आत्म माहिं जो नित अनुरागे ॥ जैसे नदियाँ सागर जाहीं। अचल रहे सागर घबराहीं ॥ तैसे विषय मुनिहिं नहिं डोले। ब्रह्म-शांति सोई मुख बोले ॥ ममता गर्व मोह जो खोवे। परम मोक्ष अधिकारी होवे ॥
॥ दोहा ॥
मोह जनित विषाद तजी, पाय ज्ञान परकाश।कृष्ण चरण शरणागती, भयो भरम का नाश ॥
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॥ श्रीमद्भगवद्गीता: द्वितीय अध्याय
दोहे
मन माहिं।मधुसूदन बोले वचन, मोह-तिमिर मिटि जाहिं।।
ज्ञान-दीप प्रज्वलित कियौ, हृदय पार्थ के कृष्ण।सांख्य योग सुनावहीं, तजि अधर्म की तृष्ण।।
॥ सांख्य योग सार - चौपाई ॥
अर्जुन की व्याकुलता और शरणागति:
देखि स्वजन अर्जुन अकुलाने। मोह वश सब अस्त्र गिराने॥ बिहँसि मंद प्रभु बोले बानी। सुनु अर्जुन तुम अति अज्ञानी॥ करुण वचन कहि कृष्ण सुनाये। कायरता तजि रण चित लाये॥ देखि पार्थ कहूँ कृष्ण बुझाई। तजहु मोह यह कुमति सहाई॥ पण्डित जैसी बात उचारो। मृतक शोक तजि हृदय विचारो॥ नीति नहीं यह कायरताई। वीर पुरुष क नहीं सोहाई॥
हिरदय की दुर्बलता त्यागो। उठहु पार्थ! निज कर्म मँ जागो॥ देही नित्य अजर अविनाशी। घट-घट व्यापक पूरन राशी॥ जैसे वस्त्र जीर्ण नर त्यागे। नूतन लेइ प्रेम अनुरागे॥ तैसे देही देह बिहावे। दूजी देह तुरत फिर पावे॥ कि नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणी। पावक जारि सके नहिं प्रानी॥ न मारि सके न पवन सुखावे। जल नहिं कबहुँ भिगोवन पावे॥ मरे वीर जो स्वर्ग सिधारे। जीते मही भोग सुख सारे।। तस्मादुतिष्ठ पार्थ सुजानो। निश्चय युद्ध हेतु मन ठानो।।
नहिं अस समय कि मैं नहिं रहऊँ। तुम व भूप न रहहु जो कहऊँ॥ जैसे देह अवस्था पावे। बाल, युवा अरु वृद्ध कहावे॥ तैसे देही देह विहावे। धीर पुरुष जो मोह न पावे॥शीत, उष्ण, दुख, सुख जो होई। इन्द्रिय जनित अनित है सोई॥ जो नर सम दुख-सुख फल जाने। व्याकुल होय न सत्य पिछाने॥ अमृत पद सो पावन हारा। कटे मोह का सब अँधियारा॥
असत वस्तु के अस्तितु नाहीं। सत्य सदा व्यापक जग माहीं॥ अविनाशी जो सब में व्यापा। मिटे नहीं हो कोउ प्रतापा॥ स्वधर्म देखि न कबहुँ डराना। धरम पथ नहीं कोउ समाना ॥ खुलै स्वर्ग के द्वार अपारा। भाग्यवान पावे रण भारा॥ जौ नहिं करिहौ युद्ध विचारी। पाप लगै अरु कीर्ति बिगारी॥ मरे स्वर्ग, जीते महि भोगा। अब उठि वीर तजहु सब शोगा॥
अचल सनातन अव्यय जानो। सत्य तत्त्व यह हृदय बखानो॥ क्षत्रिय धर्म युद्ध सुखकारी। तजि रण होइ अपयश भारी॥ कर्म किये जा फल तजि प्यारे। जीत हार सम करि चित धारे॥ स्वत्व तिहारा कर्महिं माही। फल की इच्छा राखहु नाही॥ |
अर्जुन उवाच विनय सों भाई। केशव! मोहे देहु सुनाई॥ स्थितप्रज्ञ के लक्षण केते। समाधिस्थ पुरुष हैं जेते॥ का भाषा तिन्ह की जग माहीं। स्थिर बुद्धि कहिये जेहि ताहीं॥ कैसा वचन सो पुरुष उचारे। लक्षण मोहिं बतावहु सारे॥ किमि भाषेत पुरुष सो होई। धीर गंभीर शब्द कह सोई॥ कैसे बोलत जगत मझारी। संशय मेटहु कृष्ण मुरारी॥
(अर्थात विपरीत परिस्थितियों में वह अपनी वाणी पर कैसे नियंत्रण रखता है?)
(सांसारिक विषयों के बीच वह स्वयं को कैसे थामकर रखता है?) किमासीत कहहु भगवाना। कैसे बैठत पुरुष सुजाना॥ स्थिर चित्त किमि आसन लावै। मन के भटकावहिं रुकवावै॥ व्रजेत किम् प्रभु मोहे बतावो। चलन ढाल तिन्ह की समझावो॥ विषय मध्य किमि विचरत सोई। निर्विकार जन कैसे होई॥
(इस मायारूपी संसार में वह व्यवहार कैसे करता है?)
श्री भगवान उवाच
कर्महिं में अधिकार तिहारा। फल की इच्छा तजु संसारा ॥ फल हेतू जनि कर्म कमाओ। तजि अकर्म आसक्ति मिटाओ ॥ सिधि-असिधि सम करि चित्त राखो। योगयुक्त रस निशदिन चाखो ॥ जय अरु हारि समान हि जानो। विचलित होय न मनहिं बखानो ॥ बुद्धि योग अति श्रेष्ठ कहावे। फल की तृष्णा दुख उपजावे ॥ कर्मज फल जो नर तजि देई। जन्म बंध छूटे सुख लेई ॥ अर्पण करि प्रभु पद सब कर्मा। सोई जानत असली धर्मा ॥ ममता गर्व मोह सब त्यागे। परम शांति सोई अनुरागे ॥ जब मन काम सकल तजि देई। आत्म माहिं संतुष्ट सुहेई॥ स्थितप्रज्ञ सोई मुनि जानो। दुख-सुख राग-द्वेष सम मानो॥
इन्द्रिय संयम जो जन पावे। ताकी मन में स्थिरता आवे॥ विषय विलास आसक्ति उपजे। काम क्रोध विवेक जहाँ भजे॥ जो नर ममता, गर्व विहावे। शांति परम सोई नर पावे॥ एहि स्थिति जेहिं अंतहु पावे। मन निर्वाण मोक्ष सो पावे॥ फल इच्छा नहिं कर्म कमाओ। तजि अकर्म आसक्ति मिटाओ ॥ सुख की चाह नहिं जेहि माहीं। दुख आये ते विचलित नाहीं।। राग, क्रोध अरु भय जो त्यागे। मुनि स्थिर प्रज्ञा सोई जागे॥ प्रिय-अप्रिय कछु जो भी पावै। हर्ष-शोक नहिं मुख सों लावै॥
जैसे कछुआ अंग समेटे। तैसे मुनि विषयन को मेटे॥ इन्द्रिय द्वार बंद जो राखे। रसना स्वाद कभी नहिं चाखे॥ बाहर विषय भले ही आवें। स्थिर चित्त तनिक न डोलावें॥ राग-द्वेष सों रहित विचारी। विचरत विषय मध्य संसारी॥ इन्द्रिय वश में जेहि के होई। शांति परम पद पावत सोई॥ प्रसाद (कृपा) मिलत दुख सब मिट जाहीं। बुद्धि स्थिर प्रभु चरणन माहीं॥ बुद्धि योग अति श्रेष्ठ कहावे। फल की तृष्णा दुख उपजावे ॥ कर्मज फल जो नर तजि देई। जन्म बंध छूटे सुख लेई ॥ अर्पण करि प्रभु पद सब कर्मा। सोई जानत असली धर्मा ॥ ममता गर्व मोह सब त्यागे। परम शांति सोई अनुरागे ॥ जैसे नदियाँ सागर माहीं। मिलत जाहिं पर क्षोभ कराहीं॥ सागर तनिक न मर्यादा तोड़े। तैसे मुनि नहिं धीरज छोड़े॥
॥ दोहा ॥ कर्तापन का मद तजहु, करि निज धर्म विचार।कृष्ण चरण चित लाय के, बेड़ा होवत पार ॥
स्थितप्रज्ञ के लक्षण कहि, दीन्हा परम प्रकाश।विषय वासना त्यागि सब, कीन्हा भ्रम का नाश।।
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अध्याय 3 कर्मयोग
दोहा
संशय व्याकुल पार्थ मन, तजे क्षात्र निज धर्म। पूछत केशव सों तदा, श्रेष्ठ ज्ञान के कर्म॥
ज्ञान-कर्म की संधि का, सुलभ पंथ दिखलाय।कर्मयोग की महिमा प्रभु, अर्जुन को समुझाय॥
पार्थ प्रश्न (अर्जुन का संशय):
जौ तुम मानत ज्ञानहिं श्रेष्ठा। तौ क्यों मोहिं जुद्ध महँ चेष्टा॥
घोर कर्म महँ काहे लावत। संशय मोरे मन उपजावत॥
मिले-जुले वच कहहु विधाता। व्याकुल होवत मेरो गाता॥
(भावार्थ: अर्जुन कहते हैं—हे केशव! यदि आप ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो मुझे इस घोर युद्ध (कर्म) में क्यों झोंक रहे हैं? आपकी मिली-जुली बातों से मेरा मन भ्रमित हो रहा है, मुझे कोई एक निश्चित मार्ग बताइए।)
