आओ कि मन तुम्हें हेरता

आओ कि मन तुम्हें हेरता

सुधियों के उपवन में कितने सावन आकर बरस गये,
एक बूँद को लेकिन अब भी नयन बिचारे तरस गये।
विकल प्राण भावों में फँस कदम-कदम पर यही टेरता,
गीत अधूरे हैं तुम बिन आओ कि मन तुम्हें हेरता।

गली-गली, नगर-नगर में हार गया हर जगह हेरकर,
लौट न जायें नयन हमारे थककर के राह देखकर।
एक झलक को दरस दिखाकर कौन गली में खोये हो,
मेरे मन को विकल बनाकर कौन नगर में सोये हो।
गली-गली, नगर-नगर में घूम रहा हूँ यही टेरता,
गीत अधूरे हैं तुम बिन आओ कि मन तुम्हें हेरता।

नयन तरसते हैं मेरे ढूँढ़-ढूँढ़ कर हार गया हूँ,
मेरा कुछ भी नहीं यहाँ तुमपर सब कुछ वार गया हूँ।
नेह नयन के नव निनाद का गीत समर्पित सदा करूँ,
मेरे मन में बसने वाले एक तिहारी चाह करूँ।
जीवन के नील गगन में मन को कब तक रहूँ घेरता,
गीत अधूरे हैं तुम बिन आओ कि मन तुम्हें हेरता।

लोभ मोह माया गठरी मेरे मन को नहीं सुहाते,
झूठे जग के रिश्ते नाते इन नयनों को कम भाते।
एक तिहारा हाथ थाम लूँ जीवन अपना तर जाये,
कब जाने के किस मौसम में पात नयन के झर जायें।
जीवन के महा सिंधु में मन को कितना रहूँ फेरता,
गीत अधूरे हैं तुम बिन आओ कि मन तुम्हें हेरता।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
       14 अक्टूबर, 2025

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