गीतों का मधुपान करा दो।

*4-गीतों का मधुपान करा दो।*  

आज सुलगते मनो भाव को
शीतलता का भान करा दो
बिखर न जायें भाव हृदय के
मुझको इतना ज्ञान करा दो
बिसरे भावों को आहों को
सांसों को संज्ञान करा दो
प्यासे अब तक कर्ण हैं मेरे
गीतों का मधुपान करा दो।।

चलता पथ पर रहा निरंतर
पग पग उलझा उलझा जीवन
ऋतुओं के मृदु अनुमानों में
बहका बहका था ये उपवन
बरसो बनकर आज घटा तुम
मृदुल नेह का ध्यान करा दो
आज सुलगते मनो भाव को
शीतलता का भान करा दो।।


निर्जल अधरों पर मेरे ये
जाने कैसी प्यास जगी है
मेघ बरसते भीगे सावन
फिर भी कैसी आग लगी है
अंतस के इस सूनेपन में
अपनेपन का मान करा दो
आज सुलगते मनो भाव को
शीतलता का भान करा दो।।

लगता जैसे दूर हो रहे
सपने पलकों से बोझल हो
दूर हो रही परछाईं भी
साँझ ढले पथ में ओझल हो
मन में जो भी आशंकायें
उनको नया विहान दिखा दो
प्यासे अब तक कर्ण हैं मेरे
गीतों का मधुपान करा दो।।

✍️अजय कुमार पाण्डेय
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