दूर कितना यहाँ पर चलोगे कहो

दूर कितना यहाँ पर चलोगे कहो

घट विरह के नयन में सँभाले हुए
दूर कितना यहाँ पर चलोगे कहो।

माना लम्हों में तुमने गुजारी सदी,
थी कभी दूर तो पास थी जो कभी।
स्वप्न जिसके नयन में सजाते रहे,
याद में गीत तुम गुनगुनाते रहे।

गीत में भाव मन के छुपाए हुए
दर्द कितना यहाँ पर सहोगे कहो।
घट विरह के नयन में सँभाले हुए
दूर कितना यहाँ पर चलोगे कहो।

कौन प्यासा यहाँ राह सब जानती,
नभ की मजबूरियाँ भी सब जानती।
रात आयी गयी द्वार पर नैन थे,
पलकों पे नींद से उलझे चैन थे।

बूँद का दर्द मन में दबाए हुए,
कोर में बूँद कब तक रखोगे कहो।
घट विरह के नयन में सँभाले हुए
दूर कितना यहाँ पर चलोगे कहो।

एक सी है व्यथा एक सा चित्त है,
मौन के भाव सारे प्रकाशित भी हैं।
फिर कहो दूर कैसे रहोगे यहाँ,
मौन का दर्द कब तक सहोगे यहाँ।

मौन का घाव मन में छुपाए हुए,
भाव का दर्द कब तक सहोगे कहो।
घट विरह के नयन में सँभाले हुए
दूर कितना यहाँ पर चलोगे कहो।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        27दिसंबर, 2023



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