व्यग्र घड़ियों में मन की बात।
कितनी घड़ियाँ व्यग्र देखीं मन बात अपनी बोलने को।।
क्या फिर करता उन पलों में मन को जब समझा न पाया
गाँठ उर की खोलने को जब पास में कोई न आया
स्वयं कितने ही गढ़े फिर गल्प भावों की प्रचुरता के
अब कौन जाने मन यहाँ पर भार कितना है उठाया।।
थे शब्द पल-पल कुछ तड़पते गाँठ मन की खोलने को
कितनी घड़ियाँ व्यग्र देखीं मन बात अपनी बोलने को।।
ये मौन जीवन का सुखद है या राग जीवन का सुखद
जब ये गात मधुमय गीत गाये फिर कहें कैसे दुखद
जब भी रचे मन गीत सुंदर बाट कब तक जोहता हिय
रोक न पाया हृदय सब कह दिया था सुखद या के दुखद।।
हिय में सजे जब राग सुखमय श्वास मन के तोलने को
कितनी घड़ियाँ व्यग्र देखीं मन बात अपनी बोलने को।।
प्रलाप से जब दग्ध हो कंठ गीत कोई सजते नहीं
जब हृदय में पीर ठहरी कोई साज तब सजते नही
जब सुख का कोई माप न हो दुख कोई मापेगा क्या
जब हो तुला पर जिन्दगी फिर स्वांग कोई रचते नहीं।।
जब मुक्त हो सुखमय हृदय अहसास मन के तोलने को
कितनी घड़ियाँ व्यग्र देखीं मन बात अपनी बोलने को।।
©✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
09अप्रैल, 2022
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