श्रीकृष्ण उत्तर (भगवान का समाधान):
बिहँसि बोले प्रभु सुनु कुरुनंदन। द्विविध निष्ठा जग दुख-भंजन॥
सांख्य योगिहिं ज्ञान सुहावा। कर्म योगिहिं कर्म लुभावा॥
बिनु कर्म सिद्धि न कोऊ पावै। प्रकृति वश सब कर्म कमावै॥
(भावार्थ: भगवान मुस्कुराकर बोले—हे अर्जुन! इस संसार में कल्याण के दो ही मार्ग हैं। ज्ञानियों के लिए 'ज्ञान योग' (सांख्य) और कर्मशीलों के लिए 'कर्म योग'। याद रखो, कर्म का त्याग करने मात्र से कोई सिद्धि नहीं पाता, क्योंकि प्रकृति के गुण हर जीव से निरंतर कर्म करवाते हैं।)
।। शत्रु रूपी काम (इच्छा) का नाश: चौपाई संकलन ।।
अर्जुन पूछत प्रभु समुझावा। पाप करत नर केहि वश आवा॥
अनिच्छा तदपि करै जो पापा। कौन शक्ति दै अति संतापा॥
हँसि बोले प्रभु सुनु रे भाई। काम क्रोध रिपु अति कठिनाई॥
रजोगुण सों उपजत ईहा। महाशत्रु यह जानहु तीहा॥
महापाप और महा-अहारी। काम रूप यह शत्रु भारी॥
अग्नि सम यह तृप्त न होई। ज्ञानहिं ढँकत जानहु सोई॥
जैसे धुँआ आग को ढँकता। दर्पण धूलि सों मलिन दिखता॥
जेहि विधि गर्भ झिल्ली महँ सोहे। काम विवेकहिं तैसे मोहे॥
ज्ञानी का यह नित्य वैरी। काम रूप जो विपदा घेरी॥
इन्द्रिय मन और बुद्धि निवासा। यहाँ बैठि यह करहिं विनाशा॥
इन्द्रिय मन सों ज्ञानहिं मारे। जीवहिं मोह के जाल पँधारे॥
तस्मात् प्रथमहिं इन्द्रिय रोको। काम पापी को अब टोको॥
ज्ञान विज्ञान विनासक एहा। त्यागहु पार्थ मोह यह नेहा॥
इन्द्रिय श्रेष्ठ देह सों जानो। मन इन्द्रिय सों श्रेष्ठ बखानो॥
बुद्धि श्रेष्ठ है मन सों भाई। आत्मा बुद्धि सों परे सुहाई॥
बुद्धि सों ऊपर आतम जानो। आत्म बल सों कामहिं हानो॥
मन को बुद्धि सों स्थिर कीन्हा। आतम ज्ञान महुँ चित दीन्हा॥
दुर्जय शत्रु काम यह भारी। जीति लेहु अब धनुष धारी॥
इच्छा रूपी सर्प विशाला। डसत ज्ञान को करि विकराला॥
विषय भोग की तृष्णा त्यागौ। जागृत होइ सत्य महुँ लागौ॥
अतृप्त अग्नि यह काम कहावै। जितना डालो उतना बावै॥
संयम की जब धार चलावे। तबहीं काम शत्रु मिट जावे॥
आतम बोध दीप जब बारै। काम अंधेरा तबहीं हारै॥
परम लक्ष्य महुँ मन को लावो। काम जीत अमरत्व पावो॥
।। निष्काम कर्म महिमा: चौपाई संकलन ।।
तजहु आसक्ति कर्म फल आसा। हृदय राखि हरि पद विश्वासा॥
फल की इच्छा जो मन माही। कर्म बंध सो छूटत नाही॥
सिद्धि असिद्धि समान जो मानै। सोई पुरुष असली सुख जानै॥
बिना कर्म कोउ रहि नहिं पावा। प्रकृति स्वभावहिं सबहिं नचावा॥
नियत कर्म तू कर रे भाई। कर्महीनता दोष सदाई॥
यज्ञ हेतु जो कर्म कराहीं। बंधन मुक्त सोई नर आहीं॥
स्वार्थ त्यागि जो सेवा ठानै। जग में सोई ज्ञानी जानै॥
मनुज देह केवल कर्माहीं। आलस में कछु सिद्धि न पाहीं॥
परहित बस जो करइ उपाई। ताकी प्रभु नित करहिं सहाई॥
ज्ञानी सो जो कर्म न त्यागै। मोह त्यागि जो रण में जागै॥
जैसे जल महँ कमल निराला। तैसे कर्म करहु जग पाला॥
इन्द्रिय वश में जो नर राखे। सोई परम रस अमृत चाखे॥
कर्म करो पर चित न डलावो। ईश्वर अर्पण सब फल पावो॥
कर्तव्य भाव जो हृदय समाई। दुख की छाया निकट न आई॥
श्रेष्ठ पुरुष जो आचरन करहीं। लोक सकल अनुकरण अनुसरहीं॥
ममता त्यागि जो पुरुष विचारे। जीवन नैया भव से तारे॥
कर्म ज्ञान की सुन्दर जोड़ी। मोह की कंचन जंजीर तोड़ी॥
अपना धर्म सदा सुखकारी। परधर्म महँ भय है भारी॥
चित्त शुद्धि निष्काम से होई। आत्मज्ञान पावै नर सोई॥
कर्मयोग पावन सुख राशी। मिलत अंत में अविनाशी॥
अहंकार जब मन से जाई। तब निष्काम शक्ति प्रकटा़ई॥
नहीं अपेक्षित कीर्ति बखानी। कर्म ईश सेवा सम जानी॥
सुख-दुख में जो अडिग रहावे। कर्मयोग वह सिद्ध कहावे॥
मा फलेषु का मंत्र विधाता। कर्म ही बस तेरा सुखदाता॥
।। कर्म बनाम संन्यास: चौपाई संकलन ।।
अर्जुन मन में संशय भारी। कर्म तजूं कि बनूं संसारी॥
ज्ञान श्रेष्ठ या कर्म विधाना। केशव मोहि देहु समझाना॥
हँसि बोले तब श्री जगदीशा। सुनु पार्थ तुम अति मति धीशा॥
सांख्य और योग एकहि भाई। मूढ़ कहत हैं इनमें जुदाई॥
कर्म त्याग से सिद्धि न होई। ज्ञान बिना नहिं तिरता कोई॥
पर संन्यास कठिन अति भाई। कर्मयोग पथ सुलभ सदाई॥
इन्द्रिय रोकि जो ध्यान लगावै। मन विषयान्तर भटकत जावै॥
बाहर जती और भीतर कामी। मिथ्याचारी सो अधमी स्वामी॥
नियत कर्म जो वीर न त्यागै। आसक्ति तजि रण में जागै॥
सो संन्यासी सच्चा जानो। जो न द्वेष न इच्छा ठानो॥
कर्म करत जो ईश सम्हारे। सोई जगत में काज सँवारे॥
जैसे जल में नाव रहत है। पै जल भीतर नहिं बहत है॥
ज्ञानी कर्म करै बिनु आशा। लोक संग्रह की मन महँ पासा॥
अज्ञानी ज्यों मोह वश करहीं। ज्ञानी तैसे जग हित चरहीं॥
बिनु संन्यास न योग सधै है। बिनु संकल्प न कर्म बंधै है॥
त्याग वही जो मन से होई। वेश बदल संन्यासी न कोई॥
पाप पुन्य से ऊपर उठकर। कर्म समर्पण प्रभु को देकर॥
ज्ञानी कर्म बीच सुख पावै। संन्यासी सम शांति बढ़ावै॥
प्रकृति जनित गुण कर्म करावै। अहंकार बस जीव भुलावै॥
कर्तापन का मद जो त्यागै। सोई संन्यास मार्ग में जागै॥
सांख्य योग फल एकहि देवा। जो देखै सो पावै भेवा॥
कर्म योग बिनु दुख दुख भाई। संन्यास बिना न शांति आई॥
कर्म ही पूजा कर्म ही भक्ति। तजहु पार्थ तुम केवल शक्ति॥
कर्मठ होकर मन संन्यासी। मिलत अंत में अविनाशी॥
।। यज्ञ और कर्तव्य भाव: चौपाई संकलन ।।
यज्ञ चक्र ईश ने बनाया। सृष्टि हेतु यह पंथ दिखाया॥
सहयज्ञ प्रजा रचि विधाता। कह्यो कर्म ही सुख की दाता॥
यज्ञ हेतु जो कर्म कराहीं। बंधन मुक्त सोई नर आहीं॥
स्वार्थ लागि जो काज सँवारे। सोइ जीव भव जाल पँधारे॥
अन्न उपजत वर्षा के नीरा। वर्षा यज्ञ सों मिटत अधीरा॥
यज्ञ कर्म से होत प्रसूत। कर्म ब्रह्म से उपजत दूत॥
देव लोक को यज्ञ तृप्तवै। देव लोक फिर फल पहुँचावै॥
परस्पर भाव बढ़ावत दोऊ। परम श्रेय पावत है कोऊ॥
जो न चलत यह चक्र अनूपा। इन्द्रिय लोलुप पाप स्वरूपा॥
व्यर्थ जन्म सोई नर पावै। जो न यज्ञ हित कर्म कमावै॥
अपना पेट भरत जो केलि। भुंजत पाप कुबुद्धि अहेलि॥
यज्ञ अवशेष जो अन्न चखाहीं। सब पापन से मुक्त सो आहीं॥
जैसे सूर्य प्रकाश लुटावत। बदले में कुछ माँगन नावत॥
तैसे मनुज यज्ञ मन धारे। निज कर्तव्य को ही विस्तारे॥
ज्ञानी कर्म करै बिनु मोहा। जैसे यज्ञ अग्नि जग सोहा॥
अहंकार की संिध लगावै। ममत्व स्वाहा करि सुख पावै॥
सेवा यज्ञ धरम अनुसारी। मिटत सकल जग की दुखारी॥
दान मान और सत्य सुभावा। यज्ञ रूप ये कटत विलावा॥
