अंजुरी भर किरण थी मन में तुमने तो आकाश सजाया

अंजुरी भर किरण थी मन में 
तुमने तो आकाश सजाया 

सपन सलोने सुभग सुहाने नित पलकों पर स्पंदन करते 
नयन कोर के आलोड़न से अंतर्मन अनुरंजन करते 
सूने मन के अँधियारे में मचल चाहतें जली दीप सी 
सुख की मोती लिये चाहतें लगीं चमकने सुभग सीप सी 

नयन कोर में कुछ सपने थे 
तुमने तो संसार सजाया 
अंजुरी भर किरण थी मन में 
तुमने तो आकाश सजाया 

शब्द-शब्द लय हुई सुसज्जित हुई सुगंधित साँस-साँस सब 
छंद-छंद आनंदित करते अर्पित मन की आस-आस सब 
छूकर मन को किया सुवासित अंग-अंग बन पारस चमका 
पुष्प बने सब शूल चुभे जो उड़ा गगन फिर सारस मन का 

दिवस-रात के मधुर क्षणों में 
तुमने द्वाराचार सजाया 
अंजुरी भर किरण थी मन में 
तुमने तो आकाश सजाया 

और नहीं कुछ आशा मन की और नहीं कुछ चाह हृदय की 
बस इतना अनुरोध हृदय का अभिलाषा है पूर्ण विलय की 
निज नयनों के सभी कोर में बनकर मूरत सजी प्यार सी  
जैसे मन की सूखी सरिता लगे मचलने गंगधार सी 

पावस ऋतु की आस हृदय की 
तुमने तो मधुमास सजाया 
अंजुरी भर किरण थी मन में 
तुमने तो आकाश सजाया 

अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 
     10 दिसंबर,  2025

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