बात अधूरी है

बात अधूरी है

कुछ और ठहर जाओ, कैसी मजबूरी है,
कहनी है जो तुमसे, वो बात अधूरी है।

दिन वादों में बीता यादों में रात गयी,
पलकों के कोरों की सपनों में बात हुई।
सपनों ही में आ जाओ कैसी मजबूरी है,
कहनी है जो तुमसे, वो बात अधूरी है।

जो छूट गए लम्हे कल और न आयेंगे,
मैं आज सुनाता हूँ कल और सुनायेंगे।
इन लम्हों को जी लें कैसी मज़बूरी है,
कहनी है जो तुमसे, वो बात अधूरी है।

कल की बातें झूठी कल किसने देखा है,
आ आज यहाँ जी लें जो सपना देखा है।
क्यूँ मौन प्रहर अब भी कैसी मजबूरी है,
कहनी है जो तुमसे, वो बात अधूरी है।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
       हैदराबाद
       03 अगस्त, 2024

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