गीत

गीत 

कुछ अनजाने बूँद छलक कर नयनों के द्वारे जब आये 
तप्त हृदय को शीतल कर के वही बूँद फिर गीत कहाये 

कुछ पुष्प हृदय में खिले कभी जब देख चितेरे मँडराये 
नेह कलश के घट पर हमने बूँद-बूँद मधु के छलकाये 
ढूँढ़-ढूँढ़ कर पथ को साजा मधु छलकाये द्वारे-द्वारे 
पंक्ति-पंक्ति में नेह सजाकर आया फिर मन द्वार तिहारे 

बुझी प्यास तब निज नयनों की नयनों ने जब रस छलकाये 
तप्त हृदय को शीतल कर के वही बूँद फिर गीत कहाये 

मौन तपाया खुद को जबसे मन अपने आप जवानी में 
अनजाना सा मोड़ दिखा है इस मन को आज कहानी में 
खुद ही मन से नेह जताया है खुद ही मन को समझाया 
अपने मन के साथ लिपट कर अपने ही मन को बहलाया 

किसे दोष दे सूनेपन का मन गाये तो कैसे गाये 
तप्त हृदय को शीतल कर के वही बूँद फिर गीत कहाये 

अच्छा होता दुनियादारी से मन ये अनजाना रहता 
अपना क्या है कौन पराया सब जाना अनजाना सहता 
बुझी प्यास कब जाने कितने प्यालों से प्याले टकराये 
आते जाते सूने पथ में कितने पैमाने छलकाये 

अच्छा होता नहीं मचलते गीत हृदय में जो मुरझाये 
तप्त हृदय को शीतल कर के वही बूँद फिर गीत कहाये 

मन को अपने बहुत सँभाला है हमने दुनियादारी में 
पलकों को अपने पुचकारा हर सपनों की तैयारी में 
लेकिन बदले हालातों को जब देखा मन को क्षोभ हुआ 
पग-पग कितनी ठोकर खायी तब जाकर मन को बोध हुआ 

रहे अधूरे गीत हृदय के नयनों ने फिर उनको गाये 
तप्त हृदय को शीतल कर के वही बूँद फिर गीत कहाये 

✍© अजय कुमार पाण्डेय 
          हैदराबाद 
          20 दिसंबर , 2025






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