दिल में जो राज़ है, दुनिया को बताएँ कैसे
दर्द आँखों का भला सबसे छुपाएँ कैसे
टूट जाएँ जो कभी ख़्वाब तो फिर क्या कीजे
अपने अरमानों को हम फिर से सजाएँ कैसे
जिससे उम्मीद थी, वो दूर निकलता ही गया
अब उसे लौट के आने को बुलाएँ कैसे
ज़ख़्म गहरे हैं मगर होंठ पे हँसी बाकी है
हाल अपना किसी के सामने सुनाएँ कैसे
राह मुश्किल है, अँधेरा भी बहुत गहरा है
हम चराग़ों को मगर फिर भी बुझाएँ कैसे
जो हमें छोड़ गए, याद तो आते हैं मगर
उनकी तस्वीर को दिल से हम हटाएँ कैसे
वक़्त हर ज़ख़्म को भर देगा, ये कहते हैं सभी
वक़्त के साथ मगर ख़ुद को समझाएँ कैसे
‘अजय’ दिल में बहुत शोर है ख़ामोशी का
अपने एहसास को अल्फ़ाज़ में लाएँ कैसे
✍️अजय कुमार पाण्डेय
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