पंखुरी गुलाब की सुन तो क्या कह रही।।

पंखुरी गुलाब की सुन तो क्या कह रही।।

प्रेम की छुअन है या गीत कोई गा रहा
मौन मन के भाव को राग में सुना रहा
खिलखिला उठे सभी भाव आज प्यार के
पल विरह के बने भाव अब श्रृंगार के
चाहतों की बात कुछ सुन जरा कह रही
पंखुरी गुलाब की सुन तो क्या कह रही।।

चाँदनी की रश्मियाँ देखो गुनगुना रहीं
जो रुकी बात थी पल में सब सुना रही
रात ने भी रागिनी को मधुर साज दी
तारों ने जुगनू में रश्मियाँ साज दी
रात की रश्मियाँ सुन जरा कुछ कह रहीं
पंखुरी गुलाब की सुन तो क्या कह रही।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        14मार्च, 2023

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