भावों को सहलायेंगी

भावों को सहलायेंगी

सांध्य क्षितिज पर जब शरमाये तुम अपना आँचल लहराना
तब गीतों की मधुर पंक्तियाँ भावों को सहलायेंगी।

भाव निखर बाहर जब आयें आहें भी जब गीत सुनायें
जब अक्षर-अक्षर बिखरे होंगे बीते पल के कतरे होंगे
साँसों में जब विचलन होगी आहों में भी फिसलन होगी
पलकें सारी बात कहेंगी तन्हाई में रात बहेगी
तब आहों को गीत बनाकर तुम मेरे मन को बहलाना
तब गीतों....।

जब यादों के बादल छायें वादे जब मन को तड़पायें
इक धुँधली पर घनी लकीरें लुक-छिप लुक-छिप आये जायें
जब बादल के अंक सिमट कर सांध्य कहे कुछ फिर शरमाये
जब हल्की सी छुअन पौन की मन में इक सिहरन दे जाये
उम्मीदों की पाँखी बनकर मेरी पलकों को सहलाना
तब गीतों....।

तन्हाई मन को तड़पाये परछाईं धूमिल पड़ जाये
कही-अनकही, भूली-बिसरी बात हृदय को जब तड़पाये
खुद से जब मन कहना चाहे खुद को जब मन सुनना चाहे
पलकें जब खुद ही झुक जायें कहे बिना ही सब कह जायें
मन से मिल जब मन सकुचाये, मन ही मन, मन को समझाना
तब गीतों......।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        06 सितंबर, 2023


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