खिली कली मन की मुरझाई।

खिली कली मन की मुरझाई। 

रंग फिजा ने कैसा बदला
खिली कली मन की मुरझाई।।

साँझ ढले मन के पनघट पर
कैसी फिसलन जान न पाया
खाली घट मैं लिए खड़ा था
सागर था, पहचान न पाया
कुछ सपनों की चाहत गहरी
नयनों की प्यासी धरती पर
जाने फिर क्यूँ स्वप्न गिरे
रक्तिम गालों की धरती पर
अधरों ने जब कहना चाहा
बात हुई सब सुनी सुनाई
रंग फिजा ने कैसा बदला
खिली कली मन की मुरझाई।।

राहें तक-तक पलकें हारीं
कितने जीवन पार हो गए
सूना-सूना मन का आँगन
सावन बीता क्वार हो गए
जितने महल बने ख्वाबों के
द्वार पलक के आकर ठहरे
चाहा कितनी बार सजा लूँ
पर जाने थे कैसे पहरे
द्वार ठहर कर देख रहा मन
सूने आँगन की परछाईं
रंग फिजा ने कैसा बदला
खिली कली मन की मुरझाई।।

संझा चाह मिलन की लेकर
रात-दिवस से रही उलझती
दूर क्षितिज पर उम्मीदें थीं
साँसें पल-पल रहीं कलपती
दूर सभी रस्ते ठहरे थे
जाना है किस ओर न जाने
रुँधे कंठ ले सांध्य खड़ी थी
आँसू का आवेग न माने
संझा आज स्वयं के घर में
क्या कहती क्यूँ हुई पराई
रंग फिजा ने कैसा बदला
खिली कली मन की मुरझाई।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        30जनवरी, 2023

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