किरदार- स्वयं के आइने में।

किरदार-स्वयं के आइने में।   

दूर सागर के क्षितिज पर इक लहर है चूमती
सौम्यता, मृदु भाव हिय में मस्त होकर झूमती।।

चल पड़ा उस ओर खिंचकर मस्त मधुमय गीत गाता
पार अँधेरों के जो देखा एक दीपक झिलमिलाता
कह रही हैं दस दिशायें पिय आज मधु का पान कर लो
त्यागो सारे किन्तु अपने पिय आज खुद का ध्यान कर लो।।

हो कुपथ या फिर सुपथ हो, है कौन चल पाया अकेला
मौन रहकर भाव हिय के, है कौन कह पाया अकेला
गीत भी तब तक अधूरा जब तक के उसमें साज न हो
रागिनी भी है अधूरी जब तक के उसमें राग न हो।।

होता बहुत मुश्किल बताना घाव किससे है मिला तब
रिसते हुये कुछ जख्म देखे आइने में स्वयं के जब
क्या लिखे कविता किसी पर अरु किस विधा पर गीत लिखें
उँगलियाँ उठती रही हों स्वयं के ही किरदार पर जब।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        12मार्च, 2022

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