पँक्तियाँ एक मोड़ तक आईं आकर थम गयीं।

पँक्तियाँ एक मोड़ तक आईं आकर थम गयीं।

जब भी लिखने को चले हम जिंदगी की इक गजल
पँक्तियाँ एक मोड़ तक आईं आकर थम गयीं
ये पलक जब भी हुई है इन वीथियों पे सजल
इक गीतिका होंठों तक आई आकर जम गयी।।

पृष्ठ पर जो भी लिखे वो गीत जाने गुम हुए
शब्द भावों से चुने न जाने कहाँ वो गुम हुए
जो लिखे थे गीत हमने छंद के सत्कार के
पँक्तियाँ खोई सभी अरु भाव जाने गुम हुए।।

चाहा कितना कि रचूँ बस प्रीत का नव पंथ मैं
न चल सके मेरे कदम ये राहें थम सी गयी
जब भी लिखने को चले हम जिंदगी की इक गजल
पँक्तियाँ एक मोड़ तक आईं आकर थम गयीं।।


भोर को शैशव समझ मेल उससे कर सके ना
जब हुआ थोड़ा उजाला तेज भी सह सके ना
अब क्षितिज पर देख कर जाती हुई उजली किरण
रोकता कैसा कि मन जब व्यक्त भी कर सके ना।।

कह सके न भाव खुल के जाने कैसी द्वंद थी
लिख सके ना गीत कोई लेखनी थम सी गयी
जब भी लिखने को चले हम जिंदगी की इक गजल
पँक्तियाँ एक मोड़ तक आईं आकर थम गयीं।।

रात ने देकर सहारा भोर को आवाज दी
चाँद किरणों ने मचल कर इक नई शुरुआत दी
तारों ने भी झिलमिलाकर हौले से कुछ कहा
अब कहो कि किस्मतों ने हमको भी ये रात दी।।

रात मन की कह सकी ना या रश्मियाँ मंद थीं
भाव बन नीर पलकों के किनारे तर कर गयीं
जब भी लिखने को चले हम जिंदगी की इक गजल
पँक्तियाँ एक मोड़ तक आईं आकर थम गयीं।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        04फरवरी, 2022


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