हम हैं रेल की शान, हम हैं रेल की शान

हम हैं रेल की शान, हम हैं रेल की शान 

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम अपनी सभी दिशाएँ 
पटरी-पटरी रस्ता -रस्ता अपने मन को भायें 
रात दिवस हो सुबह शाम हो प्रति पल हम तैयार 
जंगल -जंगल परवत -परवत हमको सबसे प्यार 
प्रकृति कि गोदी में खिलती इस वर्दी की शान 
हम हैं रेल की शान, हम हैं रेल की शान |

ड्यूटी पर आते ही हम बस रेल के हैं हो जाते 
सभी सर्कुलर पढ़ करके ही हम गाडी पर जाते 
सभी सुरक्षा के नियमों को हम सारे अपनाते 
हर यात्री को सेवा देते मंजिल तक पहुँचाते 
स्वागत करते हम यात्री की ले चेहरे पर मुस्कान 
हम हैं रेल की शान, हम हैं रेल की शान |

मेल एक्सप्रेस यात्री गाड़ी और माल गाड़ी है दुनिया 
अंतिम बोगी अंतिम वैगन अपनी तो है दुनिया 
हर रस्तों पर आँखें रखते हम करते रेल सुरक्षा 
रेल राष्ट्र की रीढ़ है जिसकी करते हैं हम रक्षा 
सारे दुनिया से प्यारा हमको है अपना ब्रेकवान 
हम हैं रेल की शान, हम हैं रेल की शान |

औरों की खुशियों पर हम सब अपनी खुशियां वारें 
यात्री की मुस्कानों पर हम अपना सबकुछ हारें 
काल करोना में हम सबने हार नहीं थी मानी 
सीमा पर प्रहरी के जैसे हम डटे रहे बलिदानी 
त्याग समर्पण धर्म हमारा है नहीं कोई अभिमान 
हम हैं रेल की शान, हम हैं रेल की शान |

यही कामना हम सबकी है समृद्ध राष्ट्र बनाएं 
गाड़ी के पहियों के संग-संग गीत ख़ुशी के गायें 
एक हाथ खुशियों का सिग्नल हृदय सजे तिरंगा 
राष्ट्र प्रगति के सोपानों में हो ऊंचा रेल का झंडा 
मंगलमय हो यात्रा सबकी बस इतना है अरमान 
हम हैं रेल की शान, हम हैं रेल की शान |

✍अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 

गीतिका अनुपात की |

गीतिका अनुपात की |

स्वेद बूँदें कर रही हैं इस गात का श्रृंगार जब, 
क्या लिखूँ फिर गीतिका मैं यहाँ अनुपात की |

चल पड़े जब पग हमारे फिर व्यथा से क्यूँ डरूँ, 
राह की अब मुश्किलों से फिर भला अब क्यूँ टरूं|
है नहीं कुछ मोह मन को जीत हो या हार हो,
कर्म के इस पुण्य पथ में एक सा व्यव्हार हो |

कर रहे हैं पग हमारे पंथ का श्रृंगार जब 
क्या लिखूँ फिर गीतिका मैं यहाँ अनुपात की |

क्या करूँगा जानकर के क्या मिला संसार से, 
क्यूँ करे संचित हृदय अब नेह को मनुहार से |
स्वयं पर विश्वास कर स्वयं से व्यवहार कर लूँ , 
छोड़ सारे किन्तु पथ के स्वयं से ही प्यार लूँ |

हो गया जब प्रेम मन को श्रेष्ठतम व्यवहार से, 
क्या लिखूँ फिर गीतिका मैं यहाँ अनुपात की |

कब रहा प्रेम संचित क्रोध जो संचित रहेगा,
कौन है जो जगत में मोह से वंचित रहेगा |
कर्म के सिद्धांत में शून्य से शुरुआत होती, 
भोर की पहली किरण रात के पश्चात होती |

हो गया जब कर्म सिंचित स्वेद के श्रृंगार से, 
क्या लिखूँ फिर गीतिका मैं यहाँ अनुपात की |

✍अजय कुमार पाण्डेय 
      हैदराबाद 
     23 अक्टूबर, 2025



गुनगुनाते रहें

गुनगुनाते रहें 

दर्द का प्यार से कैसा रिश्ता रहा ये जहां भी रहा वो वहां भी रहा 
चल के देखा जो इन रास्तों पर कभी जो यहाँ पे सहा वो वहां भी सहा 

एक लम्हा अकेले न मंजूर था उम्र कैसे गुजरने लगी आजकल 
कुछ कहो यूँ न चुप चुप रहो मौन तकती हो क्या रस्ते आजकल 

स्वप्न पलकों के कोरों पे अब भी सजे कैसे कह दोगे इनको नहीं कुछ पता 
द्वार पूजा की थाली सजा कर खड़े कैसे कह दोगे इनको नहीं कुछ पता 