कर्तव्य ही पावन समिधा है। धर्म काज ही शुद्ध विधा है॥
लोक संग्रह हित जो कुछ कीन्हा। यज्ञ भाव से प्रभु को दीन्हा॥
नहीं स्वार्थ की तनिक कामना। प्रभु चरणों में लो लौ लाना॥
यज्ञ पुरुष प्रभु श्री भगवाना। तिनके हेतु करहु कल्याणा॥
कर्म यज्ञ जो सिद्ध करावै। अन्त काल में शान्ति पावै॥
यज्ञमयी यह जीवन सारा। बहै भक्ति की निर्मल धारा॥
।। लोक-संग्रह और आदर्श आचरण: चौपाई संकलन ।।
लोक-संग्रह हेतु कर्म प्रधान। श्रेष्ठ पुरुष का यही विधान॥
ज्ञानी सो जो मार्ग दिखावे। जग को सन्मार्ग पर लावे॥
श्रेष्ठ पुरुष जो आचरन करहीं। लोक सकल अनुकरण अनुसरहीं॥
जो वे मान और नियम बनावें। साधारण जन ताहि मनावें॥
देखहु पार्थ मोरि गति भाई। त्रैलोक्य में कछु शेष न आई॥
नहिं अप्राप्त कछु मोहि निहारा। तदपि कर्म महुँ रहूँ संवारा॥
यदि मैं आलस बस रुक जाऊँ। कर्म मार्ग को तज बिसराऊँ॥
लोग सकल मम पंथ धरेंगे। पतन गर्त में सब गिरेंगे॥
वर्णसंकर यह जग होई। धर्म नाश का कारण सोई॥
प्रजा विनासक मैं कहलाऊँ। यदि कर्तव्य तज सुख पाऊँ॥
अज्ञानी आसक्ति वश करहीं। ज्ञानी तैसे जग हित चरहीं॥
बिनु आसक्ति कर्म जो ठाने। लोक-संग्रह सोई नर जाने॥
बुद्धि-भेद नहिं करै सयाना। अज्ञानी को देहु ज्ञाना॥
स्वयं कर्म महुँ युक्त रहावे। औरन को भी मार्ग लगावे॥
समाज की मर्यादा पावन। ज्ञानी राखत मन भावन॥
जैसे जल बिनु मीन न जीवे। तैसे धर्म ही अमृत पीवे॥
अनुशासन और शील सुभावा। लोक-संग्रह का मूल प्रलावा॥
धर्म ध्वजा को ऊँच उठावे। तबहीं समाज प्रगति पावे॥
कर्तव्य ही बस लक्ष्य हमारा। राष्ट्र धर्म सबसे है प्यारा॥
अहंकार तजि सेवा कीन्हा। लोक-संग्रह महुँ मन दीन्हा॥
सत्य राह पर जो पग धारे। कोटि-कोटि जन ताको प्यारे॥
परहित बस जो जीवन देवै। सोई जग महँ श्रद्धा लेवै॥
प्रभु अर्पण सब कर्म करीजै। लोक-संग्रह को बल दीजै॥
समरसता का दीप जलावे। अंधकार जग का मिट जावे॥
।। शत्रु रूपी काम (इच्छा) का नाश: चौपाई संकलन ।।
अर्जुन पूछत प्रभु समुझावा। पाप करत नर किस वश आवा॥
अनिच्छा तदपि करै जो पापा। कौन शक्ति दै अति संतापा॥
हँसि बोले प्रभु सुनु रे भाई। काम क्रोध रिपु अति कठिनाई॥
रजोगुण सों उपजत ईहा। महाशत्रु यह जानहु तीहा॥
महापाप और महा-अहारी। काम रूप यह शत्रु भारी॥
अग्नि सम यह तृप्त न होई। ज्ञानहिं ढँकत जानहु सोई॥
जैसे धुँआ आग को ढँकता। दर्पण धूलि सों मलिन दिखता॥
जेहि विधि गर्भ झिल्ली महँ सोहे। काम विवेकहिं तैसे मोहे॥
ज्ञानी का यह नित्य वैरी। काम रूप जो विपदा घेरी॥
इन्द्रिय मन और बुद्धि निवासा। यहाँ बैठि यह करहिं विनाशा॥
इन्द्रिय मन सों ज्ञानहिं मारे। जीवहिं मोह के जाल पँधारे॥
तस्मात् प्रथमहिं इन्द्रिय रोको। काम पापी को अब टोको॥
ज्ञान विज्ञान विनासक एहा। त्यागहु पार्थ मोह यह नेहा॥
इन्द्रिय श्रेष्ठ देह सों जानो। मन इन्द्रिय सों श्रेष्ठ बखानो॥
बुद्धि श्रेष्ठ है मन सों भाई। आत्मा बुद्धि सों परे सुहाई॥
बुद्धि सों ऊपर आतम जानो। आत्म बल सों कामहिं हानो॥
मन को बुद्धि सों स्थिर कीन्हा। आतम ज्ञान महुँ चित दीन्हा॥
दुर्जय शत्रु काम यह भारी। जीति लेहु अब धनुष धारी॥
इच्छा रूपी सर्प विशाला। डसत ज्ञान को करि विकराला॥
विषय भोग की तृष्णा त्यागौ। जागृत होइ सत्य महुँ लागौ॥
अतृप्त अग्नि यह काम कहावै। जितना डालो उतना बावै॥
संयम की जब धार चलावे। तबहीं काम शत्रु मिट जावे॥
आतम बोध दीप जब बारै। काम अंधेरा तबहीं हारै॥
परम लक्ष्य महुँ मन को लावो। काम जीत अमरत्व पावो॥
दोहा
इन्द्रिय मन अरु बुद्धि तजि, आतम रूप निहार।काम रूप रिपु जीतिये, करि विवेक अधिकार॥
निष्काम कर्म सार है, गीता का उपदेश। कर्म करत जो हरि भजै, मिटत सकल दुख-क्लेश॥
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श्रीमद्भगवद्गीता चौथा अध्याय 'ज्ञानकर्मसंन्यासयोग' अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान, कर्म और दिव्य जन्म-कर्म के रहस्यों को समझाया है।
दोहा
आदि देव उपदेस प्रभु, दीन्हा रवि कहँ ज्ञान।परंपरा पुनि लुप्त भइ, अर्जुन कहँ भगवान॥
ज्ञान अग्नि परजालि के, कर्म भस्म करि डार। योग युक्त जो नर रहै, सो पावै भव पार॥
चौपाई
आदि देव रबि कहँ यह सुनावा। मनु अरु इक्ष्वाकु वंश दृढ़ावा॥
काल संग यह योग बिलाना। तब अर्जुन कहँ कृष्ण बखाना॥
जब-जब धर्म ग्लानि जग होई। तब-तब देह धरूँ प्रभु सोई॥
परित्राण हित साधु अपारा। असुर विनाशक सृजउँ अवतारा॥
दिव्य जन्म मम कर्म अनूपा। जो जानै सो तजइ स्वरूपा॥
वीतराग भय क्रोध बिहीना। मन्मय मोहि भजहिं लवलीना॥
जेहि विधि मोहि भजहिं नर जोई। तेहि विधि फल पावत सब कोई॥
वर्ण विभाग कीन्ह मैं भाई। गुण अरु कर्म भेद बिलगाई॥
कर्म अकर्म भेद किमि जानै। मुनि जन भी नहिं सत्य बखानै॥
कर्म माहिं जो देख अकर्मा। अकर्म माहिं कर्म निज धर्मा॥
सोइ बुद्धिमान सोई योगी। कर्म फलहु सों जो नहिं भोगी॥
त्यागि संग सब कर्म जो करई। कहुँ न लिप्त सो भव जल तरई॥
काम संकल्प रहित जेहि कर्मा। ज्ञान अग्नि दग्ध भये धर्मा॥
निराश्रय अरु नित्य तृप्ता। कहुँ न बाँधत कर्म प्रसुप्ता॥
जितचित्त जेहि परिग्रह नाहीं। दोष न व्यापे ताके माहीं॥
यदृच्छा लाभ संतुष्ट जोई। द्वंद्व अतीत ईर्ष्या न होई॥
ब्रह्म अर्पण ब्रह्म हवि जानो। ब्रह्म अग्नि महुँ ब्रह्म बखानो॥
ब्रह्म कर्म महुँ समाधि जेही। ब्रह्म प्राप्त होवत है तेही॥
देव यज्ञ कोउ योग विधाता। कोउ संयम महुँ आहुति पाता॥
प्राणायाम परायण कोई। अपान प्राण महुँ रोकत सोई॥
द्रव्य यज्ञ सों ज्ञान श्रेष्ठा। सब कर्मन की यहि महुँ निष्टा॥
तद्विद्धि प्रणिपातेन प्रच्छा। सेवा करि पावै ज्ञानु स्वरच्छा॥
तत्वदर्शी जो ज्ञान सुनावैं। मोह जाल सों तोहि छुड़ावैं॥
पुनि न मोह अस होइहि ताता। लखिहहिं सब महुँ एक विधाता॥
पापिन महुँ जो अति पापी। ज्ञान नौका तरि जाय संतापी॥
यथा ईंधनो अग्नि जलावे। त्यों ज्ञान कर्म भस्म करावे॥
नहिं ज्ञान सम पावन आन। सं सिद्ध पावै निज ज्ञान॥
श्रद्धावान लभते ज्ञानं। तत्पर संयम सुख निधानं॥
अज्ञ अश्रद्ध संशयात्मा। नाश होत लखि मूढ़ अधरमा॥
संशय युत नहिं लोक न परलोका। सुख नहिं पावत व्यापे शोका॥
योग संन्यस्त कर्म जो करई। ज्ञान छिन्न संशय परिहरई॥
धनंजय सो नहिं कर्म सों बँधई। आतम परायण प्रभु सों सँधई॥
ममता त्यागि जो रहत उदासा। विचरत जग जनु मुक्त आकासा॥
सिद्धि असिद्धि समान जो मानै। सोइ सच्चा सुख हृदय बखानै॥
