शीर्ष के स्वर गिर रहे हैं
भावना दूषित हुई है।
व्याकरण बदले हुए हैं
प्रार्थना मूर्छित हुई है।
शब्द भटके क्यूँ अधर से
अब पूछना अपराध है।
मौन सुर में सुर मिलाना
अब लग रहा अनुराग है।
शब्द शोषित हो रहे हैं व्याकरण ने मान हारे।
रश्मियाँ मुरझा रही हैं
सूर्य का भी तेज झूठा।
वृत्तियों के नव परिधि में
भाव का परिवेश रूठा।
आज निजता बढ़ रही है
पीढ़ियों को कौन माने।
स्वार्थ में अनुदेशिका की
शब्द को अवरोध जाने।
निर्देशिका कुंठित हुई मानकों ने प्राण हारे।
नेह के संबंध झूठे
बस नगद का बोलबाला।
नीतियों को कटघरे में
कौन जाने कौन डाला।
तन रही है हर प्रथा पर
अब उँगलियाँ अभिमान की।
वेद पृष्ठों पर गिरी है
अब बिजलियाँ अज्ञान की।
नीतियाँ दूषित हुई हैं पीढ़ियों ने मान हारे।
आज सिंहासन मिला तो
धर्म का पथ भूल बैठे।
भूल के अपनी जड़ों को
गोदियों में झूल बैठे।
वो सदी ना टिक सकी तो
ये सदी कब तक टिकेगी।
वो प्रथा ना रह सकी तो
ये प्रथा कब तक रहेगी।
नव सदी के द्वार पर ही बीतती ने गान हारे।
✍️©अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
10 अक्टूबर, 2025
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