गुनगुनाते रहें
चल के देखा जो इन रास्तों पर कभी जो यहाँ पे सहा वो वहां भी सहा
एक लम्हा अकेले न मंजूर था उम्र कैसे गुजरने लगी आजकल
कुछ कहो यूँ न चुप चुप रहो मौन तकती हो क्या रस्ते आजकल
स्वप्न पलकों के कोरों पे अब भी सजे कैसे कह दोगे इनको नहीं कुछ पता
द्वार पूजा की थाली सजा कर खड़े कैसे कह दोगे इनको नहीं कुछ पता
दिल हमारा तुम्हारा ही मजदूर है चाहता है सदा के तराशूँ तुझे
कर लूँ खजुराहो अपने हृदय को यहाँ और इसमें सदा को बसा लूँ तुझे
और कितनी प्रतीक्षा कि घड़ियाँ गिनूँ और कितना निहारें नयन रास्ता
प्रेम का पंथ सूना न होगा कभी कैसे कह दोगे इनसे नहीं वास्ता
लिख रही है कहानी घड़ी दर घड़ी हर कहानी का अपना अलग ठौर है
ये परिंदा समय का कहो कब रुका वो अलग दौर था ये अलग दौर है
आज लिखते हैं हम गीत में जिंदगी हर घड़ी हम इसे गुनगुनाते रहें
और कोई सुने ना सुने गीत को एक दूजे को हम अब सुनाते रहें
🖊अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
22 अक्टूबर, 2025
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