इन्द्रिय विषय सों प्रीति न राखै। ज्ञान सुधारस सोई चाखै॥
कर्म त्याग नहिं ज्ञान अधूरा। बिना कर्म नहिं होइ संपूरा॥
सब भूतन महुँ एकहिं देखै। सोइ पंडित सोइ ज्ञान विशेषै॥
शांति परम सो शीघ्रहि पावै। संशय तजि जो हरि गुण गावै॥
हृदय अज्ञान जनित जो संशय। ज्ञान खड्ग सों करि तहिं क्षय॥
उठहु पार्थ अब तजहु विषादा। योग युक्त हो मिटहि प्रमादा॥
कर्म करे पर फल नहिं चाहै। ज्ञान अग्नि महुँ जो अवगाहै॥
त्यागि आसक्ति शांत मन होई। स्थितप्रज्ञ कहिए नर सोई॥
ब्रह्म ज्ञान अरु कर्म सुयोगा। यहि कहैं ज्ञान संन्यास योगा॥
परम तत्व यह कृष्ण सुनावा। अर्जुन के मन मोह नसावा॥
जो यह अध्याय नित्य चित लावै। सो भव सागर पार लगावै॥
ज्ञान भक्ति अरु कर्म को सारा। गीता देति अमित सुख धारा॥
कृष्ण चरण महुँ प्रीति बढ़ावहु। जीवन सफल करि परम पद पावहु॥
जय जय माधव ज्ञान प्रदाता। भक्त वत्सल त्रिभुवन सुखदाता॥
दोहा
संशय अज्ञान जनित जो, हृदय माहिं बलवान।ज्ञान खड्ग सों काटि प्रभु, दीन्ह अभय हरि दान॥
तजि प्रमाद उठि पार्थ अब, योग माहिं चित लाय।कर्म करत फल त्यागि के, परम मोक्ष कहँ पाय॥
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श्रीमद्भगवद्गीता
पाँचवाँ अध्याय- संन्यासयोग
हमें यह सिखाता है कि कर्मों का स्वरूप से त्याग करने की अपेक्षा, निष्काम भाव से कर्म करना श्रेष्ठ है। इसमें समदृष्टि और कर्तापन के अहंकार से मुक्ति का मार्ग बताया गया है।
संन्यासयोग - प्रारंभ दोहा
सांख्य योग अरु कर्म विधि, पूछत पार्थ सुजान।कवन श्रेष्ठ एहि द्विविध महुँ, कहहु कृपा करि भान॥
ज्ञान और निष्काम पथ, एकहिं रूप बखान। ममता तजि ज कर्म करे, सोइ परम विद्वान॥
॥ चौपाई संग्रह (48) ॥
संन्यास कर्मयोग द्वौ नीके। मुक्ति मार्ग जनु मंगल जी के॥ १
तदपि कर्म तजि योग सुहावा। कर्मयोग प्रभु श्रेष्ठ बढ़ावा॥ २
राग द्वेष ते रहित जो होई। नित्य संन्यासी कहिये सोई॥ ३
सांख्य योग कहँ पृथक बखानै। बाल बुद्धि तिन कहँ नहिं जानै॥ ४
एकहु महुँ जो निष्टा पावै। उभय फल सोई नर पावै॥ ५
सांख्य योग सों पद जो लहहीं। योग युक्त जन सोई कहहीं॥ ६
एक रूप जो देखइ भाई। देखत सत्य सोई सुख दाई॥ ७
योग बिना संन्यास न आवै। योग युक्त मुनि ब्रह्महिं पावै॥ ८
विशुद्ध आत्मा जितेंद्री जोई। सर्वभूत प्रिय कहिये सोई॥ ९
सब माहिं निज आत्मा देखै। कर्म करत नहिं दोष विशेषै॥ १०
देखत सुनत छुअत अरु खात। गंध लेत अरु सोवत जात॥ ११
इन्द्रिय इन्द्रिय अर्थन माहीं। मैं न करत कछु संशय नाहीं॥ १२
ब्रह्म महुँ अर्पण करि कर्मा। त्यागि संग बरते निज धर्मा॥ १३
लिप्त न होइ पाप सों सोई। पद्म पत्र जनु जल महुँ होई॥ १४
कायेन मनसा बुद्धी प्रचारी। केवल इन्द्रिय कर्म विचारी॥ १५
आत्म शुद्धि हित कर्म कराहीं। ममता त्यागि योग मन माहीं॥ १६
युक्त पुरुष फल त्यागि के भाई। पावत शांति परम सुख दाई॥ १७
अयुक्त फल आसक्ति के मारे। बँधत जाइ भव सिंधु किनारे॥ १८
न नव द्वारे पुर माहीं। वश करि मन सुख सों विरचाहीं॥ १९
नैव कुर्वन् न कारयन् देवा। आतम महुँ रहि करहिं सेवा॥ २०
६. ईश्वर की अकर्ता स्थिति
न कर्तृत्वं न कर्माणि। सृजत न प्रभु जग के प्राणी॥ २१
न कर्म फल संयोग विधाता। स्वभाव ही बरतत सब नाता॥ २२
न कहुँ पाप न पुण्य कोउ लेई। अज्ञान ज्ञान कहँ ढँकि देई॥ २३
ताते मोहित सब जग प्राणी। लखहिं न सत्य परम प्रभु वाणी॥ २४
ज्ञानहिं सों जेहि मोह नसावा। तिनके हृदय भानु प्रगटावा॥ २५
तत्बुद्धयस्तदात्मानो जाहीं। पुनरावृत्ति होइ कहुँ नाहीं॥ २६
ज्ञान धूत कल्मष जो होई। ब्रह्म परायण पावत सोई॥ २७
परम पद सोई प्राप्त कराहीं। संशय मोह कहुँ रहत न माहीं॥ २८
विद्या विनय युक्त जन होई। ब्राह्मण गऊ और गज सोई॥ २९
कुक्कुर और चाण्डाल मझारी। सम लखि पंडित ज्ञान विचारी॥ ३०
समत्व माहिं जो मन थिर राखा। जीतेउ सर्ग वेद अस भाषा॥ ३१
निर्दोष ब्रह्म सम ब्रह्म स्थिति। पावत सोइ लखि सम परमिति॥ ३२
प्रिय पाय नहिं हर्षित होई। अप्रिय पाय न उद्वेग सोई॥ ३३
ब्रह्म विद् ब्रह्म महुँ थिर होई। संशय मोह सकल तजि सोई॥ ३४
बाह्य स्पर्श महुँ सुख नहिं पावै। आतम सुख महुँ जो मन लावै॥ ३५
ब्रह्म योग युक्त आत्मा जेही। अक्षय सुख सो पावत तेही॥ ३६
विषय भोग जो भोगत भाई। दुःख योनि ते सब दुख दाई॥ ३७
आदि अंत वाले सब भोगा। तिन महुँ रमत न पंडित योगा॥ ३८
काम क्रोध के वेगहिं जोई। सहइ देह तजि पावै सोई॥ ३९
सोइ सुखी सोइ नर योगी। विचरत जग महुँ परम वियोगी॥ ४०
अन्तः सुख अन्तः आरामा। अन्तः ज्योति जो आत्म धामा॥ ४१
ब्रह्म भूत सोई योगी होई। ब्रह्म निर्वाण पावत है सोई॥ ४२
क्षीण भये सब कल्मष जाके। द्वंद्व मिटे सब संशय ताके॥ ४३
सर्वभूत हित रत जो प्राणी। पावत ब्रह्म परम सुख वाणी॥ ४४
काम क्रोध सों रहित जोई। यतचित्त आतम विद् सोई॥ ४५
तिनके निकट ब्रह्म निर्वाणा। सदा रहत अस वेद बखाना॥ ४६
प्राण अपान सम करि नासा। हृदय ध्यान प्रभु रूप निवासा॥ ४७
मुक्ति परायण मुनि जो होई। सदा मुक्त सो जानहु सोई॥ ४८
॥ दोहा ॥
भोक्ता यज्ञ तपस जेइ, लोक महेश्वर जान। सुहृद सबहिं भूतन के, पावत शांति महान।।
पंचम यह अध्याय है, कृष्ण ज्ञान भण्डार। ममता त्यागि कर्म करे, उतरै सो भव पार॥
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अध्याय छह
आत्मसंयमयोग:
दोहा
षष्ठम अध्याय योग का, मन को करे सुजान। चंचल वृत्ति शांत कर, पावै पद निर्वाण॥
ज्ञान ध्यान की युक्ति अब, कहत कृष्ण करुणाध। साधक मन पावन करे, मिटे सकल मन व्याध॥
भाग 1: मन की स्थिति और मित्र-शत्रु का भेद
मन ही अपना मित्र कहावे, मन ही शत्रु बन दुःख पावे।
जिसने अपना मन जीता है, वही सुखी जग में जीता है।
मन वश में तो बंधु समान, अनियंत्रित तो शत्रु महान।
सर्दी गर्मी मान अपमाना, सम चित्त रहे वही विज्ञाना।
मिट्टी पत्थर कंचन जान, योगी देखे एक समान।
मित्र शत्रु और उदासीन, सबको देखे सम परवीण।
एकाकी रह ध्यान लगावे, आशा तृष्णा दूर भगावे।
मन को रोकें एकाग्र भाव, आत्मशुद्धि का यही प्रभाव।
भाग 2: ध्यान की विधि और अनुशासन
ऊँचा नहिं नहिं नीचा आसन, कुशा मृगछाला मृदु वासन।
स्थिर होकर आसन पर बैठे, इंद्रिय मन के जाले काटे।
काया शिर और ग्रीवा सीधी, अचल रहे पावे सुख सिद्धी।
दृष्टि रहे नासा के अग्र, मन न भटके होवे व्यग्र।
ब्रह्मचर्य व्रत मन में धारे, भय का त्याग हृदय से वारे।
भोजन संयम अति सुखकारी, जागे सोए नियम विचारी।
जो अति खाता सो नहिं योगी, जो नहिं सोता वह अति रोगी।
