गीतिका अनुपात की |

गीतिका अनुपात की |

स्वेद बूँदें कर रही हैं इस गात का श्रृंगार जब, 
क्या लिखूँ फिर गीतिका मैं यहाँ अनुपात की |

चल पड़े जब पग हमारे फिर व्यथा से क्यूँ डरूँ, 
राह की अब मुश्किलों से फिर भला अब क्यूँ टरूं|
है नहीं कुछ मोह मन को जीत हो या हार हो,
कर्म के इस पुण्य पथ में एक सा व्यव्हार हो |

कर रहे हैं पग हमारे पंथ का श्रृंगार जब 
क्या लिखूँ फिर गीतिका मैं यहाँ अनुपात की |

क्या करूँगा जानकर के क्या मिला संसार से, 
क्यूँ करे संचित हृदय अब नेह को मनुहार से |
स्वयं पर विश्वास कर स्वयं से व्यवहार कर लूँ , 
छोड़ सारे किन्तु पथ के स्वयं से ही प्यार लूँ |

हो गया जब प्रेम मन को श्रेष्ठतम व्यवहार से, 
क्या लिखूँ फिर गीतिका मैं यहाँ अनुपात की |

कब रहा प्रेम संचित क्रोध जो संचित रहेगा,
कौन है जो जगत में मोह से वंचित रहेगा |
कर्म के सिद्धांत में शून्य से शुरुआत होती, 
भोर की पहली किरण रात के पश्चात होती |

हो गया जब कर्म सिंचित स्वेद के श्रृंगार से, 
क्या लिखूँ फिर गीतिका मैं यहाँ अनुपात की |

✍अजय कुमार पाण्डेय 
      हैदराबाद 
     23 अक्टूबर, 2025



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