स्याही ने इंकार कर दिया।

स्याही ने इंकार कर दिया।  

पलकों के कोरों पे आँसू
ठहरे कभी, कभी हैं ढलके
सूखे कभी ताप में जलकर
कभी नरम होकर के छलके
जब भी इनको लिखना चाहा
स्याही ने इंकार कर दिया।।

यादों की वीथी पर कितने
धुँधले चित्र अभी तक ठहरे
अंतस के भावों पर जाने
कैसे कैसे हैं ये पहरे
पहरों को जब लिखना चाहा
स्याही ने इंकार कर दिया।।

विरह वेदना के क्षण में भी
आँसू का सम्मान किया है
घोर निराशा के क्षण में भी
मैंने मधु का दान किया है
मधु की पीड़ा लिखना चाहा
स्याही ने इंकार कर दिया।।

सन्नाटे के विरह में घुली
अब खामोशी किससे दर्द कहे
पग पग कितनी पीड़ा झेली
और जाने कितने दर्द सहे
पीड़ा को जब लिखना चाहा
स्याही ने इंकार कर दिया।।

आह, सुलगती आशाओं ने
कुछ कहा कभी कुछ सुना कभी 
पग में कितने भी छाले हों
क्या दिनकर का रथ रुका कभी
छालों को जब लिखना चाहा
स्याही ने इंकार कर दिया।।

सुधियों के चौराहे पर अब
चुपचाप मुसाफिर मौन खड़ा
यादों के बीते साये में
ले चुभते कितने प्रश्न खड़ा
प्रश्नों को जब लिखना चाहा
स्याही ने इंकार कर दिया।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        08नवंबर, 2021

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