दुःख का नाश योग से होवे, संयम से जो निद्रा खोवे।
भाग 3: मन का निग्रह और अभ्यास
दीपक जैसे वायु विहीना, विचलित नहिं हो योग प्रवीणा।
जहाँ रुके मन आत्म अधारा, वहां बहे नित सुख की धारा।
विषय वासना मन से त्यागे, आत्म तत्व में जो जन जागे।
चंचल मन जब बाहर जाए, बुद्धि पकड़ फिर वापस लाए।
बार-बार अभ्यास बढ़ाओ, भटके मन को राह दिखाओ।
शांत चित्त पावे सुख भारी, पाप रहित हो ब्रह्म विचारी।
सब भूतों में प्रभु को देखे, प्रभु में सब संसार विशेषे।
दुख सुख सबको अपना जाने, श्रेष्ठ योग की महिमा माने।
भाग 4: अर्जुन की शंका और कृष्ण का समाधान
अर्जुन बोले मन अति चंचल, जैसे वायु चले अति प्रबल।
इसे रोकना कठिन है स्वामी, आप कहो अंतर्यामी।
कृष्ण कहें अभ्यास बढ़ाओ, वैराग्य संग इसे समझाओ।
जिसका मन नहिं वश में भाई, योग सिद्धि उसने नहिं पाई।
श्रद्धा से जो योग लगावे, अंत काल में परम गति पावे।
योग भ्रष्ट क्या नष्ट हो जाता? प्रभु चरणों में संशय लाता।
कृष्ण कहें कल्याण पथ राही, दुर्गति कभी न पाता भाई।
शुभ कर्मों का फल नहिं मिटता, जन्म योगियों के घर मिलता।
भाग 5: पुनर्जन्म और योग की श्रेष्ठता
पिछले जन्म के संस्कार जागे, फिर से योग मार्ग में भागे।
यत्न करे जो कई जन्मों तक, पा ले लक्ष्य परम पद तब तक।
तपस्वी से भी योगी श्रेष्ठ, ज्ञानि कर्मि से योग गरिष्ठ।
श्रद्धावान जो मुझको ध्यावे, वह योगी सबसे सुख पावे।
कर्म करे फल त्याग विचारी, वही सन्यासी वही विहारी।
संकल्पों का त्याग जो करता, योग शिखर पर वही विचरता।
इंद्रिय भोग न मन को भावे, योगारूढ़ वही कहलावे।
अपना उद्धार स्वयं ही कीजे, नीचे नहिं खुद को गिरनीजे।
भाग 6: उपसंहार - प्रभु भक्ति
ज्ञान विज्ञान तृप्त मन करे, कूटस्थ योग जीत मन हरे।
समता भाव हृदय में आये, सबहि द्वंद्वों से मुक्ति पाये।
मन की चंचलता को जीतो, प्रेम भक्ति के अमृत पीतो।
ध्यान योग है साधन पावन, निर्मल करत मनुज का जीवन।
जो मन जीते वही विजेता, गीता का यह मंत्र सुचैता।
योग युक्त हो कर्म करइ जो, भव सागर से पार उतरि वो।
आत्म बोध का दीप जलाओ, कृष्ण शरण में तुम मिल जाओ।
यह अध्याय योग का सारा, आत्म ज्ञान की बहती धारा।
दोहा
अभ्यास और बैराग, श्रेष्ठ करें परिणाम। समता जो भी धारते, वे ही श्रेष्ठ सुजान।।
षष्ठम भाग पूर्ण भयो, योग सार सुख नाम। आतम में परमातमा, देखत आठों धाम॥
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खण्ड 2-भक्ति और ब्रह्मांडीय चेतना (Cosmic Consciousness)
भक्ति मार्ग अनूप सुखकारी, चेतना जागत अति उजियारी।
अणु-अणु महँ जो ब्रह्म समाना, भक्त हृदय सोई रूप पहचाना॥
घट-घट व्यापक चेतन राया, देखत भक्त मिटत सब माया।
निज स्वरूप जब ब्रह्म समाई, बूँद मिले ज्यों सिंधु कहाई॥
ब्रह्मांडीय जो शक्ति अपारा, बहे निरंतर भक्ती धारा।
ज्ञान-कर्म जब भक्ति में जागे, तुच्छ जगत सब मिथ्या लागे॥
चेतना निर्मल भक्ति स्वरूपा, पावत जीव परम पद भूपा।
जहाँ न द्वैत न कोई भेदा, गावत जाहि पुरान अरु वेदा॥
भावार्थ
* प्रथम चौपाई: भक्ति का मार्ग अत्यंत सुखद है, जो भीतर की चेतना को जागृत करता है। जो ब्रह्म ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त है, भक्त उसे अपने हृदय में ही अनुभव कर लेता है।
* द्वितीय चौपाई: जैसे एक बूँद समुद्र में मिलकर समुद्र बन जाती है, वैसे ही जब भक्त की चेतना परमात्मा में विलीन होती है, तो सारा मायावी बंधन कट जाता है।
* तृतीय एवं चतुर्थ चौपाई: ब्रह्मांड की अनंत शक्ति प्रेम और भक्ति के माध्यम से ही सुलभ होती है। जब चेतना पूरी तरह शुद्ध हो जाती है, तब भेदभाव मिट जाता है और जीव उस 'परम पद' को प्राप्त कर लेता है जिसे वेदों ने 'अद्वैत' कहा है।
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अध्याय सात
ज्ञान विज्ञान योग
प्रस्तावना और ज्ञान की महिमा
श्री भगवान कहत सुनु पार्था, ज्ञान-विज्ञान कहूँ अनुस्वार्था।
जो जानत सब संशय जाई, मोक्ष मार्ग जनु हृदय समाई।
सहस्रन में कछु जतन कराहीं, सिद्धि हेतु नर यत्न लगाहीं।
तिन सिद्धन में कोउ विरला सोई, मोको तत्त्वत जानत जोई।
अपरा और परा प्रकृति (प्रकृति का रहस्य)
भूमि आपु अनल अरु वायू, नभ मन बुद्धि अहंकृति आयू।
आठ प्रकार प्रकृति यह मेरी, 'अपरा' नाम जानु मति घेरी।
एहि से भिन्न 'परा' इक दूजी, जो जग जीवन शक्ति अनुजी।
जिससे धारित सकल संसारा, जानहु कुन्तीपुत्र विचारा।
परमात्मा की सर्वव्यापकता
जगत उत्पत्ति प्रलय मोहि माहीं, मुझसे भिन्न कछु आन न नाहीं।
सूत्र माहिं मणियाँ जिमि पिरोई, मुझमें गुँथा जगत सब कोई।
जल में रस हूँ कुन्ती नन्दन, शशि सूरज में प्रभा अनन्दन।
वेदन माहिं ओम् मैं पावन, नभ में शब्द सकल मन भावन।
पौरुष नर में, गन्ध भूमि में, तेज तपन हूँ रवि रश्मि में।
सब भूतन का बीज सनातन, बुद्धिमान की बुद्धि पुरातन।
त्रिगुणमयी माया का परदा
सात्विक राजस तामस भावा, मुझसे ही सब होत प्रलावा।
तदपि न उनमें मैं हूँ वासा, मुझमें स्थित सब परकासा।
त्रिगुणमयी यह माया भारी, मोहित जिससे दुनिया सारी।
दैवमयी मम माया दस्तर, पार पावना अति ही दुष्कर।
जो मम शरण आवहीं प्राणी, माया तरत कहूँ सच वाणी।
चार प्रकार के भक्त
नराधम मूढ़ भजन नहिं करते, आसुर भाव हृदय में भरते।
चतुर बिधि भजहिं मोहि जन ज्ञानी, भारत सुनु सुकृत सुभ बानी।
आरत, अर्थार्थी, जिज्ञासू, ज्ञानी चहुँ प्रिय मम अभ्यासू।
तिनमें ज्ञानी मोहि अति प्यारा, एक भक्ति हितु सदा सहारा।
ज्ञानी आत्मा रूप ही मेरा, ऐसा मत मम अटल सबेरा।
श्रद्धा और फल विधान
जन्म अनेकन यत्न कराहीं, अन्त ज्ञान मम शरणे आहीं।
'वासुदेव सर्वम्' जो जाना, सो महात्मा दुर्लभ माना।
काम प्रेरित जो अन्य देवा, पूजत निज स्वभाव बस सेवा।
जो जिस रूप करे मम श्रद्धा, मैं तिनकी दृढ़ करूँ सुसिद्धा।
फल मिलता तिनको अति अल्पू, जो भजते सुर मति विकल्पू।
देव पूजने सुरपुर जाहीं, मम भक्त मोहि में मिल जाहीं।
ईश्वर का अव्यक्त स्वरूप
अव्यक्त मोहि व्यक्ति जन मानहिं, मम अविनाशी रूप न जानहिं।
योगमाया से ढका हुआ मैं, मूढ़ जगत को अजा हुआ मैं।
भूत भविष्य वर्तमान मैं जानूँ, मोहि न जाने कोई अज्ञानूँ।
इच्छा द्वेष जनित जो द्वन्द्वा, मोह फँसे जग मति के अन्द्वा।
मुक्ति का मार्ग और अन्तकाल
पाप नष्ट जेहि पुण्य कमावा, द्वन्द्व मोह तजि मोहिं ध्यावा।
