मद्धम-मद्धम दुःख को गाओ

मद्धम-मद्धम दुःख को गाओ 

जब कोई आराध्य न हो तो दुःख को अपने सुमुख बनाओ 
लिखो भाव अन्तस के अपने मद्धम-मद्धम उसको गाओ 

कौन सुनेगा करुण कहानी सबकी अपनी सीमाएँ हैं 
कौन दृगों का पानी पोछे सबकी अपनी सीमाएँ हैं 
मन में भाव सजाता जीवन लगता किन्तु अधूरा जीवन 
खिली कहीं मन की अभिलाषा कहीं खिला मन का उपवन 

पर गीत अगीत का भेद समझकर अपनी आहों को समझाओ 

पीड़ा दुसह भले हो कितनी उसका जीवन चक्र सुनिश्चित 
सुख-दुःख का संगम जीवन है सबकी साँसें-साँसें  निश्चित 
माना काली रात घनी थी और दिवस था कितना भारी 
लेकिन सूरज के आते ही सारी काली रातें हारी 

काली बदली छँट जायेगी अधरों से मधुरस छलकाओ 

जग के सारे अनुमानों को अपने मन का गान बनाओ 
अश्रु कणों की हर पीड़ा को असह भले दृढ प्राण बनाओ 
चार प्रहर का एक दिवस है फिर होती है नई प्रतीक्षा 
पग-पग पर ये जीवन अपना लेती हरपल नई परीक्षा 

चन्द्रकिरण बन छिटके सुख कण नयन सजल कर चुप हो जाओ 

अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 
     22नवंबर, 2025

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