पुष्प मिले या काँटे पग में कुछ भी नव अनुमान न कर

पुष्प मिले या काँटे पग में कुछ भी नव अनुमान न कर 

सौंप दिया हमने बसंत की रखवाली जब पतझड़ को,
पुष्प मिले या काँटे पग में कुछ भी नव अनुमान न कर|

छोड़ दिया कर्तव्यों का पथ औरों पर आश्रित हो बैठे,
जिनको सच से मोह नहीं था उनको ही सूचित कर बैठे|
चुनने की जब बारी आयी स्वाद चुना अपनी थाली में, 
मन को फिर क्यूँ कलुषित करना सूरज की बेबस लाली में|

त्याग दिया सच्चाई का पथ जब झूठों के ही मधुघट में,
साँच मिले या झूठे पग में कुछ भी नव अनुमान न कर|

जाने कितने अर्ध्य दिये पर चौखट को कब खुश कर पाये,
जितनी बार पुकारा उनको उतना साँसों को भरमाये|
लोटा भर-भर पानी लाकर हमने जिनके चरण पखारे,
उनके झूठे व्यवहारों के सम्मुख सारे वादे हारे|

सौंप दिया वादों की गठरी जब वादों के सौदागर को,
लाभ मिले या घाटे पग में कुछ भी नव अनुमान न कर|

चमकीले वादों में खोये थाली सबकी खाली होगी, 
अगर झूठ को और सँभाला सच की झोली खाली होगी|
गंगाजल भर कर लाएंगे वो नये-नये नित प्यालों में,
और डुबोएँगे श्रद्धा को नित मैखानों मधुशालों में| 

त्याग दिया जब गंगाजल को उन मदमाते मधुशालों में,
मोक्ष मिले या काँटे पग में कुछ भी नव अनुमान न कर| 

उबकाई आने लग जाये जब वेदों की रखवाली में, 
अधनंगी हो पड़ी मिलेगी सब नैतिकता फिर नाली में|
भरमा कर झूठे वादों से वो महज तमाशा देखेंगे, 
आग लगाकर संस्कारों को अपने हाथों को सेकेंगे|

त्याग दिया वेदों के पथ को जब कनफाड़ू नक्कारों से,
पुष्प मिले या काँटे पग में कुछ भी नव अनुमान न कर|

 ✍अजय कुमार पाण्डेय 
      हैदराबाद 
      29 नवंबर, 2025

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