जरा मरण से मुक्ति जो चाहत, मम आश्रय तजि अन्य न राहत।
वे ब्रह्म अध्यात्म सब जानहिं, कर्म अखण्डित उर पहचानहिं।
अधिभूत अधिदैव संग राखे, अधियज्ञ मोहि जो मन चाखे।
अन्त काल मति मम सम होई, युक्त चित्त मोहि पावत सोई।
प्रकृति रहस्य जो समझत नीके, माया जाल होत सब फीके।
उपसंहार और महिमा
सप्तम भाग ज्ञान को सागर, भरत कृष्ण रस ज्ञान उजागर।
माया परदा जो जन टारे, माधव ताहि हृदय से धारे।
ज्ञान विज्ञान योग सुहावन, पढ़त सुनत होत मन पावन।
संशय तजि जो शरणे आवै, सो परमेश्वर पद को पावै।
रिद्धि सिद्धि सुख सम्पति पावै, जो हरि नाम निरंतर गावै।
भव बाधा सब दूर नसाहीं, कृष्ण कृपा मन संशय नाहीं।
प्रेम सहित जो पाठ कराहीं, तिनके कष्ट कृष्ण हर लेहीं।
इति श्री ज्ञानविज्ञान योगा, मिटे सकल जग मानस रोगा।
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॥ भगवदगीता: अष्टम अध्याय (अक्षरब्रह्मयोग सार) ॥
अर्जुन के प्रश्न
अर्जुन बोले वचन सुजाना। किम स्वरूप वह ब्रह्म बखाना॥
अध्यात्म क्या है प्रभु कहिये। कर्म नाम किसका वह लहिये॥
अधिभूत किसे कहते स्वामी। अधिदैव कौन अंतरयामी॥
अधियज्ञ कौन है इस देही। कैसे जानत जन सनेही॥
अन्त काल कैसे जो ध्यावे। सो तुमको माधव कैसे पावे॥
श्रीकृष्ण का उत्तर (ब्रह्म और अध्यात्म)
श्री भगवान कहें सुनु पार्थ। अक्षर ब्रह्म परम परमार्थ॥
स्वभाव अध्यात्म कहावे। भूत भाव विसर्ग कर्म बनावे॥
नश्वर भाव अधिभूत कहाई। पुरुष अधिदैवत जानहु भाई॥
अधियज्ञ मैं हूँ इस देहा। सब यज्ञन फल मैं हूँ गेहा॥
मृत्यु और स्मरण का महत्व
अन्त समय जो मुझको ध्यावे। तजकर देह मोहि में आवे॥
इसमें संशय नेकहु नाहीं। जो ध्यावे सो मिले मुसाहीं॥
जिस जिस भाव को सुमिरन करई। अन्त काल तज देह सो धरई॥
सदा भाव जिस चित में राखे। सोई गति वह प्राणी चाखे॥
तस्मात् हरदम मोहे सुमिरे। युद्ध करे और पाप से बिचरे॥
अर्पण मन बुद्धि जो मोही। निसंदेह पावेगा मोही॥
योग और ॐ का ध्यान
अभ्यास योग युत चित्त लगावे। परम पुरुष दिव्य सो पावे॥
सर्वज्ञ पुराण अनुशासिता। सूक्ष्म से सूक्ष्म जगत विधाता॥
अचिन्त्य रूप सूर्य सम ज्योति। तमस से परे दिव्य जो होती॥
भक्ति युक्त जो योग बल धारे। भृकुटी मध्य प्राण विस्तारे॥
सोई दिव्य पुरुष को पावे। जन्म मरण के पार सिधावे॥
वेद विदित जो अक्षर कहहीं। वीतराग मुनि जिसमें रहहीं॥
ब्रह्मचर्य का पालन करते। सो पद संक्षेप में हम कहते॥
सब द्वारों को संयम करिके। मन को हृदय बीच में धरि के॥
मस्तक में निज प्राण चढ़ावे। योग धारणा में टिक जावे॥
'ओम्' ब्रह्म का नाम उचारे। तजकर देह मोहे उर धारे॥
जो मुझको सुमिरे चित लाई। सुलभ मैं ताको हूँ कपिराई॥
पुनर्जन्म से मुक्ति
पाकर मुझको पुनर्जन्म नाहीं। दुःखालय अशाश्वत जग माहीं॥
महात्मा जन मोहि जब पावें। परम सिद्धि को वो पा जावें॥
ब्रह्म लोक तक जो भी जावे। लौट कर इस जग में आवे॥
मुझको पाकर जन्म न होई। सत्य वचन जानो सब कोई॥
काल की गणना (ब्रह्मा का दिन-रात)
सहस्र युग ब्रह्मा का दिन है। सहस्र युग की रात कठिन है॥
काल अवधि जो जन यह जाने। दिन रात का मर्म सो पहचाने॥
दिन आते सब भूत प्रकाशें। रात होते सब अव्यक्त विनाशें॥
वही भूत गण फिर फिर आवें। विवश होकर जन्म वो पावें॥
परम धाम का स्वरूप
उस अव्यक्त से परे जो दूजा। अव्यक्त सनातन करे जो पूजा॥
सब भूतों के नष्ट हुए भी। नष्ट न होवे सत्य कहे भी॥
अक्षर अव्यक्त नाम सोई। परम गति कहे सब कोई॥
जिसे पाकर फिर लौट न आना। सोई मेरा परम ठिकाना॥
अनन्य भक्ति से वो प्रभु पावे। जिसमें सारा जगत समावे॥
शुक्ल और कृष्ण मार्ग
जिस काल में तजकर देह प्रानी। लौट न आवे योगी ज्ञानी॥
अग्नि ज्योति दिन शुक्ल पखवारा। उत्तरायण मार्ग उजियारा॥
इस मार्ग से ब्रह्म विद् जावें। ब्रह्म लोक को वो पा जावें॥
धुआं रात और कृष्ण पखवारा। दक्षिणायन मार्ग अंधियारा॥
इस मार्ग से योगी जो जावे। चन्द्र ज्योति पाकर लौट आवे॥
शुक्ल कृष्ण दो राह जगत में। शाश्वत मानी गई मत में॥
एक से लौटे न दूजे आवे। यह रहस्य जो योगी पावे॥
जान मार्ग मोह में न जावे। सदा योग युक्त सुख पावे॥
वेदन यज्ञन तप दानन फल। योगी पावे ब्रह्म पद अचल॥
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अध्याय नवम
राजविद्यायोग – अर्पण की शक्ति
राजविद्या राजगुह्य अनूपा। अर्पण बल जानहु जग भूपा॥
प्रेम सहित जो वस्तु चढ़ावे। प्रभु सो सहर्ष हृदय लगावे॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं। भक्ति भाव बस प्रभु मन मोयं॥
धन और बल काम न आवै। केवल प्रेम विमल मन भावै॥
शबरी भीलनी अति अनुरागी। राम मिलन हित जागी भागी॥
मतंग ऋषि की शिक्षा मानी। मारग बुहारति प्रेम दीवानी॥
खट्टे मीठे फल चुन लावे। चखि चखि प्रभु हित ढेर लगावे॥
मन में शंका तनिक न लावे। जूठे फल रघुवर को भावे॥
लक्ष्मण देखि चकित रहि जाहीं। जुठन प्रभु कैसे मुख पाहीं॥
राम हँसत अरु प्रेम बढ़ावत। कंद मूल को अमृत बतावत॥
स्वाद न फल में भक्ति में पावा। शबरी का जन्म सफल करि गावा॥
जाति पांति कुल प्रभु नहिं चीन्हा। केवल प्रेम तत्व रस भीन्हा॥
अधम ते अधम भक्ति जो करई। भव सागर सो सहजहिं तरई॥
शबरी के बेरन की गाथा। प्रेम झुकावत प्रभु का माथा॥
प्रेम विवश रघुनाथ सिधावा। नवधा भक्ति का पाठ पढ़ावा॥
अर्पण भाव जो हृदय समाई। सिद्ध योग सोई कहलाई॥
अब सुदामा की कथा सुहावन। दीन हीन पर अति मनभावन॥
द्वारिका धीश सखा सुन पाये। फटे वसन द्विज द्वारे आये॥
तंदुल पोटली कांख छिपाये। संकोचवश न आगे लाये॥
प्रभु जानत अंतर्यामी देवा। सखा भाव की अद्भुत सेवा॥
छीन लियो प्रभु पोटल छोटी। भक्त प्रीति नहिं देखत खोटी॥
एक मुष्टि मुख बीच चबावा। भू मंडल का राज थमावा॥
दूजी मुष्टि हाथ जब लीन्हा। स्वर्ग लोक अर्पण कर दीन्हा॥
तीजी मुष्टि रुक्मिणि गही। बस प्रभु अब कछु शेष नहीं॥
कहाँ सुदामा तंदुल आधा। कहाँ द्वारिका पति की बाधा॥
प्रेम के वश प्रभु झुक झुक जाहीं। तंदुल सम जग में कछु नाहीं॥
अर्पण की महिमा अति भारी। रीझत कृष्ण भक्त हितकारी॥
तंदुल नहीं वो भाव अपारा। जिसने जीत लिया जग सारा॥
अहं त्याग जो अर्पण होई। राजयोग फल पावे सोई॥
श्रद्धा की सरिता मन डोले। प्रभु द्वार निज आपहिं खोले॥
शबरी सुदामा साक्षी नीके। बिनु अनुराग सकल रस फीके॥
राजविद्या यह परम पुनीता। अर्पण भाव सिखावत गीता॥
छप्पन भोग न प्रभु को भाये। विदुर साग और बेर सुहाये॥
