उम्र ढलती रही कब रुकी है यहाँ।।

उम्र ढलती रही कब रुकी है यहाँ।।

दौड़ती भागती पटरियों की तरह
कुछ कहो जिंदगी कब रुकी है यहाँ
सब बदलते रहे मौसमों की तरह
उम्र ढलती रही कब रुकी है यहाँ।।

एक राहों से कितनी हैं राहें जुड़ीं
कुछ रुकी हैं कहीं कुछ मुड़ी हैं कहीं
कुछ चली झूमती मंजिलों की तरफ
और कुछ मंजिलों से चली हैं कहीं
कुछ, मचलती रही आस पल-पल मगर
उम्र ढलती रही कब रुकी है यहाँ।।

सपने नयनों में छुप गये खो गये
रात की गोद में जब कहीं सो गये
उम्र ने पलकों के कोर को तब छुआ
पलकों को नेह नूतन पुनः दे गये
पलकें झुकती रही बदलियाँ की तरह
उम्र ढलती रही कब रुकी है यहाँ।।

वो कहे-अनकहे भाव कुछ आज तक
कंठ में ही रहे जो नहीं कह सके
सालती वो रही टीस पल-पल मगर
अधर की पाँखुरी को नहीं छू सके
खो गईं मौन पल में ग्रहण की तरह
उम्र ढलती रही कब रुकी है यहाँ।।

मधुर एक कहानी की शुरुआत हो
पलकों की बूंद में फिर जज्बात हो
फिर चलो घूम आयें, किनारे वहीं
जुगनू की रोशनी में फिर बात हो
ओढ़ें आकाश फिर आँचल की तरह
उम्र ढलती रही कब रुकी है यहाँ।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
       18नवंबर, 2022

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