दिल हमारा तुम्हारा ही मजदूर है चाहता है सदा के तराशूँ तुझे 
कर लूँ खजुराहो अपने हृदय को यहाँ और इसमें सदा को बसा लूँ तुझे 

और कितनी प्रतीक्षा कि घड़ियाँ गिनूँ और कितना निहारें नयन रास्ता 
प्रेम का पंथ सूना न होगा कभी कैसे कह दोगे इनसे नहीं वास्ता 

लिख रही है कहानी घड़ी दर घड़ी हर कहानी का अपना अलग ठौर है 
ये परिंदा समय का कहो कब रुका वो अलग दौर था ये अलग दौर है 

आज लिखते हैं हम गीत में जिंदगी हर घड़ी हम इसे गुनगुनाते रहें 
और कोई सुने ना सुने गीत को एक दूजे को हम अब सुनाते रहें 

🖊अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 
     22 अक्टूबर,  2025

आओ कि मन तुम्हें हेरता

आओ कि मन तुम्हें हेरता

सुधियों के उपवन में कितने सावन आकर बरस गये,
एक बूँद को लेकिन अब भी नयन बिचारे तरस गये।
विकल प्राण भावों में फँस कदम-कदम पर यही टेरता,
गीत अधूरे हैं तुम बिन आओ कि मन तुम्हें हेरता।

गली-गली, नगर-नगर में हार गया हर जगह हेरकर,
लौट न जायें नयन हमारे थककर के राह देखकर।
एक झलक को दरस दिखाकर कौन गली में खोये हो,
मेरे मन को विकल बनाकर कौन नगर में सोये हो।
गली-गली, नगर-नगर में घूम रहा हूँ यही टेरता,
गीत अधूरे हैं तुम बिन आओ कि मन तुम्हें हेरता।

नयन तरसते हैं मेरे ढूँढ़-ढूँढ़ कर हार गया हूँ,
मेरा कुछ भी नहीं यहाँ तुमपर सब कुछ वार गया हूँ।
नेह नयन के नव निनाद का गीत समर्पित सदा करूँ,
मेरे मन में बसने वाले एक तिहारी चाह करूँ।
जीवन के नील गगन में मन को कब तक रहूँ घेरता,
गीत अधूरे हैं तुम बिन आओ कि मन तुम्हें हेरता।

लोभ मोह माया गठरी मेरे मन को नहीं सुहाते,
झूठे जग के रिश्ते नाते इन नयनों को कम भाते।
एक तिहारा हाथ थाम लूँ जीवन अपना तर जाये,
कब जाने के किस मौसम में पात नयन के झर जायें।
जीवन के महा सिंधु में मन को कितना रहूँ फेरता,
गीत अधूरे हैं तुम बिन आओ कि मन तुम्हें हेरता।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
       14 अक्टूबर, 2025

भाव कुंठित हो रहे हैं गिर रहे अनुमान सारे

भाव कुंठित हो रहे हैं गिर रहे अनुमान सारे

शीर्ष के स्वर गिर रहे हैं
भावना दूषित हुई है।
व्याकरण बदले हुए हैं
प्रार्थना मूर्छित हुई है।
शब्द भटके क्यूँ अधर से
अब पूछना अपराध है।
मौन सुर में सुर मिलाना
अब लग रहा अनुराग है।
शब्द शोषित हो रहे हैं व्याकरण ने मान हारे।

रश्मियाँ मुरझा रही हैं
सूर्य का भी तेज झूठा।
वृत्तियों के नव परिधि में
भाव का परिवेश रूठा।
आज निजता बढ़ रही है
पीढ़ियों को कौन माने।
स्वार्थ में अनुदेशिका की
शब्द को अवरोध जाने।
निर्देशिका कुंठित हुई मानकों ने प्राण हारे।

नेह के संबंध झूठे
बस नगद का बोलबाला।
नीतियों को कटघरे में
कौन जाने कौन डाला।
तन रही है हर प्रथा पर
अब उँगलियाँ अभिमान की।
वेद पृष्ठों पर गिरी है
अब बिजलियाँ अज्ञान की।
नीतियाँ दूषित हुई हैं पीढ़ियों ने मान हारे।

आज सिंहासन मिला तो
धर्म का पथ भूल बैठे।
भूल के अपनी जड़ों को
गोदियों में झूल बैठे।
वो सदी ना टिक सकी तो
ये सदी कब तक टिकेगी।
वो प्रथा ना रह सकी तो
ये प्रथा कब तक रहेगी।
नव सदी के द्वार पर ही बीतती ने गान हारे।

✍️©अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        10 अक्टूबर, 2025

ख़याल करता हूँ

ख़याल करता हूँ वतन को बाँटने वालों से सवाल करता हूँ, मैं आज भी उसी भारत का ख़याल करता हूँ। जो सच की बात करे उसकी आवाज़ दबती है, मैं ऐसे हर सि...