वस्तु बड़ी या छोटी नाहीं। हृदय भाव बस प्रभु के पाहीं॥
जो कछु करहु समर्पण कीजे। जीवन रस प्रभु पद में पीजे॥
यही योग की उत्तम धारा। उतरे भक्त भवाब्धि पारा॥
दीन हीन जो भाव सँजोवे। जनम जनम के कल्मष धोवे॥
तंदुल और बेर की वाणी। सुनहु सकल जग के प्राणी॥
समरस भाव भक्ति जब जागे। माया मोह दूर सब भागे॥
अर्पण ही जीवन का सारा। यही राजविद्या सुखकारा॥
ज्ञान ध्यान जप तप जो करई। अर्पण बिनु सब रीत भरई॥
भाव सहित अर्पण जो कीन्हा। प्रभु अपना सर्वस्व दे दीन्हा॥
शबरी की कुटिया मन कीजे। राम नाम रस निसिदिन पीजे॥
सुदामा जैसी प्रीत बढ़ाओ। प्रभु को अपना सखा बनाओ॥
अर्पण बल घट घट उजियारा। भक्ति हेतु प्रभु लेत अवतारा॥
जय जय राम कृष्ण सुख रासी। अर्पण से कटती यम फाँसी॥
राजविद्या जो मन में ध्यावे। परम धाम सोई जन पावे॥
प्रेम मगन हो सुमिरन कीजे। प्रभु चरणों में मन को दीजे॥
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अध्याय दशम
विभूति योग- हर सुंदर और श्रेष्ठ वस्तु में ईश्वर का दर्शन
जय श्रीहरि अच्युत अविनाशी। घट-घट व्यापक ज्योति प्रकाशी॥
अर्जुन विनय करी कर जोरी। कहहु विभूति देव मति मोरी॥
सुनहु पार्थ मम कथा सुहावन। दिव्य विभूति परम मन भावन॥
अन्तः आदि मध्य मैं सोई। मुझसे भिन्न न दूजा कोई॥
अदिति पुत्रन में विष्णु कहाऊँ। तेजोमय रवि में दरशाऊँ॥
मरुतों में मैं मरीचि जानो। नक्षत्रन में शशि मन मानो॥
वेदों में सामवेद हूँ नीका। देवों में इंद्र जगत का टीका॥
इंद्रिय बीच चेतना जानो। भूत प्राण में मन महँ मानो॥
रुद्रन में शंकर मैं देवा। कुबेर यक्ष करैं मम सेवा॥
वसुओं में पावक मैं पावन। मेरु शिखर मैं अति मनभावन॥
पुरोहितन में बृहस्पति जानो। सेनापति में स्कंद बखानो॥
सरवर बीच सिंधु मैं भारी। भृगु ऋषि मुनि में महिमा न्यारी॥
शब्दों में ओंकार कहाऊँ। जप यज्ञों में मैं बस जाऊँ॥
स्थावर में हिमगिरि बलवाना। तरुवर में अश्वत्थ सुजाना॥
देवर्षिन में नारद जानो। गंधर्वों में चित्ररथ मानो॥
सिद्ध मुनीश्वर कपिल कहाऊँ। श्रेष्ठ जनों में मैं ही आऊँ॥
घोड़ों में उच्चैश्रव सार। ऐरावत गजराज उदार॥
नरों बीच मैं राजा सोहूँ। सब जग की मर्यादा मोहूँ॥
शस्त्रों में मैं वज्र कहाऊँ। कामधेनु गऊ बन जाऊँ॥
कामदेव मैं प्रजन सुहावा। सर्पों में वासुकि पद पावा॥
नागों में शेषनाग मैं स्वामी। वरुण देव जल अंतरयामी॥
पितरों में अर्यमा प्रधान। यमराज नियम में चतुर सुजान॥
दैत्यों में प्रह्लाद पियारा। काल गणना में मैं ही सारा॥
पशुओं में मृगराज कहाऊँ। खग में गरुड़ वेग दरशाऊँ॥
पवन वेग पावन कर हारा। राम शस्त्रधारिन विस्तारा॥
मत्स्यों में मैं झष मनहारी। गंगा नदियन में अति न्यारी॥
सृष्टि आदि अरु मध्य विधाता। अंत समय मैं ही फलदाता॥
विद्या में अध्यात्म सयानी। वाद विवाद जल्प मैं मानी॥
अक्षरों में अकार मैं सोई। द्वंद्व समास न दूजा कोई॥
अक्षय काल सर्व सुखकारी। धाता मैं विश्वतोमुख भारी॥
मृत्यु सर्वहर मैं ही भाई। उद्भव भविष्य की चतुराई॥
नारी में कीर्ति स्मृति बानी। क्षमा मेधा धृति मैं ही मानी॥
सामवेद में बृहत् सुगाना। गायत्री छंदों में जाना॥
मासों में मार्गशीर्ष कहाऊँ। ऋतु में कुसुमाकर बन जाऊँ॥
छल करने वालों में द्यूता। तेजस्वी जन तेज प्रपूता॥
विजय और निश्चय मैं सोई। सत्व सत्वगुणी में मैं होई॥
वृष्णि वंश में कृष्ण कहाऊँ। पांडव में अर्जुन बन जाऊँ॥
मुनियों में मैं व्यास सुजाना। कवि उशना मैं चतुर बखाना॥
दमन करन में दंड कहाऊँ। नीति विजय चाहत जो पाऊँ॥
मौन गुप्त भावों में भाई। ज्ञान ज्ञानियों की चतुराई॥
सब भूतों का बीज मैं सोई। चराचर मुझसे भिन्न न कोई॥
मम विभूति का अंत न पारा। यह तो केवल संक्षिप्त सारा॥
जो भी विभूति युक्त है प्राणी। श्री लक्ष्मी बल की है खानी॥
तेज पुंज मम अंश सँझोये। जानहु पार्थ ताहि मन प्रोये॥
अथवा अधिक जान क्या कीजै। एकांश जगत धारण कर लीजै॥
जगत व्यापि मैं एक सहारा। अखिल विश्व मम अंश पसारा॥
इति विभूतियोग गाथा गाई। हरि चरणों में प्रीति लगाई॥
विश्वरूप प्रभु ध्यान लगावो। जन्म मरण से मुक्ति पावो॥
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श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय 'विश्वरूपदर्शन योग'
विश्वरूपदर्शन: काल और विराट स्वरूप
दोहा
मोहरूप अज्ञान तम, गयउ पार्थ कर दूर। जब लखि प्रभु निज रूप में, ज्ञान भानु भरपूर।।
विनय करी तब पार्थ ने, देखन को विभु रूप।ऐश्वर्य योग दिखाइये, आदि देव अनूप।।
चौपाई
विश्वरूप प्रभु अचरज भारी, देखि पार्थ मति भई विचारी।
कोटि सूर्य सम तेज बिराजा, अद्भुत रूप अनूपम साजा।।
दिव्य चक्षु जब प्रभु ने दीन्हा, अर्जुन देखि परम सुख लीन्हा।
अगणित मुख अरु नयन विशाला, रूप अनन्त परम विकराला।।
हस्तक सहस आयुध धारे, चकित भये कपिध्वज निहारे।
दिग-दिगन्त महँ व्याप्त शरीरा, देखि भये व्याकुल मति धीरा।।
ब्रह्मा शिव अरु देव अशेषा, देखि अंग महँ सकल विशेषा।
स्वर्ग लोक पाताल समाना, प्रभु के तन महँ सब जग जाना।।
नहिं आदि नहिं मध्य निहारा, नहिं अन्त को मिलत किनारा।
अग्नि मुखन महँ दमकत ज्वाला, ग्रसत जगत को काल कराला।।
जैसे नदियाँ सिंधु समाहीं, तैसे शूरवीर प्रभु माहीं।
भीष्म द्रोण अरु कर्ण प्रतापी, प्रविशहिं मुख महँ पापी तापी।।
चूर्ण होत सिर दंतन बीच, काल चक्र नहिं देखत नीच।
हाहाकार मच्यो सब लोके, कांपत देखि देव सब शोके।।
अर्जुन विनय करै कर जोरी, जानन चहूँ मैं शक्ति थोरी।
कौन रूप धरि उग्र बिराजो, निज परिचय प्रभु मोहि सुनाजो।।
भयभीत हृदय सों पार्थ पुकारा, तुम्हीं आदि देव जग धारा।
तब बोले प्रभु गिरा गँभीरा, मैं हूँ काल मिटावन पीरा।।
प्रवृत्त भयो जग नाश निमित्ता, सब योद्धा अब होइहिं चित्ता।
तू न लड़े तौ भी नहिं बचिहें, मृत्यु पाश महँ सब ही फँसिहें।।
तस्मात् त्वं उत्तिष्ठ यशस्वो, जीतहु शत्रु करहु जग स्वस्वो।
मेरे द्वारा मरे ये सारे, तू तौ निमित्त मात्र धनुधारे।।
द्रोण भीष्म अरु जयद्रथ वीरा, मार्यों मैं पहले करि धीरा।
शोक तजहु अरु युद्ध विचारी, जय पावत तू संकट टारी।।
देखि काल का विकट स्वरूपा, कांपत पार्थ भूप के भूपा।
पुनि-पुनि नमत जोड़ि कर दोऊ, तुम सम देव न दूजा कोऊ।।
नमो नमो प्रभु वायु यमेशा, वरुण शशांक प्रजापति ईशा।
सहस बार प्रभु तोहि प्रणामा, कण-कण महँ तव दिव्य निवासा।।
अज्ञानवश सखा मैं माना, महिमा तव मैं नाहिं पहचाना।
