गीतों को वरदान

गीतों को वरदान

गीतों के आंदोलित स्वर को, जग में जब सम्मान मिलेगा,
उच्च शिखर आशायें होंगी, गीतों को वरदान मिलेगा।

नयनों के इस आंदोलन में, मुश्किल मन का भाव छुपाना,
बदल रहे इन हालातों में, नामुमकिन है हाल छुपाना।
कब जाने दिल की राहों में, कौन यहाँ किसको मिल जाये,
दिल के पतझड़ में कब जाने, पुष्प कहीं फिर से खिल जाये।

नयनों के आंदोलन को जब, गीतों का अनुदान मिलेगा,
उच्च शिखर आशायें होंगी, गीतों को वरदान मिलेगा।

झुकी हुई तरु की छाया में, जाने कितने पल सिमटे हैं,
उलझी माथे की सिलवट में, अनुभव के धागे लिपटे हैं।
दूर घनेरे अँधियारे जब, राहों से मन को भटकाये,
अवसादों से घिरे गगन में, नाहक ही मन उलझा जाये।

झुके हुए उस तरुवर के जब, अनुभव को सम्मान मिलेगा,
उच्च शिखर आशायें होंगी, गीतों को वरदान मिलेगा।

दरबारी हो गया अगर तो, कविताई का अर्थ नहीं है,
सत्ता को अनुनादित करना, कवि का केवल धर्म नहीं है।
जन गण मन की दिव्य भावना, सत्ता तक पहुँचाना होगा,
सोया है यदि सिंहासन तो, उसको पुनः जगाना होगा।

जनश्रुतियों को कविताओं में, जब मन वांछित स्थान मिलेगा,
उच्च शिखर आशायें होंगी, गीतों को वरदान मिलेगा।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        11 अप्रैल, 2024




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लेखक परिचय

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