हँसी खेल महँ कीन्ह ढिठाई, क्षमा करहु प्रभु मोरि बुराई।।
जैसे पिता सुत के दुख टारे, सखा सखा के दोष विसारे।
प्रिय प्रियतम को क्षमा कराहीं, तैसे मोहि राखि मन माहीं।।
अदृष्टपूर्व देखि हरषाना, भय सों व्याकुल मन अकुलाना।
सौम्य रूप अब मोहि दिखावहु, मुकुट गदा धरि मनहिं रिझावहु।।
सुनि अर्जुन की विनय अपारा, प्रभु ने तज्यौ रूप विकराला।
चतुर्भुज रूप धर्यो मनभावन, भक्त हेतु प्रभु परम सुहावन।।
मानुष रूप देखि मुसुकाना, अर्जुन मन महँ धीरज आना।
प्रभु बोले यह रूप अनूपा, दुर्लभ देखन परम स्वरूपा।।
वेद यज्ञ तप दान न पावै, जो मम विश्वरूप दरसावै।
केवल अनन्य भक्ति जो लावै, सोई मोहि जानै अरु पावै।।
मत्कर्मकृत मत्परमो भक्तः, संगविवर्जित मानस सक्तः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः, सो मामेति पाण्डव धीरः।।
काल चक्र की गति अति न्यारी, प्रभु इच्छा सब पर है भारी।
जो प्रभु शरण निरंतर रहहीं, भव सागर सों पार उतरहीं।।
दोहा
विश्वरूप दरसाय प्रभु, तज्यौ रूप विकराल। सौम्य चतुर्भुज धरि हियो, शीतल कियौ तत्काल।।
अनन्य भक्ति जो जन करै, तजि ममता अरु बैर।' गेमिनी' सोई प्रभु लहै, भव सागर की लहर।।
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श्रीमद्भगवद्गीता बारहवां अध्याय
भक्तियोग
दोहा
सगुण रूप अति प्रिय लगे, निर्गुण अकथ अपार।अर्जुन संशय परिहरी, पूछा भक्ति विचार॥
भक्ति योग अति सुगम है, प्रेम मार्ग सुखधाम। परम शांति का पंथ यह, भज लें सुंदर श्याम॥
चौपाई
कृष्ण कहे सुन पार्थ सुजाता, भक्ति मार्ग सबसे सुखदाता।
जो मन मुझमें नित्य लगाते, श्रद्धा युक्त मुझे जो पाते॥
वे ही योगयुक्त कहलाते, परम सिद्धि जग में वे पाते।
अक्षर ब्रह्म जो मन में ध्याते, इंद्रिय जीत परम पद पाते॥
निर्गुण मार्ग कठिन अति भाई, देह धारी को कष्ट सहाई।
पर जो मुझको ही सर्वस्व मानें, अपना रक्षक मुझको जानें॥
अनन्य भाव से ध्यान लगाते, वे ही भवसागर तर जाते।
मुझमें अर्पित कर दे मन को, सौंप दे अपनी बुद्धि और तन को॥
निश्चय ही तू मुझमें रहेगा, सत्य वचन यह कभी न ढहेगा।
यदि मन स्थिर न रह पावे, अभ्यास योग तब चित्त लगावे॥
अभ्यास में भी जो असमर्था, कर्म करे सब मेरे अर्था।
मेरे हित सब कर्म सुहावे, तो भी तू फल निश्चित पावे॥
त्याग दे फल की इच्छा सारी, हो जा मन से तू निर्विकारी।
ज्ञान श्रेष्ठ अभ्यास से माना, ध्यान ज्ञान से ऊँचा जाना॥
कर्म फल का त्याग सुखकारी, शांति मिले तब अविकारी।
अद्वेष्टा सब भूतन केरा, मैत्री करुणा जिसका डेरा॥
निर्मम और निरहंकार जो, क्षमावान और सुख-दुख सम जो।
संतुष्ट सदा जो योगी होई, दृढ़ निश्चय वाला जन सोई॥
मन बुद्धि जो मुझको अर्पण, वह भक्त मुझे अति प्रिय पावन।
जिससे जग को कष्ट न पहुँचे, जो न किसी से डरकर सँकुचे॥
हर्ष अमर्ष भय और उद्वेगा, इनसे मुक्त रहे जो वेगा।
अनपेक्ष और शुचि दक्ष सुजाता, उदासी सब दुख का त्राता॥
सब आरंभों का त्यागी जो, प्रिय मेरा वह अनुरागी जो।
न द्वेष करे न हर्ष मनावे, न शोच करे न इच्छा लावे॥
शुभ और अशुभ का त्यागी ज्ञानी, वह भक्त मुझे प्रिय कल्याणी।
शत्रु मित्र जो सम कर जाने, मान और अपमान न माने॥
शीत उष्ण और सुख-दुख समता, सब संग दोष से जिसकी ममता।
तुल्य निंदा स्तुति जो राखे, मौन रहे अमृत रस चाखे॥
जिसका घर है सारा संसारा, स्थिर बुद्धि वह भक्त प्यारा।
अनिकेत और भक्ति में लीन, वह मेरा प्रिय भक्त प्रवीण॥
अमृतमयी धर्म का पालन, जो करते भव-भय का नसन।
श्रद्धा युक्त मुझे जो भजते, परायण हो सब दुख तजते॥
वे ही भक्त मुझे अति प्यारे, भवसागर से लगते किनारे।
भक्ति मार्ग है प्रेम की गंगा, निर्मल मन हो जाए चंगा॥
सगुण रूप की महिमा भारी, रीझ जाते हैं गिरधारी।
छोड़ कपट और तज चतुराई, प्रेम गलिन में सुख अधिकाई॥
अहंकार जब तक मन माहीं, तब तक प्रभु का दर्शन नाहीं।
दीन दयाल सुपाल भगवाना, भक्ति वश ही प्रभु ने जाना॥
योग युक्ति का सार है यही, भक्ति बिना सब व्यर्थ है देही।
बारहवें अध्याय की वाणी, मुक्ति मार्ग दिखलावे प्राणी॥
दोहा
अतिशय प्रिय वह भक्त है, जो तज सकल विकार। भक्ति सुधा रस जो पिए, उतरे भव जल पार॥
श्रीकृष्ण की करुणा लहे, तज कर सब अभिमान।भक्तियोग के मार्ग पर, पावे पद निर्वाण॥
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खंड 3: तत्वज्ञान और अंतिम विजय
दोहा
पूछत पार्थ विनय करि, सुनि प्रभु चित्त लगाय।
त्याग और संन्यास का, भेद कहहु समुझाय॥
परम तत्व क्या है प्रभु, विजय कहाँ विश्राम।
मोह नसावन वचन कहि, पूरण कीजे काम॥
चौपाई
(अर्जुन उवाच)
हे ऋषिकेश सुनो मम बानी, संन्यास त्याग भेद कहु ज्ञानी।
कर्म छोड़ना श्रेष्ठ कहावे, या फल तजना मुक्ति दिलावे॥
मोहे भरम भारी मन माही, तत्व ज्ञान मोहि सूझत नाही।
करहु कृपा प्रभु दीनदयाला, काटहु मोह जगत का जाला॥
(श्रीभगवान उवाच)
सुनु अर्जुन मम वचन अनूपा, त्याग और संन्यास स्वरूपा।
काम्य कर्म जो जग भरमावे, तजना उसे संन्यास कहावे॥
पर जो कर्म फल आस न राखे, त्याग तत्व वह अमृत चाखे।
यज्ञ दान तप कर्म विधाना, त्याग योग्य नहिं इन्हें सुजाना॥
तीन भाँति का त्याग बखाना, सात्विक तामस राजस जाना।
मोह वश जो कर्म बिसारे, तामस त्याग अधम वह प्यारे॥
दुख जानकर जो कर्म न ठानें, राजस त्याग उसे जग मानें।
कर्तव्य समझ जो कर्म कमावे, सात्विक त्याग वही पद पावे॥
सबके हृदय वास मम मोरा, मैं ही चालक चहुँदिशि तोरा।
अहंकार जब तक मन राखे, तब तक तत्व ज्ञान नहिं भाखे॥
बुद्धि और धृति सात्विक धारे, वही पुरुष भव बाधा तारे।
अमृत सम जो आदि में लागे, अंत में सुख सात्विक जागे॥
(अर्जुन उवाच)
नष्ट मोह स्मृति अब आई, प्रभु कृपा सब संशय जाई।
तत्व ज्ञान कर हृदय उजियारा, अब मैं शरण हूँ नाथ तुम्हारा॥
जो आज्ञा प्रभु आप सुनावें, दास वही अब कर दिखलावें।
मिटा द्वंद्व और मिटी मलिनाई, आपकी शरण परम सुख पाई॥
(संजय उवाच)
अदभुत संवाद सुना जब काना, पुलकित रोम-रोम हर्षाना।
व्यास कृपा से दिव्य यह ज्ञाना, देखि रूप प्रभु को पहचाना॥
यत्र योगेश्वर कृष्ण मुरारी, यत्र पार्थ धनुर्धर भारी।
श्री विजय विभूति अचल नीती, सत्य वहीं जहाँ प्रभु की प्रीती॥
दोहा
जहाँ ज्ञान की ज्योति है, जहाँ कर्म का साथ।विजय वहीं निश्चित खड़ी, जहाँ कृष्ण के हाथ॥
पढ़ै सुनै जो प्रेम से, यह संवाद अनूप। पावे सो तत्वज्ञान को, तजकर माया